अमेरिका के बमों से कांप रही थी रूसी पनडुब्बी, कप्तान ने परमाणु हमले का मन बनाया, फिर कैसे टला तीसरा विश्वयुद्ध?

अमेरिका के बमों से कांप रही थी रूसी पनडुब्बी, कप्तान ने परमाणु हमले का मन बनाया, फिर कैसे टला तीसरा विश्वयुद्ध?

इतिहास के पन्नों में कुछ ऐसी खौफनाक घटनाएं दर्ज हैं, जिनके बारे में सोचकर ही आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं। साल 1962 का क्यूबा मिसाइल संकट एक ऐसा ही दौर था जब पूरी दुनिया तीसरे विश्वयुद्ध के मुहाने पर खड़ी थी। समंदर की गहराइयों में छिपी एक सोवियत (रूसी) पनडुब्बी B-59 पर अमेरिकी नौसेना द्वारा लगातार गहराई में फटने वाले बम (डेप्थ चार्जेस) बरसाए जा रहे थे। जब पनडुब्बी के अंदर ऑक्सीजन खत्म हो रही थी और संपर्क पूरी तरह टूट चुका था, तब कप्तान ने अमेरिका पर न्यूक्लियर टॉरपीडो दागने का मन बना लिया था। आइए जानते हैं कि उस भयानक क्षण में ऐसा क्या हुआ जिसने पूरी दुनिया को परमाणु विनाश से बचा लिया।

समंदर की अतल गहराइयों में मौत का सन्नाटा और अमेरिकी बमों की गूंज

अक्टूबर 1962 में शीत युद्ध (Cold War) अपने सबसे खतरनाक मोड़ पर पहुंच चुका था। अमेरिका ने क्यूबा की ओर जाने वाले सभी सोवियत जहाजों और पनडुब्बियों की नाकाबंदी कर दी थी। इसी बीच सोवियत संघ की पनडुब्बी B-59 सरगासो सागर की गहराइयों में गश्त लगा रही थी। अमेरिकी युद्धपोतों को जैसे ही इस रूसी पनडुब्बी की मौजूदगी का पता चला, उन्होंने इसे सतह पर लाने के लिए सिग्नल डेप्थ चार्जेस दागना शुरू कर दिया। पानी के नीचे होने वाले इन भीषण धमाकों से पनडुब्बी थर-थर कांपने लगी थी और उसके अंदर मौजूद क्रू मेंबर्स के लिए हर एक सेकंड मौत के साए में बीत रहा था।

संपर्क टूटा, बढ़ा तापमान और कप्तान ने लिया परमाणु हमले का फैसला

पनडुब्बी B-59 कई दिनों से समंदर के नीचे गहराई में छिपी हुई थी, जिसकी वजह से उसका मॉस्को स्थित सोवियत मुख्यालय से संपर्क पूरी तरह कट चुका था। पनडुब्बी का एयर कंडीशनर सिस्टम खराब हो चुका था, जिससे अंदर का तापमान 50 डिग्री सेल्सियस से ऊपर चला गया था। ऑक्सीजन की भारी कमी और कार्बन डाइऑक्साइड के बढ़ते स्तर के कारण नौसैनिक बेहोश हो रहे थे। बाहर हो रहे लगातार धमाकों से पनडुब्बी के कप्तान वैलेन्टिन सावित्स्की को लगा कि अमेरिका और सोवियत संघ के बीच तीसरा विश्वयुद्ध शुरू हो चुका है। भयानक तनाव और दबाव में आकर कप्तान सावित्स्की ने पनडुब्बी में मौजूद 15-किलोटन क्षमता वाले न्यूक्लियर टॉरपीडो को अमेरिका के विमान वाहक पोत पर दागने का आदेश दे दिया।

वो एक इंसान जिसने अकेले अपने दम पर रोक दिया परमाणु महाविनाश

सोवियत सैन्य नियमों के मुताबिक, पनडुब्बी से परमाणु हथियार दागने के लिए तीन शीर्ष अधिकारियों—कप्तान वैलेन्टिन सावित्स्की, राजनीतिक अधिकारी इवान मास्लेनिकोव और ब्रिगेड चीफ ऑफ स्टाफ वासिली अरखिपोव का एकमत होना अनिवार्य था। कप्तान और राजनीतिक अधिकारी दोनों ने परमाणु हमला करने की मंजूरी दे दी थी, लेकिन वासिली अरखिपोव ने इसका सख्त विरोध किया। अरखिपोव ने असीम धैर्य और ठंडे दिमाग का परिचय देते हुए तर्क दिया कि ये धमाका हमले की शुरुआत नहीं बल्कि सतह पर आने का संकेत भी हो सकता है। उन्होंने कप्तान को शांत किया और पनडुब्बी को सतह पर लाकर पहले स्थिति की जांच करने के लिए राजी कर लिया। अगर अरखिपोव ने उस दिन मना न किया होता, तो अमेरिका पर परमाणु हमला होते ही पूरी दुनिया में न्यूक्लियर वॉर छिड़ जाती।

इतिहास का वो सबसे बहादुर हीरो जिसे दुनिया ने सालों बाद पहचाना

वासिली अरखिपोव के इस एक फैसले ने पूरी मानवता को एक ऐसे विनाश से बचा लिया जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। पनडुब्बी B-59 जैसे ही समुद्र की सतह पर आई, उसे अहसास हुआ कि कोई विश्वयुद्ध शुरू नहीं हुआ है। इसके बाद पनडुब्बी बिना कोई गोली चलाए चुपचाप सोवियत संघ लौट गई। इस घटना का सच दशकों तक दुनिया से छिपा रहा और शीत युद्ध खत्म होने के बाद ही लोगों को पता चला कि कैसे एक रूसी अधिकारी के साहस और सूझबूझ की वजह से धरती तबाह होने से बच गई थी। आज भी इतिहासकार वासिली अरखिपोव को 'वह व्यक्ति जिसने दुनिया को बचाया' के नाम से याद करते हैं।