टुकड़े-टुकड़े होने से बच गया पाकिस्तान, कब तक आसिम मुनीर को रोक पाएंगे शहबाज शरीफ?

टुकड़े-टुकड़े होने से बच गया पाकिस्तान, कब तक आसिम मुनीर को रोक पाएंगे शहबाज शरीफ?

पड़ोसी देश पाकिस्तान इस समय अपने इतिहास के सबसे भीषण और विनाशकारी दौर से गुजर रहा है। देश की चरमराई अर्थव्यवस्था, आईएमएफ के कड़े कर्जों के बोझ, बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में सुलग रही बगावत की आग के बीच पाकिस्तान एक बार फिर टुकड़े-टुकड़े होने के मुहाने पर आकर खड़ा हो गया था। इस भयंकर उथल-पुथल के बीच देश की सत्ता के दो सबसे बड़े केंद्र—प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख (COAS) फील्ड मार्शल आसिम मुनीर के बीच वर्चस्व की खूनी जंग खुलकर सामने आ गई है। हालात इस कदर बिगड़ चुके हैं कि प्रधानमंत्री आवास और रावलपिंडी स्थित सेना मुख्यालय (GHQ) के बीच अविश्वास की खाई चौड़ी होती जा रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि सेना प्रमुख और प्रधानमंत्री के बीच यह टकराव कुछ दिन और खिंच जाता, तो पाकिस्तान का एक बार फिर से विघटन होना तय था। इस हाई-वोल्टेज सियासी ड्रामे ने पूरी दुनिया के रणनीतिकारों की नींद उड़ा दी है।

आर्थिक बर्बादी और अंतरराष्ट्रीय कर्ज के दलदल में धंसता पाकिस्तान और अंदरूनी कलह

पाकिस्तान की बदहाली का आलम यह है कि देश का विदेशी मुद्रा भंडार शून्य के करीब पहुंच चुका है और आम नागरिकों के लिए दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करना भी दूभर हो गया है। देश की इस दयनीय स्थिति के लिए प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और उनकी सरकार की नीतियां सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहराई जा रही हैं, लेकिन दूसरी तरफ पाकिस्तानी सेना इस पूरी विफलता का ठीकरा राजनेताओं के सिर पर फोड़ रही है। सेना प्रमुख आसिम मुनीर देश के तमाम बड़े आर्थिक फैसलों, बंदरगाहों के निजीकरण और विदेशी निवेश के समझौतों में अपनी सीधी दखलअंदाजी बढ़ा चुके हैं। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और उनकी पार्टी के भीतर इस बात को लेकर भारी रोष है कि सेना प्रमुख उनके संवैधानिक अधिकारों को कुचलकर देश को पूरी तरह से मार्शल लॉ की छाया में धकेलना चाहते हैं। यही वजह है कि दोनों पक्षों के बीच लगातार बयानबाजी और पर्दे के पीछे शह-मात का खेल चल रहा है।

शहबाज शरीफ बनाम आसिम मुनीर: सेना मुख्यालय और प्रधानमंत्री आवास के बीच छिड़ा गुप्त युद्ध

पाकिस्तान में लंबे समय से यह अघोषित नियम रहा है कि असली हुकूमत वर्दी के साये में ही चलती है, लेकिन मौजूदा आर्थिक संकट के दौरान यह पर्दा भी पूरी तरह से उठ चुका है। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ अपने भाई नवाज शरीफ के इशारों पर कुछ प्रशासनिक और नीतिगत फैसले अपनी मर्जी से लेना चाहते थे, ताकि जनता के बीच उनकी छवि सुधर सके। हालांकि, सेना प्रमुख आसिम मुनीर ने हर मोर्चे पर सिविल प्रशासन को पंगु बनाते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा, विदेश नीति और आंतरिक मामलों की पूरी कमान अपने हाथों में ले ली है। खुफिया एजेंसियों (ISI) के जरिए सरकार के हर मंत्री और अधिकारी की गतिविधियों पर कड़ी नजर रखी जा रही है। शहबाज शरीफ के सामने सबसे बड़ा संकट यह है कि यदि वे सेना के खिलाफ जाते हैं, तो उनकी सरकार चंद घंटों में गिर जाएगी और यदि वे झुकते हैं, तो इतिहास उन्हें एक लाचार और कठपुतली प्रधानमंत्री के रूप में याद रखेगा।

बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा की सुलगती आग: क्या देश को बिखरने से रोक पाएंगे हुक्मरान?

पाकिस्तान के भीतरूनी हिस्सों में अलगाववादी ताकतों और उग्रवादियों ने पाकिस्तानी सेना की नाक में दम कर रखा है। बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA) और तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) के लड़ाके लगातार पाकिस्तानी सुरक्षा बलों पर ताबड़तोड़ हमले कर रहे हैं। सेना प्रमुख आसिम मुनीर इन राज्यों में पूरी ताकत के साथ सैन्य दमन की नीति अपना रहे हैं, जिससे आम नागरिकों और मानवाधिकारों का भारी हनन हो रहा है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान की इस क्रूरता की धज्जियां उड़ रही हैं। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ इस आंतरिक संघर्ष को कूटनीतिक और राजनीतिक संवाद के जरिए सुलझाने की वकालत कर रहे थे, लेकिन सेना ने उनकी एक नहीं सुनी। सेना के इस आक्रामक रुख ने स्थानीय अवाम में पाकिस्तान के खिलाफ नफरत की आग को और अधिक भड़का दिया है, जिससे देश के भौगोलिक टूटने का खतरा मंडरा रहा है।

जनता का टूटा विश्वास और विपक्ष का सरकार पर करारा हमला

महंगाई की मार झेल रही पाकिस्तानी जनता अब इन दोनों ही सत्ताओं से पूरी तरह ऊब चुकी है। देश के आम बाजारों में आटा, बिजली और पेट्रोल के दाम आसमान छू रहे हैं। जेल में बंद पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) के समर्थक लगातार सड़कों पर उतरकर इस भ्रष्ट तंत्र के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं। विपक्ष का साफ तौर पर कहना है कि शहबाज शरीफ और आसिम मुनीर की यह कुर्सी की लड़ाई देश को गृहयुद्ध (Civil War) की तरफ धकेल रही है। जनता समझ चुकी है कि ये दोनों शासक केवल अपने निजी हितों और विदेशी ताकतों के इशारों पर देश को लूटने में व्यस्त हैं, जबकि पाकिस्तान का आम नागरिक भुखमरी और कंगाली के कगार पर पहुंच चुका है।

क्या शहबाज शरीफ लंबे समय तक रोक पाएंगे आसिम मुनीर के बढ़ते वर्चस्व को?

राजनीतिक और अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का मानना है कि शहबाज शरीफ के पास अब बहुत कम वक्त बचा है। सेना प्रमुख आसिम मुनीर जिस प्रकार से अपनी पकड़ को देश की हर व्यवस्था पर मजबूत कर रहे हैं, उससे यह साफ जाहिर होता है कि आने वाले दिनों में पाकिस्तान की सत्ता का स्वरूप पूरी तरह से सैन्य तानाशाही में बदल सकता है। शहबाज शरीफ की मजबूरी यह है कि वे अपनी कुर्सी बचाने के लिए सेना के हर एक अनुचित आदेश पर हस्ताक्षर करने को विवश हैं। टुकड़े-टुकड़े होने से बाल-बाल बचा यह देश कब तक इन आंतरिक संघर्षों को झेल पाएगा, यह कहना बेहद मुश्किल है, लेकिन इतना तय है कि पाकिस्तान का भविष्य अंधकारमय और अनिश्चितताओं के भंवर में फंस चुका है।