भारत के ब्रह्मोस सुपरसोनिक मिसाइल दांव से अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति में मचा भूचाल

भारत के ब्रह्मोस सुपरसोनिक मिसाइल दांव से अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति में मचा भूचाल

वैश्विक भू-राजनीति और रक्षा बाजार के क्षितिज से इस वक्त एक बहुत बड़ी, सामरिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण और सनसनीखेज खबर सामने आ रही है, जिसने मध्य पूर्व से लेकर दक्षिण एशिया तक की राजनीतिक समीकरणों को हिलाकर रख दिया है। भारत और रूस के संयुक्त उपक्रम से तैयार दुनिया की सबसे तेज और घातक सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल 'ब्रह्मोस' (BrahMos Missile) की बढ़ती ग्लोबल डिमांड और रणनीतिक निर्यात ने तुर्की (Turkey) के राष्ट्रपति रेसेप तennप एर्दोगन (Recep Tayyip Erdogan) की रातों की नींद उड़ा दी है। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने जिस प्रकार रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में 'आत्मनिर्भर भारत' का परचम लहराते हुए मित्र देशों को ब्रह्मोस जैसी अत्याधुनिक मिसाइलें सप्लाई करने के सौदे किए हैं, उसने उन देशों के होश उड़ा दिए हैं जो अंतरराष्ट्रीय मंचों पर हमेशा भारत विरोधी ताकतों और विशेषकर पाकिस्तान (Pakistan) का खुला समर्थन करते आए हैं। तुर्की, जो लंबे समय से पाकिस्तान को सैन्य सहायता, ड्रोन तकनीक और कूटनीतिक मंचों पर समर्थन देकर दक्षिण एशिया में भारत के खिलाफ एक नया मोर्चा बनाने की फिराक में था, अब भारत के इस आक्रामक डिफेंस डिप्लोमैटिक दांव से बुरी तरह घबरा गया है।

क्यों एर्दोगन के लिए बड़ी टेंशन बन रहा है भारत का रक्षा निर्यात और सामरिक साझेदारी का विस्तार?

तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन के नेतृत्व में अंकारा सरकार पिछले कुछ समय से खुद को इस्लामिक दुनिया का नया खलीफा या लीडर साबित करने की होड़ में जुटी हुई है। इसी एजेंडे के तहत तुर्की ने पाकिस्तान के साथ सैन्य, नौसैनिक और खुफिया समझौतों का जाल बिछाना शुरू किया था, ताकि कश्मीर मुद्दे या अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान के जरिए भारत पर कूटनीतिक दबाव बनाया जा सके। लेकिन भारत ने अपनी विदेश नीति और रक्षा कूटनीति में एक मास्टरस्ट्रैटेजी अपनाते हुए तुर्की के पारंपरिक प्रतिद्वंद्वियों और मध्य एशिया व पूर्वी यूरोप के देशों—विशेषकर फिलीपींस, वियतनाम और अन्य मित्र देशों—के साथ ब्रह्मोस मिसाइल के बड़े रक्षा सौदे फाइनल कर दिए। जब दुनिया ने देखा कि भारत अब केवल हथियार खरीदने वाला देश नहीं रहा, बल्कि दुनिया को सबसे आधुनिक और किफायती रक्षा उपकरण बेचने वाला एक महाशक्ति बनता जा रहा है, तो तुर्की के सामरिक विश्लेષकों में हड़कंप मच गया। भारत के इस कदम से पाकिस्तान की उस सैन्य श्रेष्ठता के गुब्बारे की हवा निकल गई है जिस पर वह अंधा भरोसा करता था।

पाकिस्तानी दोस्त की हो रही है चहुं ओर से घेराबंदी, रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि बदल चुका है ग्लोबल डिफेंस मार्केट

रक्षा मामलों और भू-राजनीतिक रणनीतिकारों का यह स्पष्ट रूप से मानना है कि ब्रह्मोस मिसाइल की मारक क्षमता, सटीकता और सुपरसोनिक स्पीड का मुकाबला करने की ताकत आज की तारीख में पाकिस्तान या उसके किसी भी सहयोगी देश के एयर डिफेंस सिस्टम के पास नहीं है। जब भारत ने फिलीपींस जैसे रणनीतिक रूप से संवेदनशील देश को ब्रह्मोस मिसाइलें सौंपीं, तो दक्षिण चीन सागर से लेकर हिंद महासागर तक चीन और उसके पिछलग्गू देशों को यह कड़ा संदेश मिल गया कि भारत अब अपनी समुद्री और सीमा सुरक्षा को लेकर किसी भी हद तक जा सकता है। तुर्की, जो खुद को डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग में बहुत बड़ा तीस मार खान समझता था, वह भी भारत के इस तकनीकी और आर्थिक कद के सामने बौना नजर आने लगा है। पाकिस्तान और तुर्की की बढ़ती धुरी को काउंटर करने के लिए भारत की यह 'सॉफ्ट और हार्ड पावर' नीति बेहद सफल साबित हो रही है, जिससे अंकारा में यह डर बैठ गया है कि कहीं आने वाले समय में दक्षिण एशिया और पश्चिम एशिया के व्यापारिक व रणनीतिक समीकरणों से उन्हें पूरी तरह बाहर न कर दिया जाए।

तुर्की की अर्थव्यवस्था और कूटनीतिक अलगाव पर मंडराता संकट, भारत के खिलाफ हर साजिश हो रही है विफल

एक तरफ जहां तुर्की की घरेलू अर्थव्यवस्था भयंकर महंगाई, मुद्रा के अवमूल्यन और आंतरिक राजनीतिक संकट से जूझ रही है, वहीं दूसरी तरफ राष्ट्रपति एर्दोगन की महत्वाकांक्षाएं उन्हें अनावश्यक रूप से वैश्विक विवादों में घसीट रही हैं। भारत के खिलाफ पिछले दरवाजे से पाकिस्तान को सैन्य ड्रोन और सामरिक मदद मुहैया कराने वाले तुर्की को अब यह डर सताने लगा है कि भारत अपनी आर्थिक ताकत और मजबूत होते वैश्विक संबंधों के जरिए उसके क्षेत्रीय प्रभाव को कुचल सकता है। भारत ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में यह साबित कर दिया है कि जो देश आतंकवाद या भारत विरोधी ताकतों को शह देंगे, उनके सामरिक हितों को कूटनीतिक मंचों पर कैसे नेस्तनाबूद किया जाता है। ब्रह्मोस का यह सफल दांव सिर्फ एक हथियार का सौदा नहीं है, बल्कि यह नए और आत्मनिर्भर भारत की वह दहाड़ है जिससे ड्रैगन और पाकिस्तान के साथ-साथ तुर्की जैसे तुनकमिजाज देश भी अब अंदर से कांपने लगे हैं।