उत्तराखंड की जमीन और UP का पहरा, दशहरे से दिवाली तक क्यों सूख जाता है हरिद्वार में नहर का पानी?

उत्तराखंड की जमीन और UP का पहरा, दशहरे से दिवाली तक क्यों सूख जाता है हरिद्वार में नहर का पानी?

देश के करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था के केंद्र और पावन देवभूमि उत्तराखंड के हरिद्वार से एक बेहद कौतूहल और रहस्य से भरी खबर सामने आ रही है। हर साल विजयादशमी यानी दशहरे की मध्यरात्रि से लेकर प्रकाश पर्व दीपावली की रात तक हरिद्वार के प्रसिद्ध हर की पौड़ी समेत पूरी ऊपरी गंगा नहर का पानी अचानक पूरी तरह से सुखा दिया जाता है। सूखी नहर में पड़े पत्थरों और रेत को देखकर वहां पहुंचने वाले लाखों श्रद्धालु और पर्यटक हैरान रह जाते हैं कि आखिर बहती पावन गंगा धारा को इस तरह पूरी तरह कैसे रोक दिया जाता है। सबसे दिलचस्प बात यह है कि नहर और जमीन तो उत्तराखंड राज्य की है, लेकिन इसकी चाबी और प्रशासनिक पहरा उत्तर प्रदेश (UP) सिंचाई विभाग के हाथों में है। आइए जानते हैं दशहरे से दिवाली तक हरिद्वार में गंगा नहर का पानी पूरी तरह सुखाए जाने के पीछे की ऐतिहासिक वजह, प्रशासनिक पेच और इससे जुड़े भौगोलिक पहलुओं की पूरी रिपोर्ट।

उत्तराखंड की जमीन पर यूपी सिंचाई विभाग का पहरा और ऐतिहासिक प्रशासनिक पेच

हरिद्वार की ऊपरी गंगा नहर (Upper Ganges Canal) का जल प्रबंधन और इसका प्रशासनिक ढांचा भारत के सबसे अनूठे अंतरराज्यीय समझौतों में से एक माना जाता है। साल 2000 में जब उत्तर प्रदेश से अलग होकर उत्तराखंड एक नया राज्य बना, तब से लेकर आज तक सिंचाई संपत्तियों का बंटवारा एक जटिल मुद्दा रहा है। हरिद्वार में भीमगोडा बैराज से निकलने वाली इस ऐतिहासिक गंगा नहर के संचालन, रखरखाव और इसके फाटकों (Gates) को खोलने व बंद करने का पूरा नियंत्रण उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग के पास ही बना हुआ है। यानी नहर उत्तराखंड के भूगोल से होकर गुजरती है, लेकिन इसके पानी के बहाव का फैसला लखनऊ स्थित यूपी सिंचाई विभाग के निर्देशों के तहत लिया जाता है। यही वजह है कि हर साल यूपी सिंचाई विभाग आधिकारिक नोटिस जारी करके दशहरे से दिवाली के बीच नहर की वार्षिक बंदी (Annual Canal Closure) की तारीख तय करता है।

दशहरे से दिवाली तक ही क्यों सुखाया जाता है गंगा नहर का पानी? जानिए मुख्य वजह

दशहरे से लेकर दिवाली तक के इस लगभग 20 दिनों के समय को गंगा नहर की सालाना मरम्मत, सफाई और निरीक्षण के लिए सबसे उपयुक्त अवधि माना जाता है। मानसूनी सीजन के खत्म होने के ठीक बाद पहाड़ों से बहकर आने वाले मलबे, भारी सिल्ट (गाद), पत्थरों और गंदगी को नहर की तली से हटाना बेहद जरूरी होता है। यदि इस गाद और मलबे की समय पर सफाई न की जाए, तो नहर के किनारों (Embankments) के टूटने और उत्तर प्रदेश के मैदानी इलाकों में पानी के असमान बहाव का बड़ा खतरा पैदा हो जाता है। दिवाली के बाद उत्तर प्रदेश और पश्चिमी भारत के विशाल मैदानी भागों में रबी फसलों (विशेषकर गेहूं की बुवाई) के लिए सिंचाई के पानी की भारी मांग होती है। इसलिए बुवाई का सीजन शुरू होने से ठीक पहले नहर की मरम्मत और तलहटी की सफाई का काम पूरा कर लिया जाता है।

हर की पौड़ी पर श्रद्धालुओं की आस्था और जल की अविरल धारा की वैकल्पिक व्यवस्था

जब 10,000 क्यूसेक से भी ज्यादा क्षमता वाली गंगा नहर का पानी भीमगोडा बैराज से बंद किया जाता है, तब हर की पौड़ी पर स्नान करने आने वाले श्रद्धालुओं की आस्था पर असर न पड़े, इसके लिए विशेष इंतजाम किए जाते हैं। बैराज से नहर का मुख्य बहाव रोककर पानी को नीलधारा (गंगा की प्राकृतिक मुख्य धारा) की ओर मोड़ दिया जाता है। हर की पौड़ी के ब्रह्मकुंड पर श्रद्धालुओं के आचमन और पावन स्नान के लिए बहुत ही सीमित मात्रा में जल (एस्केप चैनल के जरिए) छोड़ा जाता है, जिससे वहां की पवित्रता बनी रहे। लेकिन मुख्य नहर पूरी तरह से सूखी दिखाई देती है, जहां मजदूर और भारी मशीनें दिन-रात सफाई व मरम्मत के काम में जुटी रहती हैं।

ब्रिटिश काल का 175 साल पुराना इतिहास और हर की पौड़ी का ऐतिहासिक निर्माण

हरिद्वार की इस ऊपरी गंगा नहर का इतिहास बेहद गौरवशाली और ऐतिहासिक है। ब्रिटिश शासनकाल के दौरान 1842 से 1854 के बीच ब्रिटिश इंजीनियर सर प्रोबी कॉटले (Proby Cautley) के मार्गदर्शन में इस नहर का निर्माण कराया गया था। उस समय उत्तर प्रदेश (तत्कालीन यूनाइटेड प्रोविंस) के मैदानी इलाकों में पड़े भीषण अकाल से निपटने के लिए गंगा के पानी को नहरों के जरिए खेतों तक पहुंचाने का भागीरथी प्रयास किया गया था। निर्माण के समय से ही हर साल नहर की मियाद और मजबूती बनाए रखने के लिए इस वार्षिक बंदी की परंपरा चली आ रही है। 175 से अधिक वर्षों से चली आ रही यह व्यवस्था आज भी उसी सटीक वैज्ञानिक और तकनीकी तरीके से काम कर रही है।

स्थानीय पर्यटन, व्यापार और श्रद्धालुओं के बीच इस सालाना बंदी का असर

दशहरे से दिवाली के बीच हरिद्वार आने वाले लाखों पर्यटकों और श्रद्धालुओं के लिए सूखी नहर का नजारा एक तरफ जहां कौतूहल पैदा करता है, वहीं दूसरी तरफ स्थानीय व्यापारियों और पुरोहित समाज के लिए यह समय थोड़ा सुस्ती का होता है। हालांकि, सफाई अभियान के दौरान नहर के पक्के किनारों और घाटों की मरम्मत हो जाने से दिवाली के बाद आने वाले स्नान पर्वों (जैसे देव दीपावली और कार्तिक पूर्णिमा) पर श्रद्धालुओं को साफ और सुरक्षित घाट मिलते हैं। यूपी और उत्तराखंड सिंचाई विभाग के इंजीनियर मिलकर इस बात को सुनिश्चित करते हैं कि निर्धारित समय सीमा के भीतर सफाई पूरी करके दिवाली की रात तक गंगा नहर में फिर से पावन जल का पूर्ण प्रवाह बहाल कर दिया जाए।