परमाणु रेस में सऊदी अरब? ट्रंप की इस सीक्रेट न्यूक्लियर डील से हिली दुनिया!

परमाणु रेस में सऊदी अरब? ट्रंप की इस सीक्रेट न्यूक्लियर डील से हिली दुनिया!

मिडिल ईस्ट (मध्य पूर्व) के सबसे शक्तिशाली देशों में से एक सऊदी अरब को लेकर एक ऐसी खबर सामने आ रही है, जिसने वैश्विक राजनीति और सुरक्षा विश्लेषकों के बीच तहलका मचा दिया है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन की ओर से सऊदी अरब के साथ की जा रही एक नई न्यूक्लियर डील ने पूरी दुनिया की धड़कनें बढ़ा दी हैं। रक्षा गलियारों में यह सबसे बड़ा सवाल बन चुका है कि क्या अब सऊदी अरब भी परमाणु बम बनाने की राह पर निकल पड़ा है?

ट्रंप की न्यूक्लियर डील और सऊदी अरब का इरादा

दरअसल, डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन लंबे समय से सऊदी अरब के साथ एक बड़े परमाणु समझौते को लेकर बातचीत कर रहा है। इस डील के तहत सऊदी अरब अपने देश में असैन्य (Civilian) परमाणु कार्यक्रम शुरू करना चाहता है, जिसके लिए उसे अमेरिकी तकनीक की जरूरत है। हालांकि, इस सौदे की सबसे विवादास्पद शर्त यह है कि सऊदी अरब अपने ही देश में यूरेनियम का संवर्धन (Uranium Enrichment) करना चाहता है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि असैन्य परमाणु ऊर्जा के नाम पर शुरू होने वाला यह सफर बेहद आसानी से सैन्य परमाणु कार्यक्रम यानी परमाणु बम बनाने की क्षमता में तब्दील हो सकता है।

ईरान का डर और रियाद की बड़ी मजबूरी

सऊदी अरब के इस आक्रामक रुख के पीछे उसका धुर विरोधी देश ईरान है। ईरान पहले से ही परमाणु हथियार विकसित करने के बेहद करीब पहुंच चुका है। सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने एक इंटरव्यू में साफ तौर पर कहा था कि अगर ईरान परमाणु बम बनाता है, तो सुरक्षा संतुलन बनाए रखने के लिए सऊदी अरब को भी जल्द से जल्द परमाणु हथियार हासिल करने होंगे। ट्रंप की इस नई डील को इसी रणनीति के हिस्से के रूप में देखा जा रहा है, जहां सऊदी अरब सुरक्षा के मोर्चे पर ईरान से पीछे नहीं रहना चाहता।

इजरायल और वैश्विक महाशक्तियों की बढ़ी चिंता

इस संभावित न्यूक्लियर डील ने न केवल मिडिल ईस्ट बल्कि पूरी दुनिया की रातों की नींद उड़ा दी है। इजरायल, जो खुद को इस क्षेत्र में एकमात्र परमाणु शक्ति संपन्न देश के रूप में देखता है, इस समझौते से बेहद असहज है। इसके अलावा, वैश्विक महाशक्तियों को डर है कि अगर सऊदी अरब को परमाणु तकनीक और यूरेनियम संवर्धन की छूट मिलती है, तो पूरे मध्य पूर्व में एक खतरनाक परमाणु हथियारों की होड़ (Nuclear Arms Race) शुरू हो जाएगी। तुर्की और मिस्र जैसे देश भी इस दौड़ में कूद सकते हैं, जिससे वैश्विक सुरक्षा संकट खड़ा हो सकता है।

क्या अमेरिकी संसद से पास हो पाएगी यह डील?

डोनाल्ड ट्रंप भले ही इस डील को आगे बढ़ाने के लिए उत्सुक दिख रहे हों, लेकिन उनके लिए इसे अमेरिकी संसद (कांग्रेस) से पास कराना एक टेढ़ी खीर साबित होगा। अमेरिका के कड़े '123 एग्रीमेंट' नियमों के मुताबिक, वाशिंगटन किसी भी देश को परमाणु तकनीक तभी देता है जब वह देश यूरेनियम संवर्धन न करने की गारंटी दे। अब देखना यह होगा कि क्या ट्रंप प्रशासन सऊदी अरब के लिए इन सख्त नियमों में ढील देता है या फिर दुनिया एक नए परमाणु संपन्न देश के उदय की गवाह बनती है।

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