यूक्रेन युद्ध पर क्या रूस और अमेरिका से बन गई है सहमति-यूरोप ने दिया जवाब
रूस और यूक्रेन के बीच पिछले कई वर्षों से जारी विनाशकारी युद्ध को लेकर वैश्विक कूटनीति के गलियारों से एक बहुत बड़ी और सनसनीखेज खबर सामने आ रही है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया और राजनीतिक हलकों में यह चर्चा अचानक बेहद तेज हो गई है कि क्या दुनिया की दो महाशक्तियों यानी रूस और अमेरिका के बीच पर्दे के पीछे इस महायुद्ध को खत्म करने के लिए कोई गुप्त सहमति बन चुकी है। इस तरह की अटकलों के बाजार गर्म होते ही यूरोपीय संघ (EU) और यूरोपीय देशों के शीर्ष नेताओं की नींद उड़ गई है। अब यूरोपीय संघ के शीर्ष कूटनीतिज्ञों और रणनीतिकारों ने इन खबरों पर अपनी चुप्पी तोड़ते हुए बेहद सख्त और चौंकाने वाला आधिकारिक जवाब दिया है। यूरोप ने स्पष्ट शब्दों में दुनिया के सामने अपना रुख साफ कर दिया है कि बिना यूरोपीय राष्ट्रों और यूक्रेन की प्रत्यक्ष भागीदारी के बैकडोर से तैयार किया गया कोई भी शांति समझौता उन्हें मंजूर नहीं होगा।
क्या सचमुच रूस और अमेरिका के बीच पक रही है शांति समझौते की खिचड़ी
वैश्विक मीडिया रिपोर्ट्स और कूटनीतिक सूत्रों के हवाले से यह दावा किया जा रहा था कि अमेरिका और रूस के उच्च अधिकारियों के बीच पर्दे के पीछे कई दौर की अनौपचारिक बातचीत हुई है। इन चर्चाओं का मुख्य केंद्र बिंदु युद्ध को तुरंत रोककर मौजूदा फ्रंटलाइन पर ही सीजफायर लागू करना था, जिसमें यूक्रेन के कुछ इलाकों पर रूस के नियंत्रण को यथास्थिति के रूप में स्वीकार करने जैसे कड़वे विकल्प शामिल बताए जा रहे थे। जैसे ही इन बैठकों की भनक यूरोपीय देशों को लगी, रणनीतिक हलकों में हलचल मच गई। विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका में बदलते राजनीतिक परिदृश्य और बढ़ते आर्थिक दबावों के बीच वॉशिंगटन युद्ध को जल्द से जल्द विराम देने की दिशा में विचार कर रहा है, जो यूरोप की सुरक्षा प्राथमिकताओं से मेल नहीं खाता है।
यूरोप ने सख्त लहजे में दिया जवाब: 'हमारी और यूक्रेन की मर्जी के बिना कोई डील संभव नहीं'
इन अटकलों पर पूर्ण विराम लगाते हुए यूरोपीय संघ के शीर्ष विदेश नीति प्रतिनिधियों और प्रमुख यूरोपीय देशों (फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन) के नेताओं ने एक संयुक्त और आक्रामक बयान जारी किया है। यूरोप ने कड़े शब्दों में कहा कि यूक्रेन की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के साथ किसी भी प्रकार का समझौता बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। यूरोपीय नेताओं ने साफ कर दिया कि "यूक्रेन के भविष्य का फैसला केवल यूक्रेनियन ही करेंगे, और यूरोप की सुरक्षा से जुड़ा कोई भी निर्णय यूरोप को दरकिनार करके अमेरिका और रूस आपस में तय नहीं कर सकते।" यूरोपीय संघ ने चेतावनी दी है कि यदि ऐसा कोई एकतरफा फैसला थोपने की कोशिश की जाती है, तो यूरोप अपनी सुरक्षा और सैन्य सहायता के दम पर यूक्रेन का साथ पूरी ताकत से जारी रखेगा।
यूरोपीय देशों के भीतर भी दिखने लगे मतभेद और भू-राजनीतिक समीकरणों का नया मोड़
भले ही यूरोपीय संघ आधिकारिक तौर पर एक कड़ा रुख अपना रहा हो, लेकिन हकीकत यह भी है कि खुद यूरोप के कई देशों के भीतर इस लंबे खिंचते युद्ध को लेकर भारी असंतोष और मतभेद पनप रहे हैं। ऊर्जा संकट, रिकॉर्ड तोड़ महंगाई और अपनी सैन्य तिजोरियों के खाली होने से त्रस्त कुछ पूर्वी और मध्य यूरोपीय देश अब युद्ध को जल्द खत्म करने के पक्ष में दिखने लगे हैं। वहीं दूसरी तरफ नाटो (NATO) के मुख्य सहयोगी देश इस बात से आशंकित हैं कि यदि रूस को इस युद्ध में किसी भी प्रकार की क्षेत्रीय रियायत मिलती है, तो भविष्य में बाल्टिक और अन्य यूरोपीय देशों की सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा पैदा हो जाएगा। यही वजह है कि अमेरिका और रूस के बीच संभावित बातचीत की खबरों ने यूरोप के पेट में दर्द पैदा कर दिया है।
क्या मोड़ लेगा यह महायुद्ध और वैश्विक शांति के लिए आगे का रास्ता कैसा होगा
कूटनीति विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले कुछ महीने यूक्रेन-रूस युद्ध के भविष्य और वैश्विक राजनीति का नया ढांचा तय करने के लिए सबसे ज्यादा निर्णायक साबित होने वाले हैं। यदि अमेरिका और रूस के बीच सचमुच रणनीतिक स्तर पर बातचीत आगे बढ़ती है, तो यूरोप पर भी इस नए वैश्विक समझौते को स्वीकार करने का भारी कूटनीतिक दबाव बनेगा। हालांकि, किसी भी स्थायी शांति समझौते के लिए रूस, अमेरिका, यूरोप और खुद यूक्रेन के बीच एक साझा सहमति का बनना बेहद अनिवार्य है। तब तक के लिए, बयानबाजी और रणनीतिक खींचतान का यह दौर जारी रहेगा और पूरी दुनिया की नजरें वॉशिंगटन, मॉस्को और ब्रुसेल्स के अगले कदमों पर टिकी रहेंगी।