
Up Kiran, Digital Desk: हमारा समाज इतना जटिल है कि एक बार कोई आरोप लग जाए, खासकर महिलाओं पर, तो उसे मिटाना ज़िंदगी की सबसे बड़ी जंग बन जाता है। साल 2001 में एक 'दहेज उत्पीड़न' का मामला दर्ज हुआ, जिसमें एक माँ पर भी अपनी बहू को परेशान करने का आरोप लगा। ये सिर्फ़ एक आरोप नहीं था, बल्कि 24 साल का वो संघर्ष था, जो इस महिला ने लगातार लड़ा। अब, जाकर सुप्रीम कोर्ट ने इस सास को बरी कर दिया है, लेकिन उसके साथ एक बहुत मार्मिक टिप्पणी भी की है, जिसने पूरे मामले पर नई रौशनी डाली है।
क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने? "बात हवा से भी तेज़ फैलती है
इस 24 साल पुराने मामले में लंबी सुनवाई और ढेर सारे कानूनी दांवपेच के बाद, सुप्रीम कोर्ट ने जब सास को निर्दोष पाया, तो उन्होंने एक बहुत ही गहरी बात कही। कोर्ट ने कहा, "बात हवा से भी तेज़ फैलती है।"
दहेज के आरोप बहुत तेज़ी से समाज में फैल जाते हैं और किसी भी महिला, खासकर परिवार के बुज़ुर्ग सदस्यों (जैसे सास) की इज़्ज़त और प्रतिष्ठा को बुरी तरह प्रभावित करते हैं, चाहे बाद में वो बेकसूर साबित हो जाएँ। अक्सर ऐसे मामलों में सिर्फ़ नाम जोड़ने से भी सालों तक कोर्ट-कचहरी और सामाजिक लांछन झेलना पड़ता है।
झूठे आरोपों की सज़ा कौन भरेगा:दहेज विरोधी कानून महिलाओं की सुरक्षा के लिए एक बहुत ही महत्वपूर्ण हथियार है, लेकिन कभी-कभी इसके दुरुपयोग के भी आरोप लगते हैं, जहाँ बिना पुख्ता सबूत के भी परिवार के हर सदस्य को फंसा दिया जाता है। इस मामले में भी 24 साल तक एक सास पर यह दाग लगा रहा। उसकी उम्र, मानसिक शांति और सामाजिक जीवन पर इसका कितना गहरा असर पड़ा होगा, इसकी कल्पना करना भी मुश्किल है।
सुप्रीम कोर्ट का यह फ़ैसला उन सभी के लिए एक बड़ी सीख है जो ऐसे संवेदनशील मामलों में बिना जांचे-परखे किसी को भी दोषी मान लेते हैं। यह फैसला दिखाता है कि हमारे न्यायिक सिस्टम में 'जब तक दोषी साबित न हो, तब तक निर्दोष है' का सिद्धांत कितना अहम है। यह 24 साल बाद मिला न्याय उस सास के लिए शायद सुकून लेकर आया होगा, लेकिन उन सालों का दर्द मिटा पाना अब भी नामुमकिन होगा।
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