उत्तराखंड का ये 'छिपा हुआ स्वर्ग' भूल जाएंगे स्विट्ज़रलैंड, तड़ाग ताल का रहस्य देख फटी रह जाएंगी आंखें
ऊंचे बर्फीले हिमालयी शिखर, मखमली हरियाली की चादर और सुकून भरी शांति- उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित निजमुला घाटी किसी अनदेखे स्वर्ग जैसी नजर आती है। प्राकृतिक संपदा से लबरेज यह इलाका प्रदेश के प्रमुख पर्यटन मानचित्र पर उभरने का पूरा माद्दा रखता है, लेकिन आज भी यह बुनियादी सुविधाओं और प्रशासनिक नजर-ए-इनायत की बाट जोह रहा है। खासकर सितंबर और अक्टूबर के महीनों में अपनी अलौकिक छटा बिखेरने वाला तड़ाग ताल अगर सुगम रास्तों और बेहतर प्रचार से जुड़ जाए, तो यह देश-दुनिया के सैलानियों की पहली पसंद बन सकता है।
निजमुला घाटी की असल ताकत इसकी प्राकृतिक विविधता है। तड़ाग ताल के साथ सप्तकुंड, ऐतिहासिक गोहना ताल, प्रसिद्ध लॉर्ड कर्जन ट्रेल, पाना-ईरानी और झींजी जैसे रमणीक पड़ाव एक संपूर्ण पर्यटन सर्किट की बुनियाद तैयार करते हैं। यदि सरकार इन सभी स्थलों को एक सूत्र में पिरोकर ईको-टूरिज्म सर्किट के तौर पर विकसित करे, तो सैलानियों को रोमांचक ट्रेक, हिमालयी जनजीवन और समृद्ध पहाड़ी संस्कृति का वास्तविक अनुभव एक ही सफर में मिल सकेगा। इसके लिए जरूरी है कि दुर्गम रास्तों को सुगम बनाया जाए और सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम हों।
तड़ाग ताल तक पहुंचने के लिए मुख्य रूप से चमोली से निजमुला होते हुए मानुरा, मोली और हड़ूंग का रास्ता तय करना पड़ता है। इसके अलावा गोहना-पठेला और नंदानगर ब्लॉक के रामणी गांव से भी संपर्क मार्ग हैं। हालांकि, स्पष्ट साइनबोर्ड, सटीक दूरी के मानक, प्रशिक्षित स्थानीय गाइड और प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में आम सैलानी यहां आने से हिचकते हैं। डिजिटल माध्यमों से सटीक रूट मैप और प्रचार-प्रसार मिलने पर यह घाटी उत्तराखंड का नया एडवेंचर हब बन सकती है।
घाटी में पर्यटन को पंख लगने से पहाड़ों से हो रहे पलायन पर भी प्रभावी रोक लग सकती है। ट्रेकिंग और कैंपिंग शुरू होने से स्थानीय युवाओं को होमस्टे, गाइड, ट्रांसपोर्ट और खानपान से जुड़े प्रत्यक्ष रोजगार मिलेंगे। साथ ही स्थानीय काश्तकारों के जैविक उत्पाद, पहाड़ी दालें और महिला स्वयं सहायता समूहों द्वारा तैयार हस्तशिल्प को सीधा बाजार मिलेगा, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था अपने पैरों पर खड़ी होगी।
पर्यटन विस्तार के साथ हिमालय के नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र को बचाना भी सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए। तड़ाग ताल और संवेदनशील जलस्रोतों को प्लास्टिक कचरे और अनियंत्रित भीड़ से सुरक्षित रखने के लिए कड़े नियम जरूरी हैं। आकर्षण यहां पहले से मौजूद है, बस जरूरत है पर्यावरण-अनुकूल ठोस कार्ययोजना और प्रशासनिक इच्छाशक्ति की, ताकि इस छिपे हुए नगीने की चमक पूरी दुनिया देख सके।