फ्रांस में हिंसक प्रदर्शनों के पीछे वामपंथी-इस्लामी गठजोड़ का खुलासा
अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा, वैश्विक भू-राजनीति और आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे से इस वक्त एक बेहद चौंकाने वाली, गंभीर और सनसनीखेज खबर सामने आ रही है। पिछले कुछ हफ्तों से फ्रांस (France) और यूरोप के कुछ हिस्सों में छात्रों, ट्रेड यूनियनों और प्रदर्शनकारियों द्वारा किए जा रहे उग्र और हिंसक प्रदर्शनों को लेकर एक अमेरिकी खोजी पत्रकार ने बेहद खौफनाक दावा किया है। फॉक्स न्यूज (Fox News) की वरिष्ठ भारतीय-अमेरिकी पत्रकार असरा नोमानी (Asra Nomani) ने एक विस्तृत खोजी रिपोर्ट और अपने सोशल मीडिया पोस्ट में दावा किया है कि फ्रांस में जारी इन नागरिक अशांतियों के पीछे कोई आम छात्रों की मांगें नहीं हैं, बल्कि इसके पीछे रेड-ग्रीन एलायंस यानी वामपंथी (Leftist/Communist) और कट्टरपंथी इस्लामी (Islamist) नेटवर्क की अदृश्य ताकतें काम कर रही हैं। सबसे डरावनी बात यह है कि पत्रकार ने पूरी दुनिया और विशेषकर भारत सरकार को सतर्क करते हुए स्पष्ट शब्दों में चेतावनी दी है कि इस तरह के प्रायोजित आंदोलनों का 'अगला निशाना भारत' (NEXT: INDIA) हो सकता है।
फॉक्स न्यूज की खोजी रिपोर्ट में 50 संगठनों की पहचान: कैसे छात्रों के मंच का हुआ राजनीतिक दुरुपयोग?
पत्रकार असरा नोमानी द्वारा की गई खोजी जांच के अनुसार, फ्रांस में शिक्षा और बजट के मुद्दों को लेकर शुरू हुए छात्र आंदोलनों में अचानक से 50 से अधिक वयस्क राजनीतिक संगठन कूद पड़े। इनमें से केवल 15 युवा संगठन थे, जबकि बाकी के 35 संगठन सुदूर-वामपंथी (Far-Left), कम्युनिस्ट, सोशलिस्ट और कट्टरपंथी या फलस्तीन-समर्थक समूह थे। रिपोर्ट में यह आरोप लगाया गया है कि दुनिया भर में फैले कुछ वैश्विक फंडिंग नेटवर्क—जिनमें शंघाई स्थित अमेरिकी उद्योगपति नेविल रॉय सिंघम (Neville Roy Singham) और उनसे जुड़े मीडिया प्लेटफॉर्म्स का नाम शामिल है—इन वैश्विक विरोध प्रदर्शनों को आर्थिक और बौद्धिक रसद मुहैया करा रहे हैं। इस वैश्विक तंत्र का मुख्य उद्देश्य किसी भी देश में उठने वाले छोटे-मोटे स्थानीय मुद्दों को हाईजैक करके उसे उग्र 'रेजीम चेंज' या अराजकता के माहौल में तब्दील करना होता है।
'फ्रांस के बाद अगला नंबर भारत का': असरा नोमानी ने क्यों जताई भारत में ऐसी ही साजिश की आशंका?
असरा नोमानी ने अपने आधिकारिक एक्स (ट्विटर) हैंडल पर लिखा कि उन्होंने फ्रांस और बेल्जियम में फैलते इस कम्युनिस्ट व इस्लामी गठजोड़ के खेल को रंगे हाथों पकड़ा है। उन्होंने याद दिलाया कि वे पहले भी यह चेतावनी दे चुकी हैं और एक बार फिर दोहरा रही हैं कि भारत इस वैश्विक नेटवर्क की हिटलिस्ट में सबसे ऊपर है। रिपोर्ट में 'इंडियन अलायंस पेरिस' और भारत में सक्रिय कुछ वामपंथी व मानवाधिकार संगठनों का भी जिक्र किया गया है जो वैश्विक विमर्श से जुड़े हुए हैं। नोमानी का कहना है कि जिस प्रकार फ्रांस में वास्तविक समस्याओं की आड़ लेकर हिंसा भड़काई गई, ठीक उसी तर्ज पर भारत में भी चुनाव आयोग, नागरिकता कानून या अन्य प्रशासनिक फैसलों के खिलाफ जन-असंतोष पैदा करके बांग्लादेश और नेपाल जैसी स्थिति बनाने की कोशिश की जा सकती है।
भारत के कानूनी और रक्षा विशेषज्ञों में मची हलचल, विदेश से फंडिंग और सुनियोजित नेटवर्क की जांच की मांग
इस अमेरिकी मीडिया खुलासे के बाद भारत के प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में भी बहस छिड़ गई है। भारत के वरिष्ठ कानूनी विशेषज्ञों और कूटनीतिक जानकारों—जैसे वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे—ने भी पहले यह आशंका जताई थी कि भारत की लोकतांत्रिक प्रणाली और आर्थिक प्रगति को रोकने के लिए विदेशी शक्तियों और विदेशी फंडिंग से चलने वाले समूह लगातार सक्रिय हैं। सुरक्षा विश्लेषकों का मानना है कि असरा नोमानी की यह चेतावनी भारत की सुरक्षा एजेंसियों के लिए एक बड़ा अलर्ट है कि वे देश में सक्रिय ऐसे संदेहास्पद एनजीओ और सोशल मीडिया कैंपेन पर पैनी नजर रखें जो बाहरी ताकतों के इशारे पर भारत की संप्रभुता और शांति को खतरे में डालने का काम कर रहे हैं।