इज़राइल में त्रिशंकु संसद: नेतन्याहू को तगड़ा झटका, क्या अरब पार्टियां तय करेंगी किसकी बनेगी सरकार?

इज़राइल में त्रिशंकु संसद: नेतन्याहू को तगड़ा झटका, क्या अरब पार्टियां तय करेंगी किसकी बनेगी सरकार?

इज़राइल के संसदीय चुनाव बेहद रोमांचक और उलझे हुए मोड़ पर पहुंच गए हैं। मतगणना के लगभग 90 फीसदी आंकड़े सामने आने के बाद भी किसी दल या गठबंधन को स्पष्ट बहुमत मिलता नजर नहीं आ रहा है। 120 सीटों वाली नेसेट में सरकार बनाने के लिए 61 सीटों का आंकड़ा जरूरी है, लेकिन प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का धड़ा 53 सीटों पर सिमटता दिख रहा है, वहीं मुख्य विपक्षी चेहरे और पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइजेनकोट के नेतृत्व वाले गठबंधन को करीब 48 सीटें मिलती नजर आ रही हैं। इस चुनाव का सबसे चौंकाने वाला पहलू अरब नेतृत्व वाली पार्टियों का ऐतिहासिक प्रदर्शन रहा है, जिनके खाते में 19 सीटें जाने का अनुमान है। अरब मतदाताओं की इस रिकॉर्ड लामबंदी ने उन्हें सीधे तौर पर सरकार बनाने की चाबी थमा दी है।

देश में 1999 के बाद सबसे ज्यादा, करीब 78 फीसदी मतदान दर्ज किया गया। यह भारी मतदान नेतन्याहू के धुर-दक्षिणपंथी सहयोगियों और अल्ट्रा-ऑर्थोडॉक्स यहूदियों को सैन्य सेवा से छूट दिए जाने के खिलाफ उपजे जनआक्रोश का नतीजा माना जा रहा है। 7 अक्टूबर 2023 के हमलों के बाद सुरक्षा चूकों को लेकर जनता में नाराजगी जरूर थी, जिसका असर लिकुड पार्टी के वोट शेयर में गिरावट के रूप में दिखा, लेकिन विपक्ष इस गुस्से को नेतन्याहू के पूरी तरह सफाए में तब्दील करने में नाकाम रहा। नेतन्याहू के विवादित सहयोगी और नेशनल सिक्योरिटी मिनिस्टर इतामार बेन-ग्विर के जनाधार में भी भारी सेंध लगी है। हालांकि, लिकुड अब भी सबसे बड़ी पार्टी के रूप में बरकरार है, जिससे राष्ट्रपति आइज़ैक हर्ज़ोग सरकार बनाने की पहली पहल नेतन्याहू से ही करने को कह सकते हैं।

सत्ता की चाबी अब अरब पार्टियों के रुख और विपक्षी नेताओं के फैसले पर टिकी है। नेतन्याहू ने अरब दलों के साथ किसी भी तरह के समझौते को सिरे से खारिज करते हुए इसे देशद्रोह करार दिया है और उनके साथ बनने वाली किसी भी सरकार को खतरनाक बताया है। वहीं दूसरी तरफ, आइज़ेनकोट ने कुछ कड़े नियमों और शर्तों के साथ अरब पार्टियों के समर्थन से गठबंधन बनाने के संकेत दिए हैं। हालांकि, इज़राइल की आंतरिक राजनीति में यहूदियों और अरब नागरिकों के बीच दशकों पुराने गहरे अविश्वास को देखते हुए यह राह आसान नहीं है। डेमोक्रेट्स पार्टी के प्रमुख याइर गोलान जैसे नेता इस गतिरोध को तोड़ने और अरब दलों को सत्ता में हिस्सेदार बनाने की पुरजोर वकालत कर रहे हैं, ताकि देश को विभाजनकारी राजनीति से बाहर निकाला जा सके।

मौजूदा राजनीतिक पहेली को सुलझाने में करीब 5 लाख एब्सेंटी बैलेट, जिनमें सैन्य कर्मियों और राजनयिकों के वोट शामिल हैं, बेहद अहम भूमिका निभाएंगे। सेंट्रल इलेक्शन कमिटी के अनुसार इन वोटों की गिनती पूरी होने के बाद ही अंतिम तस्वीर साफ होगी। यदि कोई भी खेमा 61 सांसदों का समर्थन जुटाने में विफल रहता है, तो देश में या तो बाहर से समर्थन वाली अल्पमत सरकार बनेगी या फिर जनता को 2019 से 2022 की तरह एक बार फिर नए चुनावों की ओर धकेल दिया जाएगा। राष्ट्रपति हर्ज़ोग और आइज़ेनकोट दोनों ने ही चेताया है कि रिकॉर्ड मतदान के बाद फिर से चुनाव कराना जनता के जनादेश का अपमान होगा, इसलिए आने वाले दिन तेल अवीव और यरूशलेम में गठबंधन की जोड़-तोड़ और मैराथन बैठकों से भरे रहने वाले हैं।