basant panchami 2021: ऋतुराज वसंत-हिन्दी साहित्य, जानें तुलसीदास-कवियों ने क्या लिखा

बसंत ऋतु को ऋतुराज और मधुमास भी जाता रहा है। इस ऋतु में कुहरा खत्म हो जाता है। ठंड विदा हो जाती है। आसमान निर्मल और स्वच्छ हो जाता है।

basant panchami 2021: बसंत ऋतु को ऋतुराज और मधुमास भी जाता रहा है। इस ऋतु में कुहरा खत्म हो जाता है। ठंड विदा हो जाती है। आसमान निर्मल और स्वच्छ हो जाता है। नदी, सरोवर, तालाब का जल अपनी छवि से मन को आकर्षित करते हैं।पेड़ों में नई-नई कोपलें फूटती है। महुए की गंध से वन महक जाते हैं।

Basant Panchami 1

सरसों, जौ, आलू, गेहूँ, चना, मटर, तीसी की फ़सल तैयार होने को होती हैं। कोयल और पपीहा अमराइयों से मस्त मधुर गान करते हैं। मधुऋतु के इस सुरम्य प्राकृतिक सुषमा और संपन्न वातावरण को कवियों ने अपनी लेखनी के माध्यम से उसके विविध रूपों में स्थापित करने का प्रयास किया है। आदि कवि वाल्मीकि हों, महाकवि कालिदास हों या फिर महाकवि निराला, सभी ने मदमस्त होकर बसंत के गीत गाये हैं। (basant panchami 2021)

कवि विद्यापति ने वसंत ऋतु का मनोहर चित्रण प्रस्तुत करते हुए लिखा है

नव बृंदवन नव-नव तरुगण,
नव-नव विकसित फूल।
नवल वसंत नवल मलयानिल,
मातल नव अलिकूल॥
बिहराई नवल किशोर। (basant panchami 2021)

इसी तरह कवि मलिक मुहम्मद जायसी ने अपने नागमति वियोग खंड के ‘बारहमासा’ में बसंत ऋतु का वर्णन करते हुए कहा है –

चैत वसंता होइ धमारी। मांहि लेखे संसार उजारी॥
पंचम विरह पंच सर मारे। रकत रोइ सगरौं बन ढारै॥
बौरे आम फरै अब लागैं। अबहूँ आउ घर, कंत सभागे॥
सहस भाव फूली वनस्पति। मधुकर घूमहूँ संवरि मालती॥
मो कहं फूल भये सब कांटे। दिष्टि परस जस लागहि चांटे॥
फिर जोबन भए नारंग साखा। सुआ विरह अब जाइ न राखा॥ (basant panchami 2021)

इसी तरह गोस्वामी तुलसीदास ने नारद मोह प्रसंग में बसंत का वर्णन करते हुए कहा है –

तेहि आस्रमहिं मदन जब गयऊ। निज माया वसंत निरमऊ।
कुसुमित विविध विटप बहुरंगा। कुजहिं कोकिल गुंजहिं भ्रंगा॥

इसी तरह रीतिकाल के प्रमुख घनानंद ने बसंत का वर्णन करते हुए लिखा है –

घुमड़ि पराग लता तस भोये, मधुरित सौरभ सौज संभोये।
बन वसंत बरनत मन फूल्यौ। लता-लता झूलनि संग झल्यौ। (basant panchami 2021)

वसंत का बड़ा ही सुंदर वर्णन करते हुए पद्माकर ने लिखा है (basant panchami 2021)-

कूलन में कोलि में कछारन में कुंजन में
क्यारिन में कलित कलीन किलकंत है
कहैं पद्माकर परागन में पौनहू में
पातन में पिक में पलासन पंगत है।

छायावाद के प्रवर्तक कवि जयशंकर प्रसाद ने ‘वसंत’ शीर्षक कविता में लिखा है (basant panchami 2021)-

युवती धरा यह था वसंत-काल,
हरे भरे स्तनों पर पड़ी कलियों की माल,
सौरभ से दिक्कुमारियों का मन सींच कर
बहता है पवन प्रसन्न तन खींच कर।
पृथ्वी स्वर्ग से ज्यों कर रही होड़ निष्काम (basant panchami 2021)

प्रकृति के सुकुमार कवि सुमित्रानंदन पंत ने कोयल के माध्यम से बसंत के आगमन के संकेत का वर्णन करते हुए लिखा है (basant panchami 2021)-

काली कोकिल, सुलगा उर में स्वरमायी वेदना का अंगार,
आया वसंत घोषित दिगन्त कहती, भर पावक की पुकार।

इसी तरह महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ ने बसंत का वर्णन करते हुए लिखा है –

अभी अभी ही तो आया है
मेरे जीवन में मृदुल वसंत
अभी न होगा मेरा अंत। (basant panchami 2021)

कवि केदाननाथ अग्रवाल ने ‘बसंती हवा’ शीर्षक कविता में कहा है (basant panchami 2021)-

हवा हूँ हवा, मैं वसंती हवा हूं।
वहीं हां, वही जो युगों से गगन को
बिना कष्ट श्रम के सम्हाले हुए हूं
हवा हूँ, हवा, मैं वसंती हवा हूं।
वहीं हाँ, वही जो धरा का वसंती,
सुसंगीत मीठा गुँजाती फिरी हूं
हवा हूँ, हवा, मैं वसंती हवा हूँ।

इस प्रकार प्रकृति में होने वाले श्रृंगारिक परिवर्तनों ने कवियों को ऋतुराज के प्रति आकर्षित किया है। हर भाषा के कवि ने बसंत की छटा का अपनी तरह से वर्णन किया है। आज के कवि भी मदमस्त होकर बसंत के गीत गा रहे हैं। (basant panchami 2021)

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