रूस-यूक्रेन जंग रोकने भारत का बड़ा मास्टरस्ट्रोक, जयशंकर का 3 सूत्रीय शांति प्लान तैयार
रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे विध्वंसक युद्ध को चार साल से अधिक का समय बीत चुका है, जिसमें लाखों जिंदगियां खत्म हो चुकी हैं लेकिन शांति की राह अब भी धुंधली है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने दूसरे कार्यकाल की शुरुआत से ही कूटनीतिक वार्ताओं से लेकर सख्त चेतावनियों तक तमाम पैंतरे आजमाए, फिर भी युद्ध विराम की कोशिशें परवान नहीं चढ़ सकीं। इस वैश्विक गतिरोध और चरमराती सप्लाई चेन के बीच अब भारत ने दुनिया को संकट से उबारने के लिए ऐतिहासिक कूटनीतिक पहल की है।
नई दिल्ली की ओर से तैयार किए गए इस शांति फॉर्मूले की नींव विदेश मंत्री डॉ. एस जयशंकर की ऐतिहासिक यूक्रेन यात्रा के दौरान रखी गई। 3 सितंबर को राजधानी कीव में राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की से सीधी बातचीत करते हुए जयशंकर ने साफ संदेश दिया था कि भारत दोनों देशों के बीच स्थायी शांति बहाली के लिए हर संभव सहयोग देने को तैयार है। बतौर विदेश मंत्री उनकी इस पहली आधिकारिक यूक्रेन यात्रा ने भारत की मध्यस्थता की भूमिका को अंतरराष्ट्रीय पटल पर बेहद मजबूत कर दिया है।
भारत की यह 3-सूत्रीय योजना जंग के सबसे संवेदनशील मानवीय और आर्थिक मोर्चों पर केंद्रित है। इसमें पहला बिंदु दोनों पक्षों द्वारा एक-दूसरे के ऊर्जा संयंत्रों और प्रमुख बुनियादी ढांचों पर तुरंत मिसाइल व ड्रोन हमले रोकने का है। दूसरा बिंदु काला सागर (Black Sea) के बंदरगाहों से अनाज और ईंधन की सुरक्षित आवाजाही बहाल रखने का है, ताकि दुनिया में भुखमरी और महंगाई का संकट न गहराए। तीसरा अहम पहलू ब्लैक सी से गुजरने वाले अंतरराष्ट्रीय वाणिज्यिक जहाजों को सैन्य हमलों और गोलाबारी से पूर्ण सुरक्षा देना है।
भारत का यह दृष्टिकोण मिस्र, तुर्की और अमेरिका के पिछले प्रस्तावों से कहीं अधिक संतुलित और व्यावहारिक है। तुर्की और मिस्र का ध्यान सिर्फ अनाज की ढुलाई तक सीमित था, जबकि अमेरिका का जोर केवल ऊर्जा युद्धविराम पर रहा। भारत ने इन दोनों प्राथमिकताओं को एक साथ जोड़कर समग्र खाका खींचा है। कई दौर की बैठकों, व्हाइट हाउस वार्ताओं और मॉस्को तक की दौरों के बाद जब वाशिंगटन के प्रयास बेअसर साबित हुए, तब भारत का यह कूटनीतिक रोडमैप शांति की सबसे मजबूत उम्मीद बनकर उभरा है।