यमन के हूती विद्रोहियों से आर-पार की जंग के लिए पाकिस्तान ने उतारी अपनी फौज

यमन के हूती विद्रोहियों से आर-पार की जंग के लिए पाकिस्तान ने उतारी अपनी फौज

मध्य-पूर्व के सुलगते रणक्षेत्र, खाड़ी देशों के रक्षा समीकरणों और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के गलियारों से इस वक्त एक बहुत बड़ी और चौंकाने वाली खबर सामने आई है, जिसने वैश्विक राजनीति में एक नया भूचाल ला दिया है। खाड़ी देशों की सुरक्षा और सामरिक गठजोड़ को मजबूत करने के नाम पर पाकिस्तान ने सऊदी अरब की धरती पर अपने सैन्य दस्ते को बड़े पैमाने पर तैनात करना शुरू कर दिया है। मीडिया रिपोर्ट्स और रक्षा विश्लेषकों के अनुसार, पाकिस्तान ने यमन के ईरान समर्थित कुख्यात हूती विद्रोहियों (Houthi Rebels) से निपटने और सऊदी सीमाओं की सुरक्षा को चाक-चौबंद करने के लिए लगभग 15,000 अत्यधिक प्रशिक्षित सैनिकों के साथ-साथ अपने मारक जेएफ-17 थंडर फाइटर जेट्स (JF-17 Fighter Jets) और अत्याधुनिक सर्विलांस ड्रोन को सऊदी अरब में उतार दिया है। दशकों पुराना यह सैन्य सहयोग एक ऐसे समय में फिर से सक्रिय हुआ है जब मध्य-पूर्व में अमेरिका, ईरान, इजराइल और विभिन्न विद्रोही संगठनों के बीच तनाव चरम सीमा पर है। इस बड़े सैन्य कदम के बाद से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह सवाल तेजी से उठने लगा है कि क्या पाकिस्तान की यह फौज सीधे तौर पर यमन युद्ध के मैदान में उतरेगी या यह केवल सऊदी सीमाओं की रक्षा के लिए एक रणनीतिक डिफेंस शील्ड है? आइए विस्तार से जानते हैं इस पूरी सैन्य तैनाती के पीछे के भू-राजनीतिक कारणों और इसके व्यापक प्रभावों के बारे में।

क्या है पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच का यह नया डिफेंस पैक्ट: क्यों अचानक पड़ी सैनिकों और JF-17 जेट्स की जरूरत

पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच ऐतिहासिक रूप से रक्षा, वित्तीय सहायता और कूटनीतिक संबंधों का एक गहरा ताना-बाना रहा है, जिसके तहत अतीत में भी पाकिस्तानी सैनिकों को सऊदी अरब में रक्षा प्रशिक्षण और आंतरिक सुरक्षा के लिए तैनात किया जाता रहा है। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में दोनों देशों के संबंधों में उस समय थोड़ा ठहराव और दूरियां आ गई थीं जब पाकिस्तानी संसद ने यमन के खिलाफ सीधे सैन्य अभियान में शामिल होने से इनकार कर दिया था। अब मौजूदा वैश्विक और क्षेत्रीय तनाव को देखते हुए, विशेषकर लाल सागर (Red Sea) और बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य के पास हूती विद्रोहियों द्वारा अंतरराष्ट्रीय मालवाहक जहाजों और सऊदी तेल प्रतिष्ठानों पर लगातार ड्रोन व मिसाइल हमलों के कारण सऊदी अरब की सुरक्षा चिंताएं बहुत अधिक बढ़ गई हैं। इसी सुरक्षा संकट से निपटने के लिए रियाद और इस्लामाबाद के बीच हुए नए सामरिक समझौतों के तहत पाकिस्तान ने अपने लगभग 15,000 सैनिकों, अत्याधुनिक JF-17 फाइटर एयरक्राफ्ट्स और घातक ड्रोन बेड़े को सऊदी सैन्य अड्डों पर तैनात कर दिया है, ताकि किसी भी बाहरी या विद्रोही आक्रमण का मुंहतोड़ जवाब दिया जा सके।

यमन के हूती विद्रोहियों का बढ़ता खौफ और मध्य-पूर्व की बदलती भू-राजनीति में पाकिस्तान की भूमिका

मध्य-पूर्व के सबसे अशांत क्षेत्रों में गिने जाने वाले यमन में सक्रिय हूती विद्रोही पिछले कुछ समय से जिस आक्रामक तरीके से समुद्री व्यापार और खाड़ी देशों के बुनियादी ढांचे को निशाना बना रहे हैं, उसने पश्चिमी देशों और अरब जगत की रातों की नींद उड़ा रखी है। ईरान समर्थित ये विद्रोही लगातार आधुनिक बैलिस्टिक मिसाइलों और सुसाइड ड्रोन्स के जरिए सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों के लिए गंभीर चुनौती बने हुए हैं। ऐसे में, पाकिस्तानी सेना की इस भारी-भरकम तैनाती को केवल एक सामान्य सैन्य अभ्यास नहीं, बल्कि एक सक्रिय रक्षात्मक उपाय के रूप में देखा जा रहा है। रक्षा विशेषज्ञों का यह मानना है कि JF-17 जैसे लड़ाकू विमानों और प्रशिक्षित पाकिस्तानी कमांडोज की मौजूदगी से सऊदी आसमान और उसकी रणनीतिक सीमाओं की सुरक्षा व्यवस्था को एक मजबूत कवच मिल जाएगा, हालांकि विश्लेषक इस बात पर भी पैनी नजर बनाए हुए हैं कि क्या पाकिस्तानी सैनिक यमन के अंदरूनी युद्ध क्षेत्रों में प्रत्यक्ष रूप से कदम रखेंगे या उनकी भूमिका केवल एयर डिफेंस और लॉजिस्टिक्स तक सीमित रहेगी।

आर्थिक तंगी से जूझ रहे पाकिस्तान के लिए इस सैन्य समझौते के क्या हैं मायने और क्षेत्रीय राजनीति पर इसका प्रभाव

पाकिस्तान की घरेलू अर्थव्यवस्था इस समय गंभीर वित्तीय संकट, विदेशी मुद्रा भंडार की भारी कमी और महंगाई के दौर से गुजर रही है, ऐसे में सऊदी अरब के साथ इस प्रकार के बड़े रक्षा सौदे और सैन्य तैनाती को इस्लामाबाद के लिए एक रणनीतिक आर्थिक मजबूरी और अवसर दोनों के रूप में देखा जा रहा है। सऊदी अरब और अन्य खाड़ी देश अक्सर आर्थिक सहायता, तेल की रियायती कीमतों और वित्तीय पैकेज के बदले पाकिस्तान से इस तरह के सैन्य और सामरिक सहयोग की अपेक्षा रखते हैं। क्षेत्रीय राजनीति के दृष्टिकोण से देखें तो इस तैनाती से एक तरफ जहां सऊदी अरब को अपनी सुरक्षा के मोर्चे पर एक बड़ा मनोवैज्ञानिक और सैन्य समर्थन मिला है, वहीं दूसरी तरफ ईरान के साथ पाकिस्तान के राजनयिक संबंधों पर इसका क्या असर पड़ेगा, यह भी देखने वाली बात होगी। बहरहाल, 15,000 सैनिकों और फाइटर जेट्स के साथ सऊदी धरती पर उतरी यह पाकिस्तानी फौज आने वाले दिनों में मध्य-पूर्व के शक्ति संतुलन को किस दिशा में ले जाती है, इस पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हुई हैं।