श्रीलंका को अमेरिका की सीधी धमकी से भारत के पड़ोसी देशों में बढ़ा तनाव

श्रीलंका को अमेरिका की सीधी धमकी से भारत के पड़ोसी देशों में बढ़ा तनाव

अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के गलियारों में इस समय हिंद महासागर और दक्षिण एशिया के क्षेत्र से एक बेहद चौकाने वाली और गंभीर खबर सामने आ रही है, जिसने दुनिया भर के रणनीतिकारों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश संयुक्त राज्य अमेरिका ने भारत के पड़ोसी और हिंद महासागर के बेहद अहम द्वीपीय देश श्रीलंका को एक बेहद सख्त और दो टूक चेतावनी जारी की है। वाशिंगटन की ओर से साफ शब्दों में कह दिया गया है कि यदि श्रीलंका ने किसी भी रूप में ईरान की मदद की या उसके साथ अपने रणनीतिक व आर्थिक संबंधों को और अधिक प्रगाढ़ किया, तो उसे इसके बहुत गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। अमेरिका की इस आक्रामक और खुली धमकी के बाद से न केवल कोलंबो की राजनीतिक हलकों में खलबली मच गई है, बल्कि पूरे दक्षिण एशियाई क्षेत्र में कूटनीतिक तापमान अचानक से बहुत ज्यादा बढ़ गया है। एक तरफ जहां श्रीलंका अपनी घरेलू आर्थिक बदहाली से उबरने के लिए हर संभव अंतरराष्ट्रीय सहयोग की तलाश कर रहा है, वहीं महाशक्तियों की इस खींचतान ने उसके सामने एक गंभीर संकट खड़ा कर दिया है।

ईरान और अमेरिका के बीच सुलगती आग की लपटों में क्यों फंसा श्रीलंका?

आखिर ऐसा क्या कारण है कि अमेरिका को अचानक छोटे से देश श्रीलंका को इतनी कड़ी चेतावनी देनी पड़ी? दरअसल, पश्चिम एशिया यानी मिडिल ईस्ट में अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से चली आ रही तनातनी अब वैश्विक स्तर पर फैलती जा रही है। ईरान पर अमेरिकी नेतृत्व वाले पश्चिमी देशों द्वारा कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए गए हैं ताकि उसके परमाणु और सैन्य कार्यक्रमों पर लगाम लगाई जा सके। ऐसे समय में जब ईरान दुनिया के विभिन्न देशों के साथ अपने संबंधों को मजबूत करने की कोशिश कर रहा है, तब श्रीलंका के साथ उसके कुछ व्यापारिक या कूटनीतिक संपर्कों की सुगबुगाहट ने अमेरिकी खुफिया एजेंसियों और विदेश विभाग को सतर्क कर दिया है। वाशिंगटन किसी भी कीमत पर यह बर्दाश्त करने को तैयार नहीं है कि पश्चिमी एशिया का कोई भी प्रतिबंधित देश दक्षिण एशिया के समुद्री रास्तों या बंदरगाहों के जरिए अपनी रणनीतिक स्थिति मजबूत करे। अमेरिका की यह निडर और आक्रामक कूटनीति इस बात का स्पष्ट संदेश देती है कि वह अपने विरोधियों के साथ खड़े होने वाले या उन्हें किसी भी प्रकार की अप्रत्यक्ष सहायता देने वाले देशों को भी बख्शने के मूड में नहीं है, चाहे वह देश कितना भी छोटा या आर्थिक संकट से जूझ रहा क्यों न हो।

भारत के पड़ोस में मंडराता भू-राजनीतिक संकट और रणनीतिक समीकरण

श्रीलंका के बहाes भारत के पूरे पड़ोस में अचानक से तनाव का माहौल पैदा होना नई दिल्ली के लिए भी रणनीतिक रूप से चिंता का विषय बनता जा रहा है। भारत के ठीक दक्षिण में स्थित इस द्वीप राष्ट्र में यदि अमेरिका और ईरान के बीच का यह कूटनीतिक संघर्ष गहराता है, तो इसका सीधा असर हिंद महासागर की सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता पर पड़ना लाजिमी है। भारत हमेशा से अपने पड़ोसियों के साथ संप्रभुता और स्वतंत्र विदेश नीति का पक्षधर रहा है, लेकिन अमेरिका जैसी महाशक्ति के सीधे दखل के बाद श्रीलंका की सरकार के लिए अपनी विदेश नीति को संतुलित रखना लोहे के चने चबाने जैसा साबित हो रहा है। श्रीलंकाई हुक्मरानों के सामने अब यह बहुत बड़ी धर्मसंकट की स्थिति पैदा हो गई है कि वे अपनी अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए पश्चिमी देशों और अमेरिका के साथ रिश्ते बनाए रखें या फिर अन्य देशों के साथ अपने स्वतंत्र संबंधों को तवज्जो दें। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प और महत्वपूर्ण होगा कि श्रीलंका कोलंबो में बैठे अपने नीति-निर्माताओं के जरिए वाशिंगटन के इस दबाव का सामना कैसे करता है और इस वैश्विक कूटनीतिक ड्रामे का भारत के रणनीतिक हितों पर क्या असर पड़ता है।