
UP Politics: बसपा अध्यक्ष मायावती ने 13 साल बाद एक बार फिर अपने पुराने रास्ते को अपनाने का निर्णय लिया है। 2007 में सत्ता तक पहुंचाने वाली भाईचारा कमेटियों को वो फिर से जिंदा कर रही हैं। इस बार उनका मकसद 2027 के विधानसभा चुनाव में दलित, पिछड़े, अति पिछड़े और मुस्लिम वोटों को सहेजकर सत्ता के सिंहासन तक पहुंचना है। पार्टी ने पहले चरण में एससी, एसटी, ओबीसी और मुस्लिम समुदाय को जोड़कर कमेटियां गठित करना शुरू कर दिया है। आगे ब्राह्मणों और अन्य जातियों को शामिल करने की योजना है। कुल मिलाकर इन रणनीतियों से सपा को भारी नुकसान हो सकता है।
लखनऊ मंडल में कमेटी गठन शुरू
मायावती की पार्टी ने जिला स्तर पर भाईचारा कमेटियों को अब विधानसभावार बनाने का फैसला किया है। इसके लिए जिलाध्यक्षों से नाम मांगे गए थे, जिनके आधार पर कमेटियों का गठन शुरू हो चुका है। लखनऊ मंडल में सभी जिलों के जिलाध्यक्षों को कमेटी का हिस्सा बनाया गया है। प्रदेशभर में मंडलवार घोषणा के निर्देश कोआर्डिनेटरों को दिए गए हैं। बसपा अध्यक्ष का मानना है कि ये रणनीति हर घर तक उनकी पहुंच बनाएगी।
भाईचारा कमेटियां मायावती का पासा या मजबूरी?
सन् 2007 में भाईचारा कमेटियों के दम पर बीएसपी चीफ ने अपने बूते सत्ता हासिल की थी। तब बसपा को 30.43% वोट और 206 सीटें मिली थीं। मगर 2012 की हार के बाद उन्होंने इन कमेटियों से दूरी बना ली थी और इस उन्होंने हार का जिम्मेदार ठहराया था। नतीजा ये हुआ कि 2017 में वोट शेयर घटकर 22.23% और 2022 में महज 12.08% रह गया, जब पार्टी सिर्फ एक सीट जीत पाई। ये बसपा का अब तक का सबसे खराब प्रदर्शन था।
अब बीएसपी चीफ को अपनी गलती का एहसास हुआ है। भाईचारा कमेटियों के जरिए वह फिर से सोशल इंजीनियरिंग की राह पर चल पड़ी हैं। पहले चरण में दलित, पिछड़े और मुस्लिमों को जोड़ा गया है, जबकि ब्राह्मणों को बाद में शामिल करने की योजना है। पार्टी का लक्ष्य 2027 तक अपने खिसके वोट बैंक को वापस लाना है। मगर क्या ये पुराना फॉर्मूला अब काम करेगा, जब सपा और भाजपा भी इसी राह पर चल रही हैं?
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