न धक्का, न कोई इंसान, फिर कैसे चलने लगते हैं सैकड़ों किलो के पत्थर? कोई जादू नहीं विज्ञान का कमाल
प्रकृति के रहस्यमयी कारनामों की दुनिया में कुछ ऐसी घटनाएं दर्ज हैं जिन्हें देखकर इंसान हैरान रह जाता है। कैलिफोर्निया के डेथ वैली नेशनल पार्क स्थित 'रेसट्रैक प्लाया' में भारी-भरकम पत्थर बिना किसी इंसानी मदद या किसी मशीन के अपने आप एक जगह से दूसरी जगह खिसकने लगते हैं। सालों तक लोग इसे किसी अदृश्य शक्ति या जादू-टोने से जोड़कर देखते रहे, लेकिन आधुनिक विज्ञान ने इस खौफनाक और हैरान कर देने वाले नजारे के पीछे छिपे सबसे बड़े वैज्ञानिक सच को दुनिया के सामने उजागर कर दिया है।
डेथ वैली का रेसट्रैक प्लाया और सरकते पत्थरों की अनसुलझी पहेली
अमेरिका के कैलिफोर्निया स्थित डेथ वैली एक ऐसा सुखाड़ इलाका है जहां तापमान बहुत ज्यादा रहता है। इसी सूखे मैदान में कई सौ किलो वजनी भारी पत्थर जमीन पर लंबी-लंबी लकीरें छोड़ते हुए आगे बढ़ जाते हैं। वैज्ञानिकों और पर्यटकों ने दशकों तक इन पत्थरों को खिसकते हुए खुद तो कभी सीधा नहीं देखा, लेकिन हर साल उनके पीछे बनी लंबी पटरियों जैसे निशान उनकी आवाजाही का पुख्ता सुबूत देते थे। कई लोग इसे एलियंस की हरकत मानते थे तो कई वैज्ञानिक मानते थे कि जमीन के नीचे मैग्नेटिक फील्ड इसका मुख्य कारण हो सकता है।
वैज्ञानिक शोध और जीपीएस तकनीक से खुला खौफनाक रहस्य
शोधकर्ताओं की एक टीम ने इस गुत्थी को सुलझाने के लिए पत्थरों में अत्याधुनिक जीपीएस ट्रैकर और टाइम-लैप्स कैमरे लगाए। कई वर्षों की कड़ी मशक्कत के बाद जब कैमरे की फुटेज देखी गई, तो इसके पीछे का विज्ञान पूरी तरह साफ हो गया। इस रहस्यमयी प्रक्रिया के पीछे का असली कारण सर्दियों के मौसम में होने वाला एक दुर्लभ प्राकृतिक कॉम्बिनेशन है, जिसमें पानी, बर्फ और तेज हवाएं एक साथ मिलकर काम करती हैं।
बर्फ की पतली परत और हवा का वो अद्भुत जादू
सर्दियों की रातों में जब रेसट्रैक प्लाया का तापमान बेहद कम हो जाता है, तो वहां मौजूद पानी जमा होकर कांच जैसी बेहद पतली बर्फ की परत में तब्दील हो जाता है। जब सुबह की धूप पड़ती है तो यह बर्फ पिघलना शुरू होती है और तैरती हुई छोटी-छोटी चादरों में टूट जाती है। इसके साथ ही जब रेगिस्तान में तेज हवाएं चलती हैं, तो वे इन तैरती बर्फ की प्लेटों को धक्का देती हैं। यह बर्फ की चादर भारी पत्थरों को बेहद कम घर्षण के साथ धीरे-धीरे गीली मिट्टी पर आगे खिसका देती है, जिससे पत्थरों के पीछे लंबी लकीरें बन जाती हैं।