आखिर क्यों 4 साल के मासूमों को परिवारों से दूर कर रहा है चीन, जानिए इस 'सीक्रेट' मिशन के पीछे का सच

आखिर क्यों 4 साल के मासूमों को परिवारों से दूर कर रहा है चीन, जानिए इस 'सीक्रेट' मिशन के पीछे का सच

तिब्बत में रहने वाले लाखों परिवार आज एक बड़े बदलाव का सामना कर रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि पिछले करीब दस वर्षों में चीन ने दस लाख से अधिक तिब्बती बच्चों को उनके परिवारों से अलग कर बोर्डिंग स्कूलों में भेजा है। कूटनीतिक मामलों के जानकार ब्रह्मा चेलानी ने द हिल में प्रकाशित अपने लेख में दावा किया है कि इनमें बड़ी संख्या ऐसे बच्चों की है जिनकी उम्र सिर्फ चार या पांच साल है। ये बच्चे साल का अधिकांश समय अपने घर और परिवार से दूर बिताते हैं।

शिक्षा के साथ पहचान बदलने का आरोप

इन बोर्डिंग स्कूलों में पढ़ाई का मुख्य माध्यम मंदारिन भाषा है। चीन इन संस्थानों को आधुनिक शिक्षा और बेहतर विकास का मॉडल बताता है। वहीं आलोचकों का कहना है कि इस व्यवस्था का असर केवल पढ़ाई तक सीमित नहीं है। उनका आरोप है कि बच्चों को धीरे-धीरे उनकी मातृभाषा, धार्मिक परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत से दूर किया जा रहा है ताकि वे अपनी मूल पहचान से अलग होकर चीनी समाज के अनुरूप ढल जाएं।

चीन की नापाक चाल

विशेषज्ञ मानते हैं कि बचपन में मिलने वाली शिक्षा किसी भी समाज के भविष्य को तय करती है। इसी कारण चिंता जताई जा रही है कि इन बच्चों को यह संदेश दिया जा रहा है कि उनकी पारंपरिक संस्कृति और जीवन शैली अब पुराने समय की बात है। साथ ही उन्हें अपनी धार्मिक मान्यताओं से भी दूर करने की कोशिश की जा रही है। इससे नई पीढ़ी का अपने इतिहास और अपनी जड़ों से संबंध कमजोर पड़ सकता है।

इतिहास से जुड़ी तुलना

लेख में इस स्थिति की तुलना औपनिवेशिक दौर से भी की गई है। उदाहरण के तौर पर ब्रिटिश शासन के दौरान कई समाजों की भाषा और संस्कृति पर गहरा असर पड़ा था। आज अमेरिका, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे देश भी स्वीकार करते हैं कि उपनिवेशवाद और जबरन समरसता की नीतियों ने कई समुदायों से उनकी परंपराएं और सांस्कृतिक पहचान छीन ली थी। इसी वजह से तिब्बत में हो रहे बदलावों को लेकर भी कई अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ गंभीर चिंता जता रहे हैं।