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Up kiran,Digital Desk : दिल्ली-एनसीआर की दमघोंटू हवा और बिगड़ते ट्रैफिक हालात के बीच शहरी परिवहन को लेकर एक नई उम्मीद जगी है। इको-फ्रेंडली शहरी यातायात प्रणाली को बढ़ावा देने से जुड़ी बजटीय घोषणाओं को विशेषज्ञ राजधानी की हवा के लिए ‘ऑक्सीजन’ मान रहे हैं। उनका कहना है कि ग्रीन लास्ट माइल कनेक्टिविटी न सिर्फ सफर को आसान बनाएगी, बल्कि निजी वाहनों पर निर्भरता घटाकर वायु प्रदूषण में भी कमी लाएगी।

सड़क परिवहन से बढ़ता प्रदूषण, चिंता की बड़ी वजह
विशेषज्ञों के मुताबिक दिल्ली में पीएम 2.5 प्रदूषण का करीब 35 से 40 प्रतिशत हिस्सा सड़क परिवहन से आता है। पीक ऑवर्स में यह आंकड़ा और बढ़ जाता है। हालात इसलिए भी गंभीर हैं क्योंकि बीते सात वर्षों में 2025 में सबसे ज्यादा करीब 8.25 लाख निजी वाहनों का पंजीकरण हुआ। बढ़ते वाहनों के कारण ट्रैफिक जाम के साथ-साथ हवा की गुणवत्ता पर भी सीधा असर पड़ रहा है।

नीतिगत बदलाव से बदलेगी लास्ट माइल की तस्वीर
बजट में पर्यावरणीय रूप से सतत यात्री परिवहन प्रणालियों पर दिए गए जोर को विशेषज्ञ इसी पृष्ठभूमि में अहम मान रहे हैं। उनका कहना है कि अब शहरी यातायात का दबाव सिर्फ मेट्रो या रैपिड रेल तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि लास्ट माइल कनेक्टिविटी को भी हरित साधनों की ओर मोड़ा जाएगा। इससे घर से स्टेशन और स्टेशन से गंतव्य तक का सफर ज्यादा सुविधाजनक और पर्यावरण के अनुकूल हो सकेगा।

सिर्फ ई-वाहन नहीं, पूरा इकोसिस्टम जरूरी
विशेषज्ञ साफ तौर पर कहते हैं कि लास्ट माइल कनेक्टिविटी को ग्रीन बनाने का मतलब केवल इलेक्ट्रिक वाहनों की संख्या बढ़ाना नहीं है। इसके लिए समर्पित लेन, पर्याप्त चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर, सुरक्षित पैदल मार्ग, साइकिल ट्रैक और साझा परिवहन मॉडल का मजबूत नेटवर्क भी जरूरी होगा। दिल्ली जैसे घनी आबादी वाले शहर में यह समग्र व्यवस्था ही टिकाऊ समाधान दे सकती है।

मेट्रो यात्रियों की निजी वाहन पर निर्भरता घटाने की चुनौती
करीब 50 से 60 प्रतिशत मेट्रो यात्री स्टेशन तक पहुंचने या वहां से अपने गंतव्य तक जाने के लिए निजी वाहन का इस्तेमाल करते हैं। रोजाना 55 से 60 लाख यात्रियों के हिसाब से यह संख्या लाखों वाहनों में बदल जाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मेट्रो, बस और रीजनल रेल को ई-रिक्शा, ई-ऑटो, ई-बस और पैदल-अनुकूल ढांचे से व्यवस्थित रूप से जोड़ा जाए, तो बड़ी संख्या में निजी वाहन सड़कों से हटाए जा सकते हैं।

ट्रैफिक और हवा, दोनों पर दिखेगा असर
नीतिगत बदलावों के जरिए ग्रीन लास्ट माइल कनेक्टिविटी को बढ़ावा मिलने से दिल्ली-एनसीआर में ट्रैफिक दबाव कम होने और वायु गुणवत्ता में सुधार की उम्मीद है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर यात्रियों का एक हिस्सा भी हरित साधनों की ओर शिफ्ट होता है, तो इसका असर साफ तौर पर सड़कों और हवा दोनों में नजर आएगा।