मुस्लिम बहुल देश अजरबैजान में स्कूलों में हिजाब पर प्रतिबंध से गरमाई सियासत

मुस्लिम बहुल देश अजरबैजान में स्कूलों में हिजाब पर प्रतिबंध से गरमाई सियासत

अंतरराष्ट्रीय और इस्लामिक जगत से इस वक्त एक बहुत बड़ी, संवेदनशील और हलचल मचा देने वाली खबर सामने आ रही है। एक तरफ जहां अधिकांश मुस्लिम बहुल देशों में धार्मिक स्वतंत्रता और पारंपरिक लिबास को लेकर खुलापन देखा जाता है, वहीं दूसरी ओर दक्षिण काकेशस क्षेत्र में स्थित मुस्लिम बहुल देश अजरबैजान (Azerbaijan) में स्कूलों के अंदर हिजाब (Hijab) और धार्मिक सिर ढंकने वाले कपड़ों पर लगाए गए कड़े प्रतिबंधों ने एक बड़ा बवाल खड़ा कर दिया है। हाल ही में सरकार द्वारा स्कूल यूनिफॉर्म और ड्रेस कोड से जुड़े नियमों में किए गए संशोधनों के बाद से स्थिति काफी तनावपूर्ण हो गई है। हालात यहां तक पहुंच चुके हैं कि हिजाब पहनकर स्कूल पहुंचने वाली दर्जनों छात्राओं और यहां तक कि महिला शिक्षकों को भी स्कूल के मुख्य गेट से ही वापस लौटाया जा रहा है। इस फैसले के विरोध में नाराज अभिभावकों, छात्रों और धार्मिक संगठनों ने सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया है, जिससे देश की आंतरिक राजनीति में भूचाल आ गया है।

क्या है पूरा मामला और क्यों अजरबैजान सरकार ने लागू किए हैं कड़े स्कूल यूनिफॉर्म नियम?

इस पूरे विवाद की शुरुआत तब हुई जब अजरबैजान की कैबिनेट और शिक्षा मंत्रालय ने स्कूलों में एक समान पोशाक (Uniform Dress Code) को अनिवार्य बनाने के लिए नए दिशा-निर्देश और प्रस्ताव लागू किए। सरकार का यह तर्क है कि अजरबैजान एक संवैधानिक रूप से पंथनिरपेक्ष (Secular State) देश है, जिसके संविधान में धर्म और राज्य को अलग रखने का स्पष्ट प्रावधान है। अधिकारियों का कहना है कि शैक्षणिक संस्थानों में समानता बनाए रखने और किसी भी प्रकार के धार्मिक भेदभाव या पहचान को बढ़ावा न मिलने देने के उद्देश्य से सभी छात्रों के लिए एक जैसी यूनिफॉर्म पहनना अनिवार्य किया गया है। हालांकि, देश की आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा मुस्लिम होने के बावजूद सरकार द्वारा इस प्रकार के प्रतिबंध लगाए जाने से आम जनता में गहरी नाराजगी देखने को मिल रही है। आलोचकों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का यह सवाल है कि क्या एक धर्मनिरपेक्ष शिक्षा प्रणाली के नाम पर बच्चों को उनकी धार्मिक आस्था के आधार पर शिक्षा के अधिकार से वंचित करना उचित है?

कक्षाओं का बहिष्कार और सड़कों पर उतरा जनसैलाब, प्रदर्शनकारियों पर प्रशासन की कड़ी कार्रवाई

जैसे ही स्कूलों ने नए नियमों का हवाला देते हुए हिजाब पहनने वाली छात्राओं को कक्षाओं में प्रवेश देने से इनकार किया, वैसे ही राजधानी बाकू और अन्य प्रमुख शहरों में गुस्साए लोगों ने इसके खिलाफ मोर्चा खोल दिया। कई स्कूलों में छात्रों ने कक्षाओं का पूर्ण बहिष्कार कर दिया है और प्रशासनिक नीतियों के खिलाफ धरने पर बैठ गए हैं। स्थिति को नियंत्रित करने के नाम पर अजरबैजान के सुरक्षा बलों और आंतरिक मंत्रालय ने सख्त रुख अपनाते हुए अब तक दर्जनों प्रदर्शनकारियों को हिरासत में ले लिया है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, लोक व्यवस्था में बाधा डालने और शिक्षण संस्थानों के कामकाज को प्रभावित करने के आरोप में करीब 37 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया गया है, जिसके बाद मानवाधिकार संगठनों ने सरकार की इस दमनकारी नीति की कड़ी निंदा की है। दूसरी ओर, इस अंतरराष्ट्रीय मुद्दे पर पड़ोसी देशों और राजनीतिक गलियारों से भी तीखी प्रतिक्रियाएं आनी शुरू हो गई हैं।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी खिंच रही हैं कूटनीतिक तानें, तुर्किए के साथ बढ़ी तल्खी

अजरबैजान में चल रहे इस हिजाब विवाद का असर अब कूटनीतिक रिश्तों पर भी साफ दिखाई देने लगा है। अजरबैजान के सबसे करीबी और घनिष्ठ सहयोगी माने जाने वाले देश तुर्किए (Turkey) के सत्ताधारी दलों और राष्ट्रपति के सलाहकारों ने इस प्रतिबंध की खुले तौर पर आलोचना की है। तुर्की के नेताओं का यह कहना है कि युवा बच्चियों और महिलाओं को उनके धार्मिक विश्वास के आधार पर शिक्षा से रोकना पूरी तरह अस्वीकार्य है। हालांकि, अजरबैजान की सत्तारूढ़ पार्टी 'येनी अजरबैजान' (YAP) ने कड़ा ऐतराज जताते हुए तुर्की के बयानों को 'लोकलुभावन और गैर-जिम्मेदाराना' करार दिया है। सरकार ने दो टूक शब्दों में कह दिया है कि आंतरिक शिक्षा नीतियों और संप्रभुता के मामलों में किसी भी बाहरी देश का हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। बहरहाल, शिक्षा के अधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता के बीच चल रही इस रस्साकशी ने अजरबैजान के समाज को दो धड़ों में बांट दिया है और आने वाले दिनों में यह विवाद और अधिक गहरा सकता है।