नवरात्रि खत्म होने के बाद कलश के जौ का क्या करें; भूलकर भी न करें ये गलती, जानें सही नियम व उपाय
शारदीय हो या चैत्र नवरात्रि, पहले दिन घटस्थापना के साथ बोए जाने वाले जौ यानी जवारे को मां भगवती की साक्षात कृपा और सुख-समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। नौ दिनों की अखंड उपासना में हरे-भरे, सीधे और घने उगे हुए जौ आने वाले समय में धन लाभ और जीवन में संपन्नता का शुभ संकेत देते हैं, जबकि इनका पीला, काला या मुरझाया रहना आर्थिक बाधाओं की पूर्व चेतावनी माना जाता है। व्रत के समापन पर दशमी तिथि के दिन अक्सर श्रद्धालु इस उलझन में पड़ जाते हैं कि पूजन के बाद इन पवित्र जौ का सही उपयोग और विसर्जन कैसे किया जाए, ताकि देवी का आशीर्वाद घर में बना रहे और किसी तरह का दोष भी न लगे।
दशमी के दिन मां दुर्गा की विधिवत पूजा और क्षमा याचना के बाद जवारे को श्रद्धापूर्वक उठाया जाता है। सबसे उत्तम तरीका यह है कि परिवार के कल्याण की प्रार्थना करते हुए इसे किसी पवित्र नदी, नहर या साफ जलाशय के बहते जल में विसर्जित कर दें। यदि आसपास कोई नदी उपलब्ध न हो, तो इसे पीपल, बरगद या शमी जैसे पूज्य वृक्षों की जड़ के पास रख सकते हैं या फिर घर के किसी बड़े पौधे या गमले की साफ मिट्टी में मिला दें, जहां यह प्राकृतिक रूप से समाहित हो जाए।
शास्त्रों और लोक मान्यताओं में जौ के कुछ आसान उपायों से घर में बरकत बनाए रखने की भी बात कही गई है। जवारे में से सबसे सुंदर और हरी-भरी पत्तियों को चुनकर लाल कपड़े में लपेटकर अपनी तिजोरी या धन के स्थान पर रखने से बरकत बनी रहती है। इसके अलावा कुछ पत्तियों को कलावा या मौली से बांधकर घर के मुख्य प्रवेश द्वार पर लगाने से नकारात्मक ऊर्जा दूर रहती है और सकारात्मकता का संचार होता है। देश के कई हिस्सों में दशमी पर परिवार के पुरुष और बच्चे आरोग्य, सौभाग्य और आर्थिक उन्नति की कामना के साथ जौ के तिनके अपने कान के पीछे धारण करते हैं।
जौ को माता का साक्षात प्रसाद माना जाता है, इसलिए इसे कभी भी कूड़ेदान में या पैरों में आने वाली जगह पर नहीं फेंकना चाहिए। इसे हमेशा पवित्र जल, देव वृक्ष की छांव या बगीचे की साफ मिट्टी में ही विसर्जित करना श्रेयस्कर होता है।