मिडिल ईस्ट में उलटफेर: पाक-तुर्की ने छोड़ा साथ, तो तबाही से बचने के लिए इजरायल की शरण में पहुंचा सऊदी अरब
पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) के भू-राजनीतिक परिदृश्य में ऐतिहासिक बदलाव देखने को मिल रहा है। दशकों तक जिस इजरायल को खाड़ी देश मान्यता तक देने से कतराते थे, आज वही मुल्क उनके लिए सुरक्षा की सबसे मजबूत उम्मीद बनकर उभर रहा है।
ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों के लगातार बढ़ते हमलों के बीच जब पारंपरिक मुस्लिम सहयोगी देशों पाकिस्तान और तुर्की ने सऊदी अरब की सैन्य मदद करने से हाथ पीछे खींच लिए, तब रियाद ने तेल अवीव की तरफ देखना शुरू कर दिया है। पहली बार अरब जगत के देश अमेरिकी नेतृत्व वाले क्षेत्रीय रक्षा गठबंधन में शामिल होने को लेकर बेहद गंभीर हैं और इस साझी सुरक्षा छतरी के तहत इजरायल के साथ रणनीतिक सहयोग करने से भी परहेज नहीं कर रहे हैं।
यूएई मॉडल बना सऊदी के भरोसे की बड़ी वजह
सऊदी अरब का इजरायल की सैन्य क्षमता पर भरोसा करने के पीछे संयुक्त अरब अमीरात (UAE) का पिछला अनुभव है। ईरान के आक्रामक रुख के दौरान जब अबू धाबी पर मिसाइलों और सुसाइड ड्रोन्स की बौछार हो रही थी, तब इजरायल ने आगे बढ़कर यूएई की हिफाजत के लिए अपने आधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम तैनात कर दिए थे। इस कदम ने खाड़ी देशों में यह पुख्ता संदेश दिया कि इजरायल संकट के समय अपने साझेदारों के साथ पूरी मजबूती से खड़ा रहता है।
इसी के चलते अब सऊदी अरब सहित अन्य खाड़ी देशों ने यरूशलेम से संपर्क साधना शुरू कर दिया है ताकि उन्हें भी हूती मिसाइलों के खिलाफ यूएई जैसा रक्षात्मक सुरक्षा कवच मिल सके, हालांकि इजरायल ने इस सैन्य इमदाद के लिए अपनी कुछ कूटनीतिक शर्तें भी सामने रखी हैं।
जर्मनी में CENTCOM की सीक्रेट बैठक: ईरान और हूतियों को घेरने का खाका तैयार
अमेरिका ने इस बदलते क्षेत्रीय माहौल को तुरंत भांपते हुए एक नए सुरक्षा ढांचे के निर्माण पर काम तेज कर दिया है। इस पहल के तहत अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने हाल ही में जर्मनी में एक बेहद गोपनीय और उच्चस्तरीय बैठक आयोजित की।
ईरान संकट के बाद पहली बार हुई इस रणनीतिक बैठक में अमेरिका और इजरायल के साथ-साथ कई प्रमुख अरब देशों के वरिष्ठ सैन्य कमांडर एक मेज पर बैठे। बैठक का मुख्य फोकस हॉर्मुज जलडमरूमध्य और बाब अल-मंदेब जैसे संवेदनशील अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों में जहाजों की आवाजाही सुरक्षित रखना और ईरान के आक्रामक रुख के खिलाफ संयुक्त रक्षा रणनीति तैयार करना था। एक्सियोस की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी सेंट्रल कमांड सीधे तौर पर सऊदी अरब और इजरायल के बीच सैन्य संवाद स्थापित कराने में मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है।
मक्का पैक्ट की नाकामी और इजरायल की कूटनीतिक रणनीति
सऊदी अरब के लिए सबसे बड़ा रणनीतिक झटका यह रहा कि 'मक्का पैक्ट' के तहत सुरक्षा का दम भरने वाले पाकिस्तान और तुर्की ऐन वक्त पर रियाद की हिफाजत के लिए आगे नहीं आए। इस बेरुखी के चलते सऊदी अरब खुद को क्षेत्रीय सुरक्षा के मोर्चे पर बेहद अकेला महसूस करने लगा था। दूसरी ओर, इजरायल इस पूरे घटनाक्रम को अरब देशों के साथ अपने रिश्ते सामान्य करने के एक बड़े अवसर के रूप में देख रहा है। यरूशलेम पोस्ट से बातचीत में एक वरिष्ठ इजरायली अधिकारी ने साफ किया कि इजरायल सऊदी अरब को ताना मारने के बजाय संकट के समय उसकी मदद करने को तैयार है। इजरायल का मुख्य कूटनीतिक उद्देश्य रियाद को मुस्लिम ब्रदरहुड और कट्टरपंथी सोच से दूर रखकर क्षेत्र के उदारवादी और आधुनिक देशों के करीब लाना है, जिसके बदले में सऊदी अरब को भी इजरायल के प्रति अपनी पुरानी नीतियों में ठोस बदलाव करना होगा।