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Up kiran,Digital Desk : दुनिया की सबसे शक्तिशाली अर्थव्यवस्थाओं के समूह 'G7' की विदेश मंत्रियों की बैठक के दौरान फ्रांस की धरती पर भारत का दबदबा एक बार फिर साफ नजर आया। पेरिस में जारी इस हाई-प्रोफाइल बैठक के बीच भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर और फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के बीच हुई विशेष मुलाकात ने वैश्विक कूटनीति के गलियारों में हलचल तेज कर दी है। जयशंकर ने न केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विशेष मित्रता संदेश मैक्रों तक पहुंचाया, बल्कि दोनों नेताओं ने सुलगते वैश्विक मुद्दों पर बंद कमरे में लंबी चर्चा भी की।

मोदी का संदेश और रणनीतिक साझेदारी: जयशंकर-मैक्रों की 'केमिस्ट्री'

बैठक की शुरुआत में विदेश मंत्री जयशंकर ने राष्ट्रपति मैक्रों को पीएम मोदी की ओर से शुभकामनाएं दीं। मुलाकात के बाद जयशंकर ने सोशल मीडिया पर अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि राष्ट्रपति मैक्रों के साथ विभिन्न वैश्विक चुनौतियों पर हुई चर्चा से जो 'इनसाइट्स' (अंतर्दृष्टि) मिली हैं, वे बेहद मूल्यवान हैं। जानकारों का मानना है कि इस बातचीत में भारत-फ्रांस के बीच रक्षा, अंतरिक्ष और परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में चल रहे सामरिक रोडमैप को और गति देने पर सहमति बनी है।

G7 में भारत की भूमिका: बिना भारत, समाधान संभव नहीं

हालांकि भारत G7 का पूर्ण सदस्य नहीं है, लेकिन फ्रांस द्वारा विशेष भागीदार के रूप में भारत को आमंत्रित करना इस बात का प्रमाण है कि आज के दौर में किसी भी वैश्विक संकट का समाधान भारत के बिना अधूरा है। सम्मेलन के दौरान लाल सागर और 'होर्मुज जलडमरूमध्य' में बढ़ते तनाव और समुद्री सुरक्षा को लेकर गहरी चिंता जताई गई। जयशंकर ने स्पष्ट किया कि भारत समुद्री व्यापारिक मार्गों की सुरक्षा के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।

कनाडा और सऊदी अरब के नेताओं से भी मिले जयशंकर

फ्रांस के राष्ट्रपति से भेंट के बाद विदेश मंत्री ने कूटनीतिक सक्रियता दिखाते हुए सऊदी अरब, ब्रिटेन और विशेष रूप से कनाडा की विदेश मंत्री से भी मुलाकात की। कनाडा के साथ हालिया तनावपूर्ण संबंधों के बीच इस मुलाकात को काफी अहम माना जा रहा है। इसके अलावा जयशंकर ने फ्रांस में स्थित 'स्वामी विवेकानंद सांस्कृतिक केंद्र' का दौरा कर भारत की सॉफ्ट पावर का भी प्रदर्शन किया।

पश्चिम एशिया और हिंद-प्रशांत पर विशेष फोकस

बैठक के एजेंडे में पश्चिम एशिया का संघर्ष और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन की बढ़ती सक्रियता भी शामिल रही। फ्रांस और भारत दोनों ही एक स्वतंत्र और खुला हिंद-प्रशांत क्षेत्र चाहते हैं। रक्षा क्षेत्र में 'राफेल' और 'स्कॉर्पीन पनडुब्बियों' के बाद अब दोनों देश नई पीढ़ी की सैन्य तकनीक साझा करने की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं। कुल मिलाकर, जयशंकर की यह पेरिस यात्रा भारत के 'विश्व बंधु' वाले दृष्टिकोण को और अधिक मजबूती देने वाली साबित हुई है।