रेलवे ट्रैक पर कैसे टकराईं 2 हाईस्पीड ट्रेनें? सरकार का जवाब सुनकर लगेगा झटका
भारतीय रेलवे दुनिया के सबसे बड़े रेल नेटवर्क्स में शुमार है, जहां प्रतिदिन करोड़ों यात्री सुरक्षित सफर करने के लिए ट्रेनों पर भरोसा करते हैं। लेकिन हाल ही में देश के एक व्यस्त रेल खंड पर जो दर्दनाक और दिल दहला देने वाली घटना घटी, उसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। पटरियों पर दौड़ती दो हाई-स्पीड ट्रेनें आमने-सामने या एक ही ट्रैक पर इस तरह कैसे टकरा गईं कि पलभर में भयानक तबाही मच गई, यह सवाल हर किसी के जेहन में कौंध रहा था। इस गंभीर और संवेदनशील मामले पर जब देश की संसद और अधिकारिक मंचों से सरकार की ओर से जवाब सामने आया, तो उसे सुनकर आम जनता से लेकर रेलवे विशेषज्ञ तक सन्न रह गए। सरकार के इस खुलासे ने रेल संचालन की सुरक्षा प्रणालियों, सिग्नलिंग फेल्योर और मानवीय भूल (Human Error) के दावों की पोल खोलकर रख दी है, जिससे भविष्य में ट्रेन सफर की सुरक्षा को लेकर गहरी चिंताएं खड़ी हो गई हैं।
सरकार और रेलवे बोर्ड की रिपोर्ट में क्या चौंकाने वाला खुलासा आया सामने
रेल मंत्रालय और उच्च स्तरीय जांच समितियों द्वारा संसद में पेश की गई विस्तृत रिपोर्ट के मुताबिक, इस हाई-स्पीड ट्रेन टक्कर के पीछे कोई एक नहीं बल्कि कई तकनीकी और प्रशासनिक खामियों का खतरनाक कॉकटेल जिम्मेदार पाया गया है। रिपोर्ट में यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है कि ट्रेनें पूरी तरह से अत्याधुनिक ऑटोमैटिक सिग्नलिंग सिस्टम और कवच (Kavach Protection System) जैसी आधुनिक तकनीक से लैस होने का दावा करती हैं, लेकिन उस दिन इंटरलॉकिंग सिस्टम में अचानक आई एक गंभीर तकनीकी गड़बड़ी के कारण कंट्रोल रूम को गलत फीड मिल रही थी। ड्राइवरों और स्टेशन मास्टर के बीच आपसी संवादहीनता (Communication Gap) और अत्यधिक व्यस्त रूट पर ट्रेनों के संचालन का भारी दबाव इस खौफनाक हादसे की मुख्य वजह बना। सरकार के इस जवाब ने यह साबित कर दिया कि जितने दावे कागजों और विज्ञापनों में सुरक्षा के किए जाते हैं, जमीनी हकीकत उससे काफी ज्यादा कोसों दूर है।
आधुनिक तकनीक और कवच प्रणाली के दावों पर उठे बड़े सवाल
एक तरफ भारतीय रेलवे लगातार वंदे भारत और अमृत भारत जैसी हाई-स्पीड ट्रेनों के संचालन के साथ-साथ 'कवच' तकनीक के जरिए दुर्घटनाओं को शून्य (Zero Accidents) करने के दावे कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ इस तरह की भीषण टक्कर ने इन सभी तकनीकी दावों की हवा निकाल दी है। विशेषज्ञों का कहना है कि जब देश में ऑटोमैटिक ट्रेन प्रोटेक्शन सिस्टम काम कर रहा है, तो फिर दो तेज रफ्तार ट्रेनें एक ही ट्रैक पर कैसे आमने-सामने आ गईं। क्या यह सेंसर की नाकामी थी या फिर मेंटेनेंस में बरती गई भारी लापरवाही, इन तमाम बिंदुओं पर सरकार का जवाब पूरी तरह से स्पष्ट नहीं हो पाया है। आम नागरिकों और रेल यात्रियों के मन में अब यह बड़ा डर बैठ गया है कि क्या बुलेट और सुपरफास्ट ट्रेनों के इस दौर में उनकी जान सचमुच सुरक्षित है या वे भगवान भरोसे सफर कर रहे हैं।
विपक्ष और आम जनता का तीखा गुस्सा, रेलवे सुरक्षा पर देशव्यापी बहस छिड़ी
रेलवे ट्रैक पर हुई इस हाई-स्पीड टक्कर और सरकार के गोलमोल जवाब के बाद देश भर में सियासी भूचाल आ गया है। विपक्षी दलों ने रेल मंत्री और रेलवे बोर्ड के शीर्ष अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर कड़े सवाल उठाते हुए इस्तीफे की मांग तेज कर दी है। सोशल मीडिया से लेकर आम चौपालों तक यही चर्चा है कि यदि देश के सबसे आधुनिक परिवहन साधनों में इस तरह की लापरवाही बरती जाएगी, तो आम आदमी का भरोसा रेलवे से पूरी तरह उठ जाएगा। यात्रियों ने मांग की है कि केवल लीपापोती करने वाली जांच कमेटियां बनाने की बजाय उन लापरवाह अधिकारियों और कर्मचारियों पर सख्त आपराधिक मुकदमे दर्ज किए जाएं जिनकी वजह से बेकसूर लोगों की जिंदगियां खतरे में पड़ जाती हैं।
भविष्य में ऐसे हादसों को रोकने के लिए रेलवे की नई कार्ययोजना और सुरक्षा मानक
इस दर्दनाक हादसे से सबक लेते हुए रेलवे बोर्ड ने अब देश भर के सभी प्रमुख रेल कॉриडोर पर सुरक्षा ऑडिट (Safety Audit) कराने के आदेश जारी किए हैं। इसके साथ ही सिग्नलिंग सिस्टम के मैनुअल ओवरराइड विकल्पों को सख्त बनाने, ड्राइवरों की कार्य-अवधि की समीक्षा करने और कवच तकनीक के दायरे को युद्ध स्तर पर देश के बाकी रेल नेटवर्क तक फैलाने का नया निर्देश दिया गया है। सरकार ने भले ही इस घटना के बाद कई सुधारात्मक कदम उठाने का भरोसा दिलाया हो, लेकिन जनता का यह मानना है कि जब तक रेलवे महकमा अपनी कार्यसंस्कृति में पारदर्शिता और जवाबदेही तय नहीं करेगा, तब तक पटरियों पर इस तरह के खौफनाक हादसों से पूरी तरह निजात मिलना नामुमकिन है।