Up Kiran, Digital Desk: पाकिस्तान ने हाल ही में यूएसए प्रेसिडेंट ट्रंप द्वारा बनाए गए ‘बोर्ड ऑफ पीस फॉर गाजा’ में शामिल होने का निर्णय लिया है। इस बोर्ड का उद्देश्य गाजा में युद्ध के बाद शांति और पुनर्निर्माण की प्रक्रिया को बढ़ावा देना है। पाकिस्तान समेत आठ मुस्लिम देशों ने इस बोर्ड में शामिल होने का ऐलान किया है। हालांकि, पाकिस्तान के इस कदम को लेकर देशभर में राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। विपक्षी नेता और नागरिक समाज के संगठन इसकी आलोचना कर रहे हैं और सवाल उठा रहे हैं कि क्या पाकिस्तान ने अमेरिका के करीब जाने के परिणामों को ठीक से समझा है।
शहबाज सरकार के फैसले पर उठ रहे सवाल
पाकिस्तान सरकार इस कदम को शांति की दिशा में एक सकारात्मक कदम मानती है, लेकिन देश के अंदर यह निर्णय कई लोगों को गलत, गद्दारी और विवादास्पद लगता है। सीनेट में विपक्ष के नेता, अल्लामा राजा नासिर अब्बास ने इसे नैतिक रूप से गलत करार दिया है। उनके अनुसार, इस पहल से फिलिस्तीनियों का अपना शासन अधिकार छीनने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने इसे बाहरी ताकतों के हस्तक्षेप के रूप में देखा, जो गाजा को एक तरह से उपनिवेशित करने का प्रयास कर रहे हैं। पाकिस्तान में कई सामाजिक कार्यकर्ता और राजनीतिक विश्लेषक इस पर सवाल उठा रहे हैं कि क्या यह निर्णय फिलिस्तीन के पक्ष में है या इसे एक निहित राजनीतिक एजेंडे के तहत किया जा रहा है।
फिलिस्तीन के हक के लिए चिंता
इस निर्णय के विरोधी यह मानते हैं कि पाकिस्तान का इस बोर्ड में शामिल होना फिलिस्तीन के अधिकारों के साथ समझौता करने जैसा है। उनका कहना है कि गाजा में शांति स्थापित करने की प्रक्रिया का मतलब यह नहीं हो सकता कि फिलिस्तीनियों से उनकी स्वायत्तता छीन ली जाए। इस निर्णय से पाकिस्तान में कई लोगों के मन में यह सवाल है कि क्या यह पाकिस्तान की विदेश नीति के लिए सही दिशा है या इसे अमेरिका की रणनीतिक जरूरतों के तहत उठाया गया कदम माना जा सकता है।
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