नेतन्याहू सबसे ज्यादा सीटें जीतकर भी PM नहीं बन पाएंगे? इजरायल में सरकार बनाने का चक्रव्यूह

नेतन्याहू सबसे ज्यादा सीटें जीतकर भी PM नहीं बन पाएंगे? इजरायल में सरकार बनाने का चक्रव्यूह

मध्य पूर्व के सबसे शक्तिशाली देश इजरायल के हालिया आम चुनाव में वोटों की गिनती पूरी होने के बाद देश का राजनीतिक परिदृश्य बेहद दिलचस्प और पेचीदा मोड़ पर पहुंच गया है। पूर्व प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू (Benjamin Netanyahu) की लिकुड पार्टी और उनका दक्षिणपंथी धार्मिक गठबंधन सबसे अधिक सीटें जीतकर संसद (नेसेट - Knesset) में सबसे बड़े राजनीतिक ब्लॉक के रूप में उभरा है। चुनावी आंकड़ों और जनमत के लिहाज से नेतन्याहू ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि इजरायली राजनीति में उनका प्रभाव बेहद गहरा है। हालांकि, सबसे ज्यादा सीटें हासिल करने के बावजूद उनके दोबारा देश का प्रधानमंत्री बनने की राह में एक ऐसा अभेद्य संवैधानिक और राजनीतिक चक्रव्यूह खड़ा हो गया है, जिसने यरूशलेम से लेकर तेल अवीव तक के राजनीतिक विश्लेषकों को चौंका दिया है।

इजरायली संसद 'नेसेट' का जादुई आंकड़ा और सरकार बनाने के लिए 61 सीटों की अनिवार्यता

इजरायल की 120 सदस्यों वाली संसद 'नेसेट' (Knesset) में सरकार बनाने के लिए किसी भी गठबंधन या दल को स्पष्ट बहुमत यानी कम से कम 61 सीटों का आंकड़ा हासिल करना अनिवार्य होता है। वर्तमान चुनाव परिणामों में 85 से 90 प्रतिशत से अधिक मतों की गणना के बाद नेतन्याहू का दक्षिणपंथी गठबंधन 53 से 55 सीटों के आसपास सिमटता हुआ नजर आ रहा है। यद्यपि वे व्यक्तिगत तौर पर सबसे बड़े नेता के रूप में उभरे हैं, लेकिन 61 के जादुई आंकड़े से 6-8 सीटें दूर होना उनके लिए सबसे बड़ी संवैधानिक बाधा बन गया है। इजरायल की आनुपातिक प्रतिनिधित्व (Proportional Representation) प्रणाली में जब तक कोई नेता 61 सांसदों का समर्थन पत्र राष्ट्रपति को नहीं सौंपता, तब तक उसे सरकार बनाने का आधिकारिक न्योता नहीं मिल सकता।

विरोधी गुटों का एक होना और गादी आइजनकोट-लैपिड गठबंधन का कड़ा रुख

नेतन्याहू के प्रधानमंत्री बनने के रास्ते में सबसे बड़ी रुकावट विरोधी दलों की लामबंदी है। गादी आइजनकोट (Gadi Eisenkot), यायर लैपिड और अन्य मध्यमार्गी व वामपंथी दलों का विरोधी गुट 48 से 50 सीटों पर काबिज है। इसके अलावा 19 सीटों पर बढ़त बनाए हुए अरब पार्टियां (Arab Parties) किसी भी सूरत में बेंजामिन नेतन्याहू को दोबारा सत्ता में नहीं देखने देना चाहतीं। भले ही विरोधी गुट आपस में विचारधारा के स्तर पर पूरी तरह से एक न हों, लेकिन 'एंटी-नेतन्याहू' (Anti-Netanyahu) मोर्चे पर वे एकजुट होकर नेतन्याहू के खिलाफ मतदान करने को तैयार हैं। इस स्थिति में नेतन्याहू के पास किसी भी विपक्षी दल को तोड़कर अपने पाले में लाने के विकल्प बेहद सीमित हो गए हैं, जिससे उनका प्रधानमंत्री पद का सपना खटाई में पड़ता दिख रहा है।

अरब पार्टियां बनीं 'किंगमेकर': इजरायल के राजनीतिक इतिहास का सबसे अनूठा समीकरण

इजरायल के चुनावी इतिहास में इस बार अरब राजनीतिक दलों (Arab Parties) की 19 सीटें सत्ता की चाबी साबित हो रही हैं। यदि नेतन्याहू को 61 का आंकड़ा छूना है, तो उन्हें या तो किसी कट्टर प्रतिद्वंद्वी को मनाना होगा या फिर बेहद जटिल मोलभाव के दौर से गुजरना होगा। दूसरी ओर, यदि विरोधी गठबंधन इन अरब दलों के बाहरी या प्रत्यक्ष समर्थन से कोई कामचलाऊ सरकार बनाने की कोशिश करता है, तो इजरायल की राजनीति में एक नया इतिहास रचा जाएगा। हालांकि, वैचारिक मतभेदों के कारण अरब दलों के साथ किसी भी समझौते को इजरायल का दक्षिणपंथी वोटर सहर्ष स्वीकार नहीं करता, जिससे सरकार गठन का यह गणित और भी अधिक उलझ गया है।

क्या फिर से होंगे देश में नए चुनाव या बनेगी राष्ट्रीय एकता सरकार?

यदि बेंजामिन नेतन्याहू अगले निर्धारित समय सीमा के भीतर 61 सीटों का लिखित समर्थन जुटाने में पूरी तरह से विफल रहते हैं, तो इजरायल के राष्ट्रपति दूसरे सबसे बड़े दल के नेता को सरकार बनाने का न्योता दे सकते हैं। यदि वह गुट भी बहुमत साबित करने में नाकाम रहता है, तो इजरायल में एक बार फिर से मध्यावधि चुनाव (Snap Elections) की नौबत आ सकती है। पिछले कुछ वर्षों में इजरायल पहले ही कई बार लगातार चुनावों के दौर से गुजर चुका है, जिससे देश में राजनीतिक अस्थिरता और आर्थिक अनिश्चितता का माहौल बना हुआ है। आने वाले कुछ दिन यह पूरी तरह साफ कर देंगे कि क्या नेतन्याहू इस राजनीतिक चक्रव्यूह को भेदकर पांचवीं बार प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठ पाएंगे या फिर इजरायल को कोई नया नेतृत्व देखने को मिलेगा।