अमेरिका के लिए 'बाली' बन गया ईरान: थाड और पैट्रियट डिफेंस सिस्टम की खींच ली सारी ताकत

अमेरिका के लिए 'बाली' बन गया ईरान: थाड और पैट्रियट डिफेंस सिस्टम की खींच ली सारी ताकत

मध्य पूर्व (Middle East) के युद्ध के मैदान से महाशक्ति अमेरिका (USA) के लिए एक ऐसी हैरान करने वाली और चिंताजनक खबर सामने आई है, जिसने वाशिंगटन से लेकर पेंटागन तक के होश उड़ा कर रख दिए हैं। दशकों से दुनिया भर में अपनी अजेय तकनीकी श्रेष्ठता और सैन्य साजो-सामान का ढोल पीटने वाला अमेरिका आज ईरान के रणनीतिक पैतरों के आगे लाचार नजर आ रहा है। रक्षा विशेषज्ञों और वैश्विक मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान ने अमेरिकी सुरक्षा कवच के लिए ऐसा 'बाली' जैसा चक्रव्यूह रच दिया है, जिसके सामने अमेरिका के सबसे आधुनिक और महंगे एंटी-मिसाइल डिफेंस सिस्टम यानी THAAD (Terminal High Altitude Area Defense) और Patriot सिस्टम पूरी तरह बेदम साबित हो रहे हैं। ईरान ने अपनी चतुराई और आधुनिक असंतुलित युद्धनीति के जरिए अमेरिकी रक्षा प्रणालियों की सारी ताकत खींच ली है, जिससे अमेरिका के पानी की तरह बहाए गए 38 अरब डॉलर से अधिक के फंड धू-धू कर बर्बाद हो चुके हैं और देखते ही देखते अमेरिकी खजाने पर कंगाली के बादल छाने लगे हैं। आइए इस पूरी वैश्विक भू-राजनीतिक उथल-पुथल, डिफेंस फेल्योर और आर्थिक संकट के हर एक पहलू को गहराई से समझते हैं।

कैसे ईरान ने अमेरिका के सबसे महंगे THAAD और पैट्रियट डिफेंस सिस्टम को किया मात?

अमेरिकी सैन्य रणनीति का मुख्य आधार हमेशा से यह रहा है कि उनके पास दुनिया का सबसे बेहतरीन एयर डिफेंस नेटवर्क है, जिसके जरिए वे किसी भी देश की मिसाइल या ड्रोन को आसमान में ही नेस्तनाबूद कर सकते हैं। लेकिन ईरान और उसके क्षेत्रीय सहयोगियों ने पारंपरिक युद्ध के नियमों को दरकिनार करते हुए एक ऐसा नया खेल खेला है जिसने पेंटागन के तमाम गणित को फेल कर दिया है। ईरान ने बेहद कम लागत वाले स्वार्म ड्रोन्स, कम दूरी की अत्याधुनिक मिसाइलों और इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग तकनीक का ऐसा जाल बिछाया, जिसके सामने अमेरिका के करोड़ों डॉलर के THAAD और पैट्रियट सिस्टम हांफने लगे। स्थिति यह हो गई कि अमेरिका को अपने एक छोटे से मिसाइल को रोकने के लिए लाखों-करोड़ों डॉलर की इंटरसेप्टर मिसाइलें दागनी पड़ रही हैं, जिससे कुछ ही हफ्तों में उनका भारी-भरकम गोला-बारूद और वित्तीय बजट तेजी से खाली हो गया।

38 अरब डॉलर का भारी-भरकम खर्च और अमेरिका पर मंडराता वित्तीय संकट

युद्ध के मैदान में हथियारों की जंग से ज्यादा खतरनाक अब आर्थिक मोर्चे पर होने वाली बर्बादी बन चुकी है। अमेरिकी रक्षा विभाग और सीनेट की हालिया रिपोर्टों से यह खुलासा हुआ है कि मध्य पूर्व में अपने सैन्य अड्डों और इजरायल जैसे सहयोगियों की रक्षा करने के चक्कर में अमेरिका ने पिछले कुछ समय में 38 अरब डॉलर से अधिक की भारी-भरकम रकम झोंक दी है। इतने बड़े पैमाने पर फंड के लगातार खर्च होने के कारण अमेरिकी अर्थव्यवस्था और संघीय बजट पर इसका बेहद बुरा असर पड़ने लगा है। अमेरिकी करदाताओं का पैसा जिस प्रकार विदेशी जमीन पर धुआं बनकर उड़ रहा है, उससे वहां की घरेलू राजनीति में भी राष्ट्रपति और जो बाइ Biden या अमेरिकी प्रशासन के खिलाफ तीखी प्रतिक्रियाएं शुरू हो चुकी हैं। अर्थशास्त्रियों का यह मानना है कि यदि यही हाल कुछ समय और रहा, तो अमेरिका को अपनी घरेलू बुनियादी जरूरतों और विकास कार्यों के लिए भी कर्ज के दलदल में फंसना पड़ सकता है।

वैश्विक हथियारों के बाजार में अमेरिकी साख को लगा तगड़ा झटका, पश्चिमी देशों में खलबली

इस पूरी घटना का सबसे बड़ा रणनीतिक नुकसान अमेरिका को यह उठाना पड़ा है कि वैश्विक रक्षा बाजार में उसके हथियारों की अजेय साख को भारी धक्का लगा है। दुनिया के तमाम देश जो अब तक आंख मूंदकर अमेरिकी पैट्रियट और थाड डिफेंस सिस्टम खरीदने के लिए खरबों डॉलर खर्च करते थे, वे अब यह सोचने पर मजबूर हो गए हैं कि क्या ये सिस्टम सच में उतने ताकतवर हैं जितना अमेरिका दावा करता है। जब ईरान जैसे देशों के खिलाफ ये महंगे सिस्टम अपनी पूरी क्षमता दिखाने में विफल साबित हो रहे हैं, तो खाड़ी देशों और एशियाई देशों के रक्षा मंत्री अपने बजट के पुनर्विचार पर मजबूर हो गए हैं। रूस, चीन और अन्य हथियार निर्यातक देश इस स्थिति का पूरा फायदा उठाने की फिराक में हैं, क्योंकि उन्हें यह मौका मिल गया है कि वे अमेरिकी हथियारों के विकल्प के रूप में अपनी स्वदेशी और किफायती तकनीक को दुनिया के सामने पेश कर सकें।

मध्य पूर्व के नए भू-राजनीतिक समीकरण और भविष्य की चेतावनी

मध्य पूर्व की यह सुलगती आग अब केवल क्षेत्रीय संघर्ष तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह वैश्विक महाशक्तियों के आधिपत्य को चुनौती दे रही है। ईरान ने जिस प्रकार अमेरिका को आर्थिक और तकनीकी रूप से घेर लिया है, उसने यह साबित कर दिया है कि आधुनिक युद्ध में केवल पैसे और बड़े हथियारों से जीत हासिल नहीं की जा सकती, बल्कि रणनीतिक चतुराई और कम लागत वाले संसाधनों का सही इस्तेमाल सबसे बड़ी ताकत बन चुका है। अमेरिका के लिए अब यह आत्ममंथन करने का समय आ गया है कि क्या वे मध्य पूर्व में अपनी दादागीरी जारी रखकर अपनी अर्थव्यवस्था को पूरी तरह कंगाली के कगार पर ले जाना चाहते हैं या फिर कोई नया कूटनीतिक रास्ता तलाशते हैं। दुनिया भर की निगाहें अब इस बात पर टिकी हैं कि पेंटागन इस रणनीतिक विफलता के बाद अपनी अगली चाल क्या चलता है।