'इस्लामिक बिरादरी' पर भारी पड़े राष्ट्रीय हित! जानें क्यों ईरान के बुलावे पर इंडोनेशिया ने फेर लिया मुंह
वैश्विक कूटनीति के गलियारे से एक बेहद चौंकाने वाली खबर सामने आ रही है, जिसने मध्य पूर्व से लेकर दक्षिण-पूर्व एशिया तक की सियासत में हलचल मचा दी है। हमेशा खुद को 'इस्लामिक बिरादरी' और मुस्लिम एकजुटता का पैरोकार बताने वाले देशों के बीच अब आंतरिक हितों की जंग खुलकर सामने आ गई है। एक हालिया और बेहद संवेदनशील घटनाक्रम में, इंडोनेशिया ने ईरान के एक बेहद महत्वपूर्ण और आधिकारिक बुलावे पर जाने से साफ इनकार कर दिया है। इस फैसले के पीछे की कूटनीतिक वजहों के खुलासे ने अब अंतरराष्ट्रीय मंच पर बड़ा बवाल खड़ा कर दिया है।
कूटनीतिक गलियारे में क्यों मचा है बवाल?
दरअसल, ईरान ने हाल ही में एक उच्च स्तरीय बैठक और द्विपक्षीय चर्चा के लिए इंडोनेशिया को आमंत्रित किया था। उम्मीद जताई जा रही थी कि दोनों बड़े मुस्लिम बहुल देश मिलकर वैश्विक मंच पर कोई नया समीकरण बनाएंगे। लेकिन इंडोनेशियाई विदेश मंत्रालय की तरफ से इस आमंत्रण को लेकर जो ठंडी प्रतिक्रिया आई, उसने ईरान को हैरान कर दिया। अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का मानना है कि इंडोनेशिया का यह कदम केवल एक सामान्य इनकार नहीं है, बल्कि यह इस बात का सीधा संकेत है कि समकालीन दौर में किसी भी देश के लिए धार्मिक पहचान या 'इस्लामिक बिरादरी' से कहीं ज्यादा उसके खुद के राष्ट्रीय और आर्थिक हित मायने रखते हैं।
आखिर इंडोनेशिया ने क्यों फेरा ईरान से मुंह?
इस बड़े फैसले के पीछे कई गहरे भू-राजनीतिक (Geopolitical) और आर्थिक कारण छिपे हुए हैं। इंडोनेशिया इस समय दक्षिण-पूर्व एशिया (ASEAN क्षेत्र) में अपनी आर्थिक स्थिति को मजबूत करने और पश्चिमी देशों के साथ व्यापारिक रिश्तों को सुधारने पर पूरा ध्यान केंद्रित कर रहा है। ईरान पर लगे अंतरराष्ट्रीय और अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण, इंडोनेशिया उसके साथ खुलकर मंच साझा करने से बच रहा है। इंडोनेशियाई सरकार को डर है कि ईरान के साथ नजदीकी दिखाने से अमेरिका और यूरोपीय संघ के साथ उसके अरबों डॉलर के व्यापारिक समझौते और विदेशी निवेश (FDI) पर बुरा असर पड़ सकता है।
वैश्विक मंच पर बदल रहे हैं दोस्ती के समीकरण
इस पूरे खुलासे ने दुनिया भर के विचारकों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या अब वैश्विक राजनीति में धार्मिक गुटबाजी का दौर खत्म हो रहा है? विशेषज्ञों का कहना है कि जकार्ता (इंडोनेशिया की राजधानी) अब अपनी विदेश नीति को पूरी तरह से व्यावहारिक और परिणाम-उन्मुख (Pragmatic) बना रहा है। उसे अच्छी तरह पता है कि तेहरान (ईरान) के करीब जाने से मिलने वाले कूटनीतिक फायदे बेहद सीमित हैं, जबकि इसके बदले में पश्चिमी देशों की नाराजगी मोल लेना एक बहुत बड़ा आर्थिक जोखिम साबित हो सकता है। यही वजह है कि इंडोनेशिया ने बेहद समझदारी से अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखते हुए ईरान के बुलावे से किनारा कर लिया।