इजरायल का 'हरेदी विवाद': सेना से छूट के कानून ने क्यों खड़ा कर दिया पहचान और बराबरी का संकट?
इजरायल इस समय न केवल अपने इतिहास के सबसे लंबे और कठिन सुरक्षा संघर्षों से गुजर रहा है, बल्कि वह अंदरूनी तौर पर एक बेहद गंभीर वैचारिक और सामाजिक संकट का भी सामना कर रहा है। यह संकट जुड़ा है देश के अति-रूढ़िवादी (Ultra-Orthodox) यहूदी समुदाय—जिसे 'हरेदी' (Haredi) कहा जाता है—से जुड़े सैन्य छूट के विवाद से। एक तरफ जहां देश की सेना (IDF) पर चौतरफा युद्ध के कारण भारी दबाव है, वहीं हरेदी समुदाय को मिलने वाली ऐतिहासिक छूट ने इजरायल के नागरिकों के बीच 'समानता और कर्तव्य' को लेकर गहरी दरार पैदा कर दी है।
क्या है 'हरेदी' समुदाय और सेना की छूट का इतिहास?
इजरायल में कानूनन हर योग्य यहूदी नागरिक (महिला और पुरुष दोनों) के लिए 18 वर्ष की आयु के बाद सेना (IDF) में अनिवार्य रूप से सेवा देना अनिवार्य है। लेकिन साल 1948 में इजरायल की स्थापना के समय, देश के पहले प्रधानमंत्री डेविड बेन-गुरीउन ने हरेदी समुदाय के साथ एक समझौता किया था।
इस समझौते के तहत उन गिने-चुने छात्रों को सैन्य सेवा से छूट दी गई थी जिनका मुख्य पेशा 'टोरा' (Torah - यहूदी धार्मिक ग्रंथ) का पूर्णकालिक अध्ययन करना था। शुरुआती दौर में यह संख्या बहुत कम थी, लेकिन दशकों के साथ हरेदी आबादी तेजी से बढ़ी और यह छूट एक स्थायी व्यवस्था का रूप लेती गई, जिससे समाज के बाकी हिस्से में असंतोष सुलगने लगा।
वर्तमान में यह विवाद गंभीर संकट क्यों बन गया है?
हाल के वर्षों में, विशेषकर गाजा, लेबनान और अन्य मोर्चों पर लंबे समय तक चले संघर्षों के कारण इजरायली सेना (IDF) के सामने सैनिकों (Manpower) की भारी कमी खड़ी हो गई है। सेना के शीर्ष अधिकारियों ने खुले तौर पर चेतावनी दी है कि लगातार युद्ध के कारण रिजर्व सैनिकों पर जरूरत से ज्यादा बोझ पड़ रहा है और वे मानसिक तथा शारीरिक रूप से थक चुके हैं।
ऐसी स्थिति में, जब देश के आम नागरिकों के बेटे-बेटी महीनों तक युद्ध के मोर्चों पर जान जोखिम में डाल रहे हैं, वहीं करीब एक लाख की कामकाजी उम्र वाली हरेदी आबादी का सेना में सेवा न देना आम जनता को नागवार गुजर रहा है। जनता का एक बड़ा वर्ग इसे संवैधानिक और सामाजिक अन्याय मानता है।
सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप और राजनीतिक घमासान
इस मामले पर विवाद तब और गहरा गया जब इजरायल की सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए स्पष्ट कर दिया कि सरकार अब हरेदी यहूदियों को अनिवार्य सैन्य सेवा से अनिश्चितकालीन छूट नहीं दे सकती और सेना को उन्हें भी ड्राफ्ट करना होगा।
हालांकि, प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की सरकार के लिए यह राजनीतिक रूप से बेहद पशोपेश की स्थिति है। नेतन्याहू की गठबंधन सरकार में हरेदी राजनीतिक दल शामिल हैं, जो किसी भी ऐसे कानून का कड़ा विरोध कर रहे हैं जिससे उनके युवाओं को सेना में जाना पड़े। हरेदी नेताओं का तर्क है कि आधुनिक सैन्य माहौल में रहने से उनके युवा अपनी धार्मिक जीवनशैली और परंपराओं से भटक सकते हैं। इसके विपरीत, विपक्षी दल और आम जनता सरकार पर कानून का सख्ती से पालन कराने का दबाव बना रहे हैं।
पहचान, कर्तव्य और भविष्य का संकट
यह पूरा विवाद अब सिर्फ एक कानूनी या राजनीतिक पेंच नहीं रह गया है, बल्कि यह इस बात की लड़ाई बन चुका है कि आधुनिक इजरायल का मूल चरित्र क्या होगा।
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एक तरफ सेक्युलर और अन्य यहूदी नागरिक हैं जो चाहते हैं कि देश की रक्षा का बोझ समाज के हर वर्ग को बराबर उठाना चाहिए।
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दूसरी तरफ हरेदी समुदाय है जो अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए राज्य की अनिवार्य व्यवस्था से दूरी बनाए रखना चाहता है।
जैसे-जैसे यरुशलम और अन्य शहरों की सड़कों पर हरेदी समुदाय के विरोध प्रदर्शन और पुलिस के साथ झड़पें तेज हो रही हैं, यह साफ हो गया है कि यह विवाद आने वाले समय में इजरायल की राजनीतिक स्थिरता और सामाजिक ताने-बाने की सबसे बड़ी परीक्षा साबित होगा।