इटली में बर्फ की कब्र से निकल रहे मौत के सामान, 100 साल बाद भी जिंदा हैं ये बम

इटली में बर्फ की कब्र से निकल रहे मौत के सामान, 100 साल बाद भी जिंदा हैं ये बम

ग्लोबल वॉर्मिंग और जलवायु परिवर्तन के कारण दुनिया भर के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, लेकिन इटली के आल्प्स पर्वतीय इलाकों (Italian Alps) से बर्फ पिघलने के बाद जो खौफनाक दृश्य सामने आ रहा है, उसने पूरी दुनिया के होश उड़ा दिए हैं। इटली के बर्फ से ढके पहाड़ों में सदी पुरानी सफेद बर्फ की गहरी कब्र से अब द्वितीय विश्व युद्ध और प्रथम विश्व युद्ध के समय के ऐसे घातक और जिंदा बम, ग्रेनेड तथा तोप के गोले बाहर निकल रहे हैं, जो आज 100 साल बीत जाने के बाद भी बेहद खतरनाक और सक्रिय स्थिति में हैं। इन बर्फानी ग्लेशियरों के पिघलने से सामने आ रहे इस 'मौत के जखीरे' ने न केवल स्थानीय प्रशासन, सेना और बम निरोधक दस्तों (Bomb Disposal Squads) को सांसें रोक देने वाली आपातकालीन स्थिति में डाल दिया है, बल्कि वहां आने वाले पर्यटकों और पर्वतारोहियों की जान पर भी सीधा खतरा पैदा कर दिया है। 100 साल से भी अधिक समय तक शून्य से नीचे के तापमान में जमने के कारण ये गोला-बारूद नष्ट होने के बजाय पूरी तरह सुरक्षित रहे हैं और अब हल्के से घर्षण या तापमान बढ़ते ही कभी भी बड़ा धमाका कर सकते हैं।

ग्लेशियर पिघलने से खुला 100 साल पुराना राज: प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध का खौफनाक सच

प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918) के दौरान इटली और ऑस्ट्रिया-हंगरी साम्राज्य की सेनाओं के बीच आल्प्स के ऊंचे और बर्फीले पहाड़ों पर भयानक युद्ध लड़ा गया था, जिसे इतिहास में 'व्हाइट वॉर' (White War) के नाम से जाना जाता है। उस समय सेनाओं ने हजारों की संख्या में तोप के गोले, हाथ के गोले और माइंस पहाड़ों की गुफाओं और बर्फ की मोटी परतों के नीचे बिछाए थे। इसके बाद द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भी इटली के इन पहाड़ी इलाकों में भयंकर सैन्य लड़ाइयां लड़ी गईं। युद्ध समाप्त होने के बाद भारी बर्फबारी ने इस पूरे गोला-बारूद को अपने भीतर समेट लिया और यह एक सदी तक बर्फ की कुदरती कब्र में जमा रहा। अब जैसे-जैसे तापमान बढ़ रहा है और सदियों पुराने ग्लेशियर पिघलकर पीछे हट रहे हैं, वैसे-वैसे यह विस्फोटक सामान बिल्कुल नई और चमचमाती स्थिति में बाहर आ रहा है। फॉरेंसिक और सैन्य विशेषज्ञों के अनुसार, यह इस बात का सबूत है कि बर्फ की ठंडक ने इन बमों के रासायनिक घटकों (Chemical Compounds) और डेटोनेटरों को एक सदी तक बिल्कुल तरोताजा और सक्रिय बनाए रखा है।

बर्फ से बाहर निकलते ही जिंदा बम बने काल: इटली सेना और बम डिस्पोजल टीमों का रेस्क्यू ऑपरेशन

इटली के ट्रेंटिनो-अल्टो अडिगे (Trentino-Alto Adige) और लोम्बार्डी (Lombardy) क्षेत्रों के पर्वतीय इलाकों में जब स्थानीय ट्रैकर्स और सेना के गश्ती दलों ने इन सतह पर उभरे बमों को देखा, तो पूरे देश में रेड अलर्ट जारी कर दिया गया। इटली की सेना की विशेष इंजीनियर्स रेजिमेंट और बम निरोधक विशेषज्ञों को तुरंत इन खतरनाक स्थानों पर तैनात किया गया है। अधिकारियों का कहना है कि यह ऑपरेशन बेहद पेचीदा और जानलेवा है, क्योंकि बर्फ से बाहर निकलते ही सूरज की धूप और हवा के संपर्क में आने से ये बम अत्यधिक संवेदनशील (Volatile) हो जाते हैं। जरा सी लापरवाही या अनजाने में पैरों के नीचे आने पर यह सदियों पुराना बारूद तुरंत फट सकता है। सेना की टीमें हेलीकॉप्टरों और आधुनिक डिटेक्टरों की मदद से पूरे इलाके की घेराबंदी कर रही हैं और पाए जाने वाले विस्फोटकों को बेहद सावधानीपूर्वक सुरक्षित इलाकों में ले जाकर नियंत्रित धमाके (Controlled Detonations) के जरिए नष्ट कर रही हैं।

पर्यटकों, ट्रेकर्स और स्कीइंग करने वालों के लिए एडवाइजरी जारी: मंडरा रहा बड़ा खतरा

इटली के ये आल्प्स पर्वत दुनिया भर के स्कीइंग प्रेमियों, ट्रेकर्स और प्रकृति प्रेमियों के लिए सबसे पसंदीदा पर्यटन स्थलों में से एक माने जाते हैं। हर साल लाखों अंतरराष्ट्रीय पर्यटक इन बर्फीली वादियों का लुत्फ उठाने इटली पहुंचते हैं। हालांकि, बर्फ से निकल रहे इस मौत के सामान के कारण पर्यटन उद्योग पर भी गहरा असर पड़ा है। इटली के गृह मंत्रालय और स्थानीय प्रशासन ने पर्यटकों के लिए सख्त सुरक्षा दिशानिर्देश और चेतावनी जारी की है। पर्वतारोहियों को निर्धारित रास्तों (Designated Trails) से बाहर न जाने की सख्त ताकीद की गई है। साथ ही, अगर किसी व्यक्ति को धातु का कोई जंग लगा या नया दिखने वाला उपकरण, गोला या धातु का टुकड़ा बर्फ में नजर आता है, तो उसे गलती से भी न छूने और तुरंत आपातकालीन नंबरों पर अधिकारियों को सूचित करने का निर्देश दिया गया है।

केवल बम ही नहीं, बर्फ की कब्र से निकल रहे सैनिकों के शव और ऐतिहासिक अवशेष

इस खौफनाक और हैरान कर देने वाले घटनाक्रम का एक दूसरा मानवीय और ऐतिहासिक पहलू भी सामने आया है। ग्लेशियरों के पिघलने से केवल जिंदा बम ही नहीं बाहर आ रहे हैं, बल्कि 100 साल पहले 'व्हाइट वॉर' के दौरान शून्य से नीचे के तापमान में जम जाने वाले इतालवी और ऑस्ट्रियाई सैनिकों के पूरी तरह से सुरक्षित और ममीकृत (Mummified) शव भी सामने आ रहे हैं। उनके साथ उनके चमड़े के जूते, राइफलें, अधलिखे खत, व्यक्तिगत डायरियां और राशन की सामग्री भी वैसी ही मिल रही है जैसी 1915-1918 के दौरान थी। इटली के पुरातत्वविद और सैन्य इतिहासकार इन अवशेषों को सहेजने और सैनिकों की पहचान कर उनके वंशजों को अंतिम संस्कार के लिए सौंपने के काम में जुटे हुए हैं। यह दृश्य ऐसा लगता है मानो समय ठहर गया हो और इतिहास की पन्नों से निकलकर कड़वा सच सीधे वर्तमान के सामने आकर खड़ा हो गया हो।

जलवायु परिवर्तन का यह भयानक रूप: पूरी दुनिया के पर्वतीय क्षेत्रों के लिए बड़ी चेतावनी

आल्प्स में घट रही यह घटना केवल इटली के लिए ही एक बड़ा सबक नहीं है, बल्कि यह ग्लोबल वॉर्मिंग (Global Warming) के कारण पूरी दुनिया के लिए एक बड़ी चेतावनी बन चुकी है। वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर वैश्विक तापमान इसी रफ्तार से बढ़ता रहा, तो आने वाले वर्षों में आल्प्स के अलावा यूरोप, एशिया और अन्य महाद्वीपों के कई अन्य युद्ध क्षेत्रों में जमे पड़े पुराने विस्फोटक और रासायनिक हथियार भी सतह पर आ सकते हैं। इटली सरकार के लिए इस समय सबसे बड़ी चुनौती पूरे आल्प्स बेल्ट को इस 100 साल पुराने बारूद से मुक्त कराना है ताकि बेकसूर इंसानी जिंदगियों को बचाया जा सके। फिलहाल, इटली की सेना का यह बारूद हटाओ अभियान जारी है और इस खबर ने पूरी दुनिया को चौंका कर रख दिया है।