आज हम आपको एक ऐसी जगह लेकर चलते हैं जहां आस्था, परंपरा और रिश्ते देशों की सीमाओं से भी बड़े हो जाते हैं। यह कहानी है बिहार के सीतामढ़ी जिले की, जो नेपाल की सीमा से सटा हुआ है। यहां एक छोटी सी नदी है, जिसका नाम है झिम नदी। यह नदी भले ही छोटी हो, लेकिन छठ के महापर्व पर यहां जो नजारा देखने को मिलता है, वो दिल को छू लेता है।
एक नदी, दो देश, और एक अटूट विश्वास
छठ का पर्व केवल एक त्योहार नहीं है, बल्कि यह प्रकृति और सूर्य की उपासना का एक महान प्रतीक है। जब झिम नदी के किनारे छठ मनाया जाता है, तो यह सिर्फ एक पूजा नहीं रहती, बल्कि भारत और नेपाल के बीच की सांस्कृतिक एकता का एक जीवंत उदाहरण बन जाती है।
नदी के एक किनारे पर भारत के गांवों की महिलाएं होती हैं, तो दूसरे किनारे पर नेपाल की। लेकिन जब वे घुटने तक पानी में उतरकर एक साथ डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य देती हैं, तो उस समय कोई सरहद, कोई दीवार, कोई अलग देश नहीं होता। होती है तो सिर्फ छठी मइया में अटूट आस्था और एक-दूसरे के प्रति सम्मान।
यह नजारा सालों से चला आ रहा है। दोनों देशों की व्रती महिलाएं एक साथ पूजा करती हैं, प्रसाद बांटती हैं और एक-दूसरे के लिए मंगल कामना करती हैं। यह दृश्य दिखाता है कि भले ही नक्शे पर लकीरें खिंच गई हों, लेकिन दिलों के रिश्ते और आस्था के धागे इतने मजबूत हैं कि उन्हें कोई सरहद अलग नहीं कर सकती। यह सिर्फ एक पूजा नहीं, बल्कि "बेटी-रोटी" के उस गहरे संबंध का प्रतीक है जो भारत और नेपाल सदियों से साझा करते आए हैं।




