असीम मुनीर बनाम शहबाज की जुबानी जंग और मोहसिन नकवी की कुर्सी पर मंडराता संकट
पाकिस्तान की राजनीति एक बार फिर से एक ऐसे चौराहे पर खड़ी है जहां से देश का भविष्य पूरी तरह से धुंधला और अनिश्चित नजर आ रहा है। इस्लामाबाद के गलियारों में इन दिनों केवल एक ही चर्चा आम है कि क्या देश की चुनी हुई नागरिक सरकार और शक्तिशाली सैन्य मुख्यालय के बीच सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा है। हालात यह बयां कर रहे हैं कि पर्दे के पीछे और कभी-कभी खुले तौर पर भी राजनेता और सेना के सर्वोच्च अधिकारियों के बीच वर्चस्व की एक खामोश लेकिन बेहद खतरनाक जंग छिड़ी हुई है। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की सरकार के सामने एक तरफ आर्थिक बदहाली और महंगाई की मार से जूझती जनता है, तो दूसरी तरफ सेना प्रमुख फील्ड मार्शल सैयद असीम मुनीर के बढ़ते प्रशासनिक और रणनीतिक दखल ने सियासी पारे को सांत्वना देने के बजाय और अधिक गरमा दिया है। देश की सत्ता का रिमोट कंट्रोल वास्तव में किसके हाथ में है, यह सवाल अब आम जनता की जुबान पर भी खुलकर आने लगा है।
असीम मुनीर बनाम शहबाज शरीफ: जुबानी जंग और सत्ता की खींचतान
पाकिस्तान के हुक्मरेानों के बीच आंतरिक कलह अब किसी से छिपी नहीं रही है। एक तरफ जहां प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ अंतरराष्ट्रीय मंचों और देश के भीतर अपनी सरकार की उपलब्धियों का ढिंढोरा पीटते हैं, वहीं दूसरी तरफ वास्तविक नीतिगत फैसले और रणनीतिक दिशा-निर्देश सीधे तौर पर जीएचक्यू (GHQ) यानी सैन्य मुख्यालय से तय होते नजर आते हैं। जानकारों का मानना है कि सेना के बढ़ते प्रभाव के आगे नागरिक प्रशासन पूरी तरह से बेबस नजर आ रहा है। जब भी देश की आर्थिक नीतियों या विदेशी कूटनीति पर कोई बड़ा फैसला लेना होता है, तो प्रधानमंत्री कार्यालय की भूमिका केवल एक मुखौटा बनकर रह जाती है। इस असंतुलन के कारण पाकिस्तान की सत्ताधारी पार्टी के भीतर भी सुगबुगाहट तेज हो गई है कि आखिर कब तक चुनी हुई सरकार सेना के साये तले काम करती रहेगी। शहबाज शरीफ की लाख कोशिशों के बावजूद यह साफ हो चुका है कि पाकिस्तान की व्यवस्था में अंतिम मुहर हमेशा वर्दी वालों की ही लगती है, जिससे दोनों पक्षों के बीच अविश्वास की खाई लगातार गहरी होती जा रही है।
क्रिकेट बोर्ड से लेकर सियासत तक: क्या छिन जाएगी मोहसिन नकवी की कुर्सी?
इस मची भगदड़ और राजनीतिक उठापटक के बीच पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड (PCB) के चेयरमैन और देश के गृह मंत्री मोहसिन नकवी की भूमिका और उनकी कुर्सी भी खतरे में पड़ती दिख रही है। हालिया खेल आयोजनों, ट्रॉफियों और एशियाई क्रिकेट परिषद के मंच पर जिस तरह के विवाद देखने को मिले हैं और उसके बाद से पाकिस्तान क्रिकेट को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जो फजीहत झेलनी पड़ी है, उसने अंदरूनी हलकों में भूचाल ला दिया है। राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चाएं तेज हो गई हैं कि क्या क्रिकेट की कमान संभालने वाले मोहसिन नकवी अपनी कुर्सी बचा पाएंगे या फिर इस मची खींचतान में उनकी भी विदाई तय है। खेल प्रेमियों और जानकारों का कहना है कि जहां एक तरफ देश की अर्थव्यवस्था डूब रही है और दूसरी तरफ क्रिकेट कूटनीति भी बुरी तरह से पिट रही है, ऐसे में चेहरों को बदलने का खेल पाकिस्तान में कभी भी शुरू हो सकता है। यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि आने वाले दिनों में पाकिस्तान की यह अंतर्कलह देश को किस नई दिशा में लेकर जाती है।