भारत के बढ़ते कूटनीतिक और सैन्य दबाव से घबराया ड्रैगन
अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और सीमाई क्षेत्रों के भू-राजनीतिक परिदृश्य से इस वक्त एक बहुत बड़ी और सनसनीखेज खबर सामने आ रही है, जिसने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि भारत की मजबूत होती सैन्य स्थिति और आक्रामक कूटनीति से चीन (China) अंदर तक हिल चुका है। अपनी हरकतों से बाज न आने वाले ड्रैगन ने एक बार फिर गंदी चाल चलते हुए भारतीय क्षेत्र यानी लद्दाख (Ladakh) से जुड़ी 28 जगहों के अपने मनगढ़ंत और फर्जी नाम जारी कर दिए हैं। चीन की यह बौखलाहट कोई नई नहीं है, इससे पहले भी वह तिब्बत से सटे भारतीय इलाकों और अरुणाचल प्रदेश को लेकर इस तरह के बचकाने और अवैध दावे पेश करता रहा है, जिसे भारत सरकार हमेशा से सिरे से खारिज करती आई है। लेकिन इस बार लद्दाख में आधारभूत संरचनाओं के तेजी से विकास, रणनीतिक सड़कों के निर्माण और भारतीय सेना की अटूट चौकसी से बुरी तरह डरे हुए चीन ने अपनी झुंझलाहट को इस तरह के कागजी कारनामों के जरिए बाहर निकाला है, जिसकी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी थू-थू हो रही है।
आखिर क्यों बौखलाया हुआ है चीन? सीमा पर बदलता हुआ जमीनी समीकरण और भारत की आक्रामक बॉर्डर पॉलिसी
रक्षा मामलों और कूटनीतिक रणनीतिकारों का मानना है कि चीन द्वारा इस तरह की कागजी हरकतों को अंजाम देने के पीछे उसकी गहरी हताशा और असुरक्षा की भावना छिपी है। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने लद्दाख और वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के पास जिस गति से सड़कों, सुरंगों, एयरस्ट्रिप और फॉरवर्ड पोस्ट्स का निर्माण किया है, उसने चीनी सेना पीएलए (PLA) की नींद उड़ा दी है। पहले जो इलाके सर्दियों में या दुर्गम रास्तों के कारण कटे रहते थे, वहां आज भारतीय टैंक, तोपें और आधुनिक गाड़ियां कुछ ही घंटों में पहुंच जाती हैं। भारतीय सेना की इस रणनीतिक बढ़त और मजबूत होती सामरिक स्थिति के कारण चीन को यह डर सताने लगा है कि यदि भविष्य में कोई संघर्ष होता है, तो उसे भारी रणनीतिक नुकसान उठाना पड़ सकता है। इसी मनोवैज्ञानिक दबाव और घरेलू जनता को झूठी तसल्ली देने के लिए बीजिंग प्रशासन इस प्रकार के बचकाने हथकंडों का सहारा ले रहा है, जिससे दुनिया के सामने उसका चाल, चरित्र और चेहरा पूरी तरह बेनकाब हो चुका है।
डिफेंस एक्सपर्ट्स की राय: कागजी नामों बदलने से जमीन की हकीकत नहीं बदलती, भारत की दो टूक चेतावनी
इस पूरे मामले पर देश के जाने-माने रक्षा विशेषज्ञों और पूर्व सैन्य अधिकारियों का कहना है कि चीन का यह तथाकथित 'नाम बदलने का खेल' केवल एक मनोवैज्ञानिक युद्ध (Psychological Warfare) और प्रोपेगैंडा का हिस्सा है। अंतरराष्ट्रीय कानून और भू-राजनीतिक नियमों के अनुसार, किसी दूसरे संप्रभु देश के अंदरूनी इलाकों या सीमावर्ती क्षेत्रों के नाम अपनी संसद या मानचित्र में बदल देने से जमीन पर वास्तविक नियंत्रण नहीं बदला जा सकता। भारत सरकार और विदेश मंत्रालय ने हमेशा की तरह इस बार भी चीन की इन हरकतों पर कड़ी आपत्ति जताते हुए स्पष्ट शब्दों में कह दिया है कि लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश भारत के अभिन्न और अविभाज्य अंग थे, हैं और हमेशा रहेंगे। नाम बदलने से लद्दाख की भौगोलिक और ऐतिहासिक सच्चाई पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है। भारतीय कूटनीति अब रक्षात्मक रुख से पूरी तरह बाहर निकलकर आक्रामक और स्पष्ट दो टूक जवाब देने की नीति पर काम कर रही है, जो ड्रैगन को रास नहीं आ रहा है।
भारत की वैश्विक कूटनीतिक घेराबंदी और भविष्य की रणनीतिक चुनौतियां
आज का भारत 1962 वाला भारत नहीं है, बल्कि वह हर मोर्चे पर चीन को आंख में आंख डालकर जवाब देने की ताकत रखता है। इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में क्वाड (QUAD) देशों की मजबूती, हिंद महासागर में भारतीय नौसेना की बढ़ती ताकत और पश्चिमी देशों के साथ रणनीतिक साझेदारियों ने चीन को चारों तरफ से घेर लिया है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत ने जिस प्रकार से चीन की विस्तारवादी नीतियों (Expansionist Policy) को बेनकाब किया है, उससे ड्रैगन कूटनीतिक रूप से अलग-थलग पड़ता जा रहा है। लद्दाख में 28 जगहों के नाम बदलने की यह कोशिश उसी हताशा का नतीजा है जो एक कमजोर और घबराए हुए देश की निशानी होती है। आने वाले दिनों में भारत अपनी सीमा सुरक्षा को और अधिक चाक-चौबंद करने के साथ-साथ इस तरह की हरकतों का कूटनीतिक और आर्थिक दोनों स्तरों पर कड़ा जवाब देता रहेगा, ताकि ड्रैगन को यह समझ आ सके कि नए भारत के साथ खिलवाड़ करना अब उसके लिए आसान नहीं होगा।