सऊदी अरब में फेसबुक पोस्ट पर श्रीलंकाई हिंदू युवक को मौत की सजा

सऊदी अरब में फेसबुक पोस्ट पर श्रीलंकाई हिंदू युवक को मौत की सजा

अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इन दिनों खाड़ी देश सऊदी अरब से एक बेहद सनसनीखेज और संवेदनशील मामला सामने आ रहा है, जिसने सोशल मीडिया से लेकर कूटनीतिक गलियारों तक हलचल मचा दी है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, सऊदी अरब की एक अदालत ने श्रीलंका के एक 24 वर्षीय हिंदू युवक को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म फेसबुक पर की गई एक टिप्पणी के कारण मौत की सजा सुनाई है। इस युवक की पहचान श्रीलंका के कलमुई के रहने वाले सिवारासा अणोजन के रूप में हुई है, जो बेहतर भविष्य की तलाश और आजीविका कमाने के लिए सितंबर 2025 में सऊदी अरब गया था। प्रवासी मजदूरों की तरह वह वहां सामान्य काम कर रहा था, लेकिन एक ऑनलाइन टिप्पणी ने उसकी पूरी जिंदगी को एक खतरनाक मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया, जिससे उसका पूरा परिवार गहरे सदमे और चिंता में डूब गया है।

भगवान शिव के अपमान पर प्रतिक्रिया देना पड़ा भारी

यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब सोशल मीडिया पर किसी यूजर द्वारा हिंदू धर्म के आराध्य भगवान शिव को लेकर एक बेहद आपत्तिजनक और भड़काऊ पोस्ट साझा किया गया। श्रीलंका में अपने घर पर रहने के दौरान या ऑनलाइन माध्यम से जब इस बात की जानकारी सिवारासा अणोजन को मिली, तो उसकी धार्मिक भावनाएं आहत हुईं। आवेश में आकर उसने उस आपत्तिजनक पोस्ट के जवाब में एक कमेंट कर दिया। हालांकि, सऊदी अरब के सख्त कानूनों और वहां के स्थानीय न्याय तंत्र के हिसाब से उस युवक की प्रतिक्रिया को इस्लाम और पैगंबर मोहम्मद के खिलाफ अपमानजनक मान लिया गया। स्थिति की नजाकत को भांपते हुए उस युवक ने तुरंत ही अपने सोशल मीडिया अकाउंट से वह पोस्ट और कमेंट डिलीट कर दिया था और इसके लिए एक वीडियो जारी करके माफी भी मांग ली थी, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी और उसके स्क्रीनशॉट अधिकारियों तक पहुंच चुके थे।

निचली अदालत के फैसले के बाद शरिया कानून के तहत बढ़ाई गई सजा

इस मामले में सऊदी अरब की स्थानीय पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए 2 जुलाई 2026 को सिवारासा अणोजन को गिरफ्तार कर लिया। शुरुआत में अल-अहसा क्रिमिनल कोर्ट ने देश के एंटी-साइबर क्राइम लॉ के तहत इस मामले की सुनवाई की और शुरुआती फैसले में उसे 5 साल की जेल तथा 30 लाख सऊदी रियाल का भारी-भरकम जुर्माना लगाया था। लेकिन मामला यहीं शांत नहीं हुआ, क्योंकि इस सजा के खिलाफ युवक के पक्ष ने जहां नरमी बरतने की अपील की, वहीं अभियोजन पक्ष ने इसे नाकाफी मानते हुए शरिया कानून के तहत और अधिक कठोर सजा दिए जाने की मांग करते हुए उच्च अदालत में अपील दायर कर दी। अभियोजन पक्ष की इस अपील को अदालत ने स्वीकार कर लिया और निचली अदालत के फैसले को पलटते हुए युवक की सजा को बढ़ाकर सीधे तौर पर मौत की सजा में तब्दील कर दिया, जिससे मानवाधिकार संगठनों और विदेशी नागरिकों के बीच बहस छिड़ गई है।

खाड़ी देशों के सख्त साइबर और ईशनिंदा कानून की वास्तविकता

यह घटना एक बार फिर से इस कड़वी सच्चाई को उजागर करती है कि खाड़ी देशों विशेषकर सऊदी अरब में धर्म, ईशनिंदा (Blasphemy) और सोशल मीडिया के इस्तेमाल को लेकर कितने ज्यादा कड़े और दंडात्मक नियम लागू हैं। इन देशों में स्थानीय कानूनों के दायरे में किसी भी ऐसे कंटेंट को बर्दाश्त नहीं किया जाता जिसे धार्मिक मान्यताओं या पैगंबर के खिलाफ माना जाए, भले ही वह पोस्ट भावनाओं में आकर अनजाने में या गुस्से में ही क्यों न की गई हो। दुनिया भर के मानवाधिकार कार्यकर्ता और विभिन्न राजनीतिक दल इस बात पर चिंता जता रहे हैं कि इंटरनेट पर विचारों की अभिव्यक्ति और ऑनलाइन टिप्पणियों के लिए इस प्रकार की कठोर सजा देना मानवीय दृष्टिकोण से बेहद डरावना है। वहीं दूसरी ओर, जानकारों का यह भी मानना है कि विदेश में रहने वाले नागरिकों को हमेशा संबंधित देश के स्थानीय कानूनों, सांस्कृतिक सीमाओं और धार्मिक संवेदनशीलता का पूरा सम्मान करना चाहिए ताकि इस तरह की अनहोनी से बचा जा सके।