रूसी तेल पर ट्रंप का नया कानून, क्या भारत पर लगेगा 100% टैरिफ? जानिए 3 बड़े पेच और पूरा सच
रूस से रियायती दरों पर कच्चा तेल खरीदने को लेकर संयुक्त राज्य अमेरिका ने एक नया कानूनी दांव चला है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बेहद सख्त विधेयक पर हस्ताक्षर कर दिए हैं, जिसके तहत वाशिंगटन को उन देशों से आने वाले सामान पर 100 प्रतिशत तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने का अधिकार मिल गया है जो रूस से भारी मात्रा में तेल और गैस आयात करते हैं।
इस कानून के दायरे में भारत, चीन, तुर्की और अजरबैजान जैसे प्रमुख देश आ सकते हैं। हालांकि, संभावित पाबंदियों की खबरों के बीच नई दिल्ली पूरी तरह शांत और तैयार नजर आ रही है। भारत ने स्पष्ट और कड़े शब्दों में संदेश दे दिया है कि यदि एकतरफा दंडात्मक टैरिफ थोपे गए, तो इसका सीधा और प्रतिकूल असर दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों पर पड़ेगा।
विशेषज्ञों का आकलन: कूटनीतिक जंग और कारोबारी गणित
भारत-अमेरिका परमाणु समझौते में अहम भूमिका निभा चुके और अंतरराष्ट्रीय व्यापार मामलों के वरिष्ठ विशेषज्ञ रोबिंदर सचदेव के मुताबिक, अमेरिका भारत पर असल में कितना टैरिफ लगाएगा, यह फैसला अब पूरी तरह राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के विवेक पर टिका है।
व्यापार के वित्तीय गणित को समझाते हुए उन्होंने बताया कि यदि 1 प्रतिशत टैरिफ बढ़ता है, तो वह लगभग 1 अरब डॉलर के द्विपक्षीय कारोबार को सीधे प्रभावित करता है। इस आधार पर 50 फीसदी का टैरिफ 50 अरब डॉलर के व्यापार पर सीधा असर डालेगा। उन्होंने इसे पूरी तरह एक जटिल कूटनीतिक लड़ाई करार दिया और रेखांकित किया कि अतिरिक्त आयात शुल्क केवल रूसी तेल पर नहीं, बल्कि भारत से अमेरिका भेजे जाने वाले सभी तरह के निर्मित सामानों पर लगाया जाएगा, जो अर्थव्यवस्था के लिए चिंता का विषय बन सकता है।
क्या है 'लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट 2026'?
अमेरिकी संसद के दोनों सदनों—हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स और सीनेट—ने शुक्रवार को 'लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट ऑफ़ 2026' को मंजूरी दी, जिस पर राष्ट्रपति ट्रंप के हस्ताक्षर होते ही यह कानून बन गया। इस कानून की बारीकियों पर गौर करें तो इसके अंतिम वैधानिक पाठ (फाइनल टेक्स्ट) में सीधे तौर पर भारत का नाम दर्ज नहीं है और न ही यह कानून स्वतः किसी देश पर 100% टैरिफ थोपता है। बल्कि, यह एक ऐसा व्यापक ढांचा तैयार करता है जिसमें कानून प्रभावी होने के 30 दिन बाद जो देश रूस से कच्चा तेल या गैस खरीदेंगे और जो पिछले 12 महीनों में रूस के शीर्ष 5 सबसे बड़े आयातकों में शामिल रहे हैं, उन पर राष्ट्रपति 100% तक की अतिरिक्त ड्यूटी लगा सकते हैं। शुरुआत में हाउस के एक संशोधन में भारत, चीन, तुर्की, अजरबैजान, हंगरी, स्लोवाकिया, यूएई, सिंगापुर, कजाकिस्तान और किर्गिस्तान के नाम शामिल करने का प्रस्ताव था, लेकिन अंतिम मसौदे से देशों के नाम हटा दिए गए।
भारतीय निर्यात पर असर: 104 अरब डॉलर का व्यापार दांव पर
आधिकारिक व्यापार आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2025 में भारत से अमेरिका को होने वाला कुल वस्तु निर्यात लगभग 103.8 बिलियन डॉलर (करीब 104 अरब डॉलर) के स्तर पर था। यदि 100% अतिरिक्त शुल्क लागू किया जाता है, तो इस पूरे व्यापार चक्र पर असर पड़ेगा। हालांकि, इसका यह अर्थ कतई नहीं है कि भारत की अर्थव्यवस्था या जीडीपी को सीधे 104 अरब डॉलर का नुकसान हो जाएगा।
टैरिफ का भुगतान अमेरिका के भीतर आयातक करते हैं और इसका आर्थिक बोझ अमेरिकी उपभोक्ताओं, स्थानीय आयातकों तथा भारतीय निर्यातकों के बीच बंटता है। अनुमान के मुताबिक, यदि कीमतों में भारी बढ़ोतरी के चलते अमेरिकी बाजार में भारतीय सामान की मांग में 40% की गिरावट आती है, तो सालाना बिक्री में करीब 42 बिलियन डॉलर का नुकसान हो सकता है, वहीं 80% गिरावट की स्थिति में यह नुकसान 83 बिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है। इसका सबसे ज्यादा असर फार्मास्यूटिकल्स, इंजीनियरिंग गुड्स, जेम्स एंड ज्वैलरी, टेक्सटाइल और इलेक्ट्रॉनिक मशीनरी जैसे प्रमुख भारतीय क्षेत्रों पर पड़ेगा।
भारत पर 100% टैरिफ लगाना अमेरिका के लिए क्यों नहीं है आसान?
कागजी तौर पर कानून बनने के बावजूद जमीनी हकीकत में भारत पर इतना बड़ा टैरिफ लगाना वाशिंगटन के लिए बेहद मुश्किल है, जिसके पीछे 3 प्रमुख वैश्विक अड़चनें हैं। पहली बड़ी वजह इंडो-पैसिफिक की भू-राजनीति है; चीन के बढ़ते दबदबे को संतुलित करने के लिए भारत अमेरिका का सबसे अपरिहार्य साझेदार है।
कड़ा टैरिफ लगाने से दोनों देशों की रक्षा और तकनीकी साझेदारी टूट सकती है और अमेरिका किसी भी सूरत में भारत को रूस-चीन धुरी की ओर पूरी तरह धकेलने का रणनीतिक जोखिम नहीं ले सकता।
दूसरी अड़चन अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार की है; यदि भारत ने रूसी तेल लेना अचानक बंद कर दिया, तो उसे खाड़ी देशों का रुख करना होगा। इससे वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें अचानक $100 से $120 प्रति बैरल के पार जा सकती हैं, जिससे खुद अमेरिका और यूरोप में भीषण महंगाई भड़क जाएगी। तीसरी अड़चन खुद दिग्गज अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों (Apple, Google, Boeing, Tesla) की है, जो अपनी मैन्युफैक्चरिंग चीन से हटाकर भारत ला रही हैं। टैरिफ लगते ही अमेरिकी कंपनियों की ग्लोबल सप्लाई चेन ध्वस्त हो जाएगी और भारत में बने आईफोन या अन्य पुर्जे अमेरिकी बाजार में बेहद महंगे हो जाएंगे, साथ ही भारत के जवाबी टैरिफ से अमेरिकी कॉरपोरेट्स को दोहरा झटका लगेगा।