वो 67 शब्द, जिसने बदला मिडिल ईस्ट का नक्शा, इजरायल की नींव रखने वाला बालफोर डिक्लेरेशन क्या था

वो 67 शब्द, जिसने बदला मिडिल ईस्ट का नक्शा, इजरायल की नींव रखने वाला बालफोर डिक्लेरेशन क्या था

अंतरराष्ट्रीय इतिहास और मध्य पूर्व (Middle East) के भू-राजनीतिक संघर्षों की जब भी बात होती है, तो एक सदी पुराने दस्तावेज का जिक्र सबसे प्रमुखता से आता है। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान लिखे गए महज 67 शब्दों के एक पत्र ने दुनिया के नक्शे और राजनीति को इस कदर बदल कर रख दिया कि उसका खौफनाक और विस्फोटक असर आज भी हम सभी के सामने है। यह ऐतिहासिक दस्तावेज कोई और नहीं बल्कि प्रसिद्ध 'बालफोर डिक्लेरेशन' (Balfour Declaration) था, जिसे आधुनिक इजरायल राज्य की नींव का पहला और सबसे मजबूत स्तंभ माना जाता है। आखिर ब्रिटेन के विदेश मंत्री द्वारा लिखे गए उन 67 शब्दों में ऐसा क्या लिखा था, जिसने एक पूरे क्षेत्र की किस्मत पलट दी और अरब-इजरायल संघर्ष की भयानक आग भड़का दी? आइए जानते हैं इस ऐतिहासिक फैसले की पूरी अंदरूनी कहानी।

क्या था बालफोर डिक्लेरेशन और किसने लिखा था यह ऐतिहासिक 67 शब्दों का पत्र?

बालफोर डिक्लेरेशन 2 नवंबर 1917 को जारी किया गया एक आधिकारिक पत्र था। यह पत्र तत्कालीन ब्रिटिश विदेश मंत्री आर्थर जेम्स बालफोर (Arthur James Balfour) ने ब्रिटेन के एक प्रमुख यहूदी नेता लॉर्ड वाल्टर रोथ्सचाइल्ड (Lord Walter Rothschild) को भेजा था। इस छोटे से पत्र में कुल जमा 67 शब्द थे, जिनमें ब्रिटिश सरकार ने यहूदी समुदाय से एक बड़ा और ऐतिहासिक वादा किया था। पत्र में स्पष्ट शब्दों में कहा गया था कि ब्रिटिश सरकार फिलिस्तीन की पावन भूमि पर यहूदी लोगों के लिए एक 'राष्ट्रीय घर' (National Home) की स्थापना का पूरा समर्थन करती है और इस लक्ष्य को हासिल करने में अपनी ओर से हर संभव सहायता प्रदान करेगी। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ऑटोमन साम्राज्य (उस्मानी साम्राज्य) के पतन के साथ ही इस नीति ने वैश्विक राजनीति में तहलका मचा दिया था।

67 शब्दों के उस ऐतिहासिक पत्र में आखिर क्या लिखा था?

ब्रिटिश विदेश मंत्री आर्थर बालफोर द्वारा रोथ्सचाइल्ड को भेजे गए उस 67 शब्दों के मूल संदेश का सार कुछ इस प्रकार था: "महामहिम की सरकार फिलिस्तीन में यहूदी लोगों के लिए एक राष्ट्रीय घर की स्थापना का समर्थन करती है और इस उद्देश्य की प्राप्ति को सुगम बनाने के लिए अपने श्रेष्ठ प्रयासों का उपयोग करेगी, यह स्पष्ट रूप से समझते हुए कि ऐसा कुछ भी नहीं किया जाएगा जिससे फिलिस्तीन में मौजूद गैर-यहूदी समुदायों के नागरिक और धार्मिक अधिकारों को कोई नुकसान पहुंचे।" ब्रिटेन का यह छोटा सा बयान भविष्य में यहूदी लोगों के लिए अपने सपनों के देश 'इजरायल' के निर्माण का कानूनी और कूटनीतिक आधार बन गया, जिसने फिलिस्तीन की भूमि पर ब्रिटिश शासन के दौरान यहूदी प्रवासियों के आगमन को बहुत तेजी से बढ़ा दिया।

द्वितीय विश्व युद्ध, यहूदी प्रवासन और 1948 में इजरायल की आधिकारिक स्थापना

बालफोर घोषणापत्र जारी होने के बाद से ही दुनिया भर के कोने-कोने से यहूदियों का फिलिस्तीन की ओर पलायन तेज हो गया। प्रथम विश्व युद्ध के बाद जब ऑटोमन साम्राज्य का पतन हुआ, तो राष्ट्र संघ (League of Nations) ने फिलिस्तीन का प्रशासन ब्रिटेन को सौंप दिया, जिसे 'ब्रिटिश मैंडेट फॉर पलेस्टाइन' कहा गया। इसके बाद द्वितीय विश्व युद्ध और नाजी जर्मनी में हुए भयानक नरसंहार (होलॉकास्ट) के दौरान लाखों यहूदियों ने शरणार्थी के रूप में फिलिस्तीन में शरण ली। धीरे-धीरे वहां यहूदी आबादी और अरब निवासियों के बीच हिंसक झड़पें बढ़ने लगीं। आखिरकार, 14 मई 1948 को ब्रिटिश शासन समाप्त हुआ और यहूदियों ने बालफोर डिक्लेरेशन की भावना के आधार पर स्वतंत्र 'इजरायल' राज्य की स्थापना की घोषणा कर दी, जिसके तुरंत बाद पहला अरब-इजरायल युद्ध छिड़ गया।

मिडिल ईस्ट के नक्शे पर पड़ा असर और 78 साल पुराना अनसुलझा संघर्ष

बालफोर डिक्लेरेशन का सबसे विनाशकारी और दूरगामी परिणाम वहां के मूल निवासी फिलिस्तीनी अरबों को भुगतना पड़ा। 1948 में इजरायल के निर्माण के साथ ही लाखों फिलिस्तीनियों को अपनी सदियों पुरानी जमीन और घरों से बेदखल होना पड़ा, जिसे इतिहास में 'नकबा' (तबाही) के नाम से जाना जाता है। इस एक फैसले ने मिडिल ईस्ट के पूरे राजनीतिक और भौगोलिक नक्शे को हमेशा-हमेशा के लिए बदल दिया। जो क्षेत्र कभी ऑटोमन साम्राज्य का शांत हिस्सा हुआ करता था, वह पिछले सात-आठ दशकों से लगातार युद्धों, सैन्य संघर्षों, रॉकेट हमलों और शरणार्थी संकट का मुख्य केंद्र बना हुआ है। इजरायल और फिलिस्तीन के बीच आज जारी भीषण जंग और गाजा संकट की जड़ें भी कहीं न कहीं 1917 के इसी 67 शब्दों के बालफोर डिक्लेरेशन से जुड़ी हुई हैं।

आधुनिक कूटनीति और इतिहास की नजर में बालफोर डिक्लेरेशन के मायने

ऐतिहासिक दृष्टिकोण से बालफोर डिक्लेरेशन को दुनिया की सबसे प्रभावशाली और विवादास्पद कूटनीतिक घोषणाओं में से एक माना जाता है। एक तरफ जहां इजरायल और दुनिया भर के यहूदी इसे अपने पुनर्जन्म और राष्ट्रीय अस्तित्व की दिशा में सबसे बड़ा और पवित्र मील का पत्थर मानते हैं, वहीं दूसरी तरफ फिलिस्तीनी और अरब जगत इसे साम्राज्यवाद का एक काला फैसला और अपनी मातृभूमि के साथ हुआ सबसे बड़ा ऐतिहासिक धोखा करार देते हैं। आज सदी से भी अधिक समय बीत जाने के बाद भी आर्थर बालफोर के वे 67 शब्द मध्य पूर्व में शांति की हर कोशिश के बीच एक ऐतिहासिक दीवार बनकर खड़े हैं, जिसने आधुनिक दुनिया का इतिहास और भूगोल दोनों बदलकर रख दिया।