पहले ईरान से दुश्मनी की, अब उसी के दरबार में क्यों पहुंचा सऊदी अरब? अमेरिका की जंग में हाथ नहीं जलाएंगे MBS
मध्य पूर्व (मिडिल ईस्ट) की राजनीति में एक बार फिर बड़ा भूगर्भीय बदलाव देखने को मिल रहा है। दशकों तक एक-दूसरे के कट्टर विरोधी रहे सऊदी अरब और ईरान अब अचानक करीब आते दिख रहे हैं। अमेरिका और इजरायल के साथ ईरान के बढ़ते तनाव के बीच सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) की कूटनीतिक चालों ने दुनिया भर के राजनीतिक विश्लेषकों को चौंका दिया है। जो सऊदी अरब कभी ईरान को क्षेत्रीय अस्थिरता की मुख्य वजह मानता था, आज वही रियाद से तेहरान तक शांति और सहयोग के संदेश भेज रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि सऊदी अरब अब अमेरिकी युद्ध में अपने हाथ नहीं जलाना चाहता और क्षेत्रीय स्थिरता को अपनी प्राथमिकता बना चुका है।
अमेरिका-इजरायल बनाम ईरान संघर्ष से क्यों दूरी बना रहे हैं क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान?
मोहम्मद बिन सलमान का मुख्य ध्यान अपने महत्वाकांक्षी आर्थिक प्रोजेक्ट 'विज़न 2030' पर टिका है। इसके तहत सऊदी अरब अपनी अर्थव्यवस्था को तेल पर निर्भरता से हटाकर पर्यटन, तकनीक और व्यापार का वैश्विक केंद्र बनाना चाहता है। यदि मध्य पूर्व में अमेरिका या इजरायल का ईरान के साथ बड़ा युद्ध छिड़ता है, तो सऊदी अरब का यह अरबों डॉलर का प्रोजेक्ट पूरी तरह तबाह हो सकता है। अतीत में अरामको (Aramco) के तेल संयंत्रों पर हुए हमलों का कड़वा अनुभव सऊदी नेतृत्व के पास है। यही कारण है कि एमबीएस ने बहुत साफ संकेत दिया है कि सऊदी अरब अपनी जमीन, वायु क्षेत्र या संसाधनों का इस्तेमाल ईरान के खिलाफ किसी भी सैन्य कार्रवाई के लिए नहीं करने देगा।
रियाद से तेहरान का रुख: सऊदी अरब की नई 'संतुलन' वाली विदेश नीति का सच
चीन की मध्यस्थता में हुए ऐतिहासिक शांति समझौते के बाद से सऊदी अरब और ईरान के बीच राजनयिक संबंध लगातार मजबूत हो रहे हैं। हाल के दिनों में सऊदी और ईरानी अधिकारियों के बीच उच्च स्तरीय बैठकें हुई हैं, जिनमें क्षेत्रीय सुरक्षा और समुद्री रास्तों की सुरक्षा पर चर्चा की गई है। सऊदी अरब अब केवल अमेरिका के सुरक्षा छत्र पर निर्भर रहने के बजाय क्षेत्रीय देशों के साथ सीधे संवाद की नीति अपना रहा है। ईरान के साथ यह संवाद केवल एक कूटनीतिक मजबूरी नहीं, बल्कि सऊदी अरब की रणनीतिक सुरक्षा गारंटी भी है, ताकि यमन के हूती विद्रोहियों या अन्य क्षेत्रीय समूहों द्वारा सऊदी बुनियादी ढांचों पर हमले न हों।
अमेरिकी रणनीति को बड़ा झटका और मिडिल ईस्ट का नया राजनीतिक नक्शा
अमेरिका लंबे समय से मध्य पूर्व में 'अब्राहम एकॉर्ड्स' के जरिए इजरायल और अरब देशों का एक मजबूत ईरान-विरोधी मोर्चा बनाने की कोशिश कर रहा था। लेकिन सऊदी अरब के इस नए रुख से वाशिंगटन की रणनीतियों को गहरा झटका लगा है। सऊदी अरब ने स्पष्ट कर दिया है कि वह अपनी क्षेत्रीय संप्रभुता और आर्थिक हितों की बलि चढ़ाकर अमेरिका के किसी भी सैन्य दुस्साहस में शामिल नहीं होगा। इससे यह साबित होता है कि मिडिल ईस्ट में अब केवल पश्चिमी ताकतों का प्रभाव नहीं चलेगा, बल्कि क्षेत्रीय देश अपनी सुरक्षा और विदेश नीति के फैसले खुद तय करेंगे।