न त्योहारों की खुशियां, न बाजारों में रौनक... तारिक रहमान के बांग्लादेश में क्या सचमुच 'हराम' हो गए हैं हिंदू पर्व?
पड़ोसी देश बांग्लादेश में राजनीतिक सत्ता परिवर्तन के बाद से ही धार्मिक अल्पसंख्यकों, विशेषकर हिंदू समुदाय के लिए हालात लगातार बद से बदतर होते जा रहे हैं। हाल ही में कार्यभार संभालने वाले और देश की राजनीति में अहम प्रभाव रखने वाले तारिक रहमान और नई व्यवस्था के दौर में बांग्लादेशी हिंदुओं पर संकटों का पहाड़ टूट पड़ा है। स्थिति यह हो गई है कि न तो अब वहां त्योहारों की वह पुरानी रौनक दिखाई देती है और न ही बाजारों में उत्सव जैसा माहौल नजर आता है। ताजा और बेहद चौंकाने वाले घटनाक्रम के तहत बांग्लादेश सरकार ने सनातन धर्म के सबसे बड़े और पवित्र त्योहारों में से एक भगवान श्रीकृष्ण जन्मोत्सव यानी जन्माष्टमी पर मिलने वाली आधिकारिक सरकारी छुट्टी को पूरी तरह से रद्द कर दिया है। इस एक फैसले ने देश के भीतर रहने वाले करोड़ों अल्पसंख्यकों के दिलों में खौफ पैदा कर दिया है और यह सवाल खड़े कर दिए हैं कि क्या अब इस्लामिक कट्टरपंथ के साए में हिंदू पर्वों को मनाना भी एक अपराध या 'हराम' जैसा बना दिया जाएगा।
राजनीतिक बदलाव और बांग्लादेशी हिंदुओं पर बढ़ता धार्मिक संकट
पिछले कुछ समय से बांग्लादेश की राजनीति में जो उथल-पुथल मची है, उसने वहां के अल्पसंख्यक समुदायों की सुरक्षा और अधिकारों को सबसे बड़े खतरे में डाल दिया है। शेख हसीना की सरकार के पतन के बाद जब कट्टरपंथी और दक्षिणपंथी ताकतों को राजनीतिक गलियारों में खुला मंच मिलना शुरू हुआ, तभी से यह अंदेशा जताया जा रहा था कि अल्पसंख्यकों की संस्कृति, उनके रीति-रिवाजों और त्योहारों पर पाबंदियां लगनी शुरू हो जाएंगी। ताज़ा फैसला इस बात की मुहर लगाता है कि देश में बहुसंस्कृतिवाद और धार्मिक सहिष्णुता के सिद्धांतों को किनारे कर दिया गया है। जन्माष्टमी की छुट्टी रद्द करने के इस सरकारी आदेश से न सिर्फ सरकारी दफ्तरों और स्कूलों में काम करने वाले हिंदू कर्मचारियों में निराशा है, बल्कि पूरे समाज में यह संदेश गया है कि उनकी धार्मिक भावनाओं को सुनियोजित तरीके से आहत किया जा रहा है और उनकी सांस्कृतिक पहचान को मिटाने का कुचक्र रचा जा रहा है।
बाजारों से गायब हुई रौनक, खौफ के साए में जीने को मजबूर अल्पसंख्यक
किसी भी देश या समाज में त्योहार केवल पूजा-पाठ का माध्यम नहीं होते, बल्कि वे अर्थव्यवस्था, मेल-मिलाप और सामाजिक सौहार्द के प्रतीक होते हैं। जन्माष्टमी जैसे पावन पर्व पर कभी ढाका और अन्य शहरों के बाजार रोशनी से जगमगाते थे, मूर्तिकारों और दुकानदारों के चेहरों पर खुशी होती थी, और हर तरफ हर्षोल्लास का माहौल रहता था, लेकिन इस बार का मंजर बिल्कुल उलट है। छुट्टियों के अभाव और लगातार मिल रही धमकियों व हमलों के डर के कारण न तो बाजारों में वैसी रौनक दिख रही है और न ही लोग खुलकर अपने पर्वों की तैयारी कर पा रहे हैं। मंदिरों में सन्नाटा पसरा हुआ है और लोग इस बात से डरे हुए हैं कि यदि उन्होंने पारंपरिक उल्लास के साथ पर्व मनाने की कोशिश की, तो कट्टरपंथी तत्व उनके खिलाफ हिंसा या उत्पीड़न की किसी नई वारदात को अंजाम दे सकते हैं। यह खौफ इस बात का प्रमाण है कि बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के मौलिक मानवाधिकार किस प्रकार खतरे में पड़ चुके हैं।
अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों की चुप्पी और भविष्य की डरावनी तस्वीर
बांग्लादेश में लगातार बिगड़ते हुए इन हालात के बावजूद अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों और वैश्विक मंचों की ओर से जिस तरह की चुप्पी साधी गई है, वह बेहद चिंताजनक है। इतिहास गवाह है कि जब भी किसी देश में धार्मिक अल्पसंख्यकों को उनकी आस्था के आधार पर प्रताड़ित किया जाता है, तो समाज का ताना-बाना अंदर से खोखला होने लगता है। तारिक रहमान और नई प्रशासनिक व्यवस्था के तहत लिए जा रहे इस तरह के भेदभावपूर्ण निर्णय न केवल बांग्लादेश की अंतरराष्ट्रीय छवि को धूमिल कर रहे हैं, बल्कि देश को एक असहिष्णु राष्ट्र की श्रेणी में ला खड़ा कर रहे हैं। यदि समय रहते इन दमनकारी नीतियों और छुट्टियों को खत्म करने जैसे तुगलकी फरमानों पर रोक नहीं लगाई गई, तो वह दिन दूर नहीं जब बांग्लादेश अपनी ऐतिहासिक बहुसांस्कृतिक विरासत को पूरी तरह खो देगा और वहां केवल डर, नफरत और कट्टरता का ही साम्राज्य बचेगा।