पुतिन के शीर्ष जनरलों से मंत्रणा, टैंक से लेकर एयर डिफेंस सिस्टम तक भारत की पैनी नजर
अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और रक्षा गलियारों में इस समय एक बहुत बड़ा और सामरिक रूप से बेहद अहम घटनाक्रम सामने आया है, जो वैश्विक शक्तियों के बीच समीकरणों को नए सिरे से परिभाषित कर रहा है। भारत के सेना प्रमुख (Army Chief) ने महत्वपूर्ण रक्षा और रणनीतिक साझेदारियों को और अधिक मजबूत तथा धारदार बनाने के उद्देश्य से पूरे आठ साल के लंबे अंतराल के बाद रूस की आधिकारिक यात्रा की है। इस उच्च स्तरीय दौरे के दौरान भारतीय सेना प्रमुख ने रूस की राजधानी मास्को में रूसी सशस्त्र बलों के शीर्ष जनरलों और रक्षा अधिकारियों के साथ कई दौर की उच्च स्तरीय और गुप्त बैठकें की हैं। इस यात्रा का मुख्य केंद्र दोनों देशों के बीच दशकों पुराने रक्षा सहयोग को वर्तमान भू-राजनीतिक परिस्थितियों के अनुकूल ढालना और भविष्य की रक्षा जरूरतों को समय पर पूरा करना है। आधुनिक युद्धक प्रणालियों, काउंटर-टेररिज्म रणनीतियों और सीमा सुरक्षा के मोर्चे पर रूस का यह दौरा भारत के लिए बेहद निर्णायक साबित हो रहा है, क्योंकि दुनिया भर में तेजी से बदलते सुरक्षा समीकरणों के बीच भारत अपनी रक्षात्मक तैयारियों को किसी भी कीमत पर कम नहीं आंकना चाहता है।
आठ साल बाद भारतीय सेना प्रमुख के इस उच्च स्तरीय रूस दौरे के कूटनीतिक और सामरिक मायने
किसी भी देश के सेना प्रमुख का किसी अन्य सामरिक रूप से महत्वपूर्ण देश का दौरा केवल एक सामान्य शिष्टाचार यात्रा नहीं होता, बल्कि इसके पीछे गहरे भू-राजनीतिक संदेश और दीर्घकालिक रक्षा समझौते छिपे होते हैं। पिछले कुछ वर्षों में वैश्विक राजनीति में आए भारी उतार-चढ़ाव, पश्चिमी देशों के साथ भारत के बढ़ते सामरिक संबंधों और रूस-यूक्रेन संघर्ष के बाद उपजे नए आर्थिक व व्यापारिक प्रतिबंधों के बीच भारत और रूस के बीच रक्षा संबंधों की यह समीक्षा बेहद महत्वपूर्ण हो गई थी। लगभग एक दशक के बाद किसी भारतीय आर्मी चीफ का मॉस्को की इस तरह से यात्रा करना यह स्पष्ट संकेत देता है कि भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) की नीति पर पूरी दृढ़ता से कायम है और वह पारंपरिक रक्षा मित्रों के साथ अपने संबंधों को और गहरा करने से पीछे हटने वाला नहीं है। मास्को में रूसी रक्षा मंत्रालय और सैन्य नेतृत्व के साथ हुई इन बैठकों में दोनों देशों ने आपसी विश्वास को और अधिक प्रगाढ़ करने पर जोर दिया है, ताकि भविष्य में किसी भी प्रकार की वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला की बाधाओं से बचा जा सके और रक्षा मामलों में आत्मनिर्भरता की दिशा में तेजी से कदम बढ़ाए जा सकें।
अत्याधुनिक टी-90 टैंकों से लेकर S-400 और आगामी एयर डिफेंस सिस्टम तक दिल्ली की पैनी नजर
इस हाई-प्रोफाइल दौरे के एजेंडे में सबसे ऊपर भारत की थल सेना और वायु सेना की मारक क्षमता को और अधिक आधुनिक तथा घातक बनाना रहा है, जिसमें रूसी हथियारों और रक्षा उपकरणों की आपूर्ति पर सबसे ज्यादा चर्चा की गई है। भारतीय दल ने रूसी रक्षा प्रतिष्ठानों के अधिकारियों के साथ मिलकर अत्याधुनिक टी-90 भीष्म टैंकों के आधुनिकीकरण, उनके स्पेयर पार्ट्स की निर्बाध आपूर्ति और स्पेयर निर्माण तकनीक (Transfer of Technology) को भारत में ही स्थापित करने जैसे गंभीर मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की। इसके साथ ही, भारत की वायु रक्षा प्रणालियों (Air Defense Systems) को अत्याधुनिक बनाने और भविष्य की मिसाइल रक्षा आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए रूस के साथ चल रहे रक्षा प्रोजेक्ट्स की समीक्षा की गई। विशेष रूप से हालिया संघर्षों से मिले अनुभवों को ध्यान में रखते हुए कम और मध्यम दूरी की एयर डिफेंस क्षमताओं को मजबूत करने पर विशेष जोर दिया गया है, ताकि किसी भी संभावित हवाई या मिसाइल खतरे से देश के रणनीतिक ठिकानों की अचूक सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
भारत-रूस रक्षा सहयोग का भविष्य और रक्षा आत्मनिर्भरता की दिशा में बढ़ता नया कदम
रूस की इस सामरिक यात्रा के दौरान केवल तैयार सैन्य उपकरणों के आयात-निर्यात पर ही बात नहीं हुई, बल्कि 'मेक इन इंडिया' और रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता के दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए संयुक्त उत्पादन (Joint Production) और अनुसंधान पर भी विशेष फोकस किया गया। भारत पिछले कुछ वर्षों से लगातार इस बात पर जोर दे रहा है कि विदेशी रक्षा उपकरणों की केवल खरीद करने के बजाय उनकी तकनीक भारत में ही ट्रांसफर की जाए ताकि देश के भीतर ही रक्षा विनिर्माण को बढ़ावा मिल सके। रूसी समकक्षों ने भारत के इस दृष्टिकोण का स्वागत किया है और कई महत्वपूर्ण रक्षा प्रौद्योगिकियों को भारत के साथ साझा करने की संभावनाओं पर सहमति व्यक्त की है। विश्लेषकों का मानना है कि आर्मी चीफ की यह रूस यात्रा न केवल वर्तमान रक्षा परियोजनाओं को समय पर पूरा करने में मदद करेगी, बल्कि भविष्य में भारत की सैन्य ताक़त को अभेद्य बनाने की दिशा में एक नया मील का पत्थर साबित होगी, जिससे हिंद-प्रशांत और क्षेत्रीय सुरक्षा संतुलन में भी स्थिरता बनी रहेगी।