बिहार के बाद अब यूपी में नीतीश मॉडल की गूंज! मंत्री निशांत कुमार ने काशी से फूंका चुनावी बिगुल
बिहार की सियासत से निकलकर जनता दल यूनाइटेड (JDU) ने अब देश के सबसे बड़े सियासी सूबे उत्तर प्रदेश में अपने पांव पसारने की ठोस रणनीति तैयार कर ली है। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बेटे और राज्य के मौजूदा स्वास्थ्य मंत्री निशांत कुमार ने वाराणसी की धरती से बड़ा राजनीतिक शंखनाद करते हुए साफ कर दिया है कि उनकी पार्टी साल 2027 में होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के बैनर तले पूरी मजबूती से ताल ठोकेगी। निशांत कुमार ने दो टूक शब्दों में स्पष्ट किया कि उत्तर प्रदेश में जेडीयू किसी तरह के सियासी टकराव या प्रतिस्पर्धा के बजाय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के 'विकास मॉडल' को मजबूती देने और अपने पिता के दो दशक लंबे 'बिहार सुशासन व मद्यनिषेध मॉडल' को राज्य के घर-घर तक पहुंचाने का काम करेगी।
वाराणसी दौरे के दौरान पार्टी पदाधिकारियों, कार्यकर्ताओं और मीडिया से रूबरू होते हुए बिहार के स्वास्थ्य मंत्री ने पार्टी के विजन को सामने रखा। उन्होंने कहा कि जेडीयू का संगठनात्मक ढांचा देश के कई राज्यों में पहले से सक्रिय रहा है और इस दौरे का मुख्य मकसद यूपी में कैडर को धार देना व पार्टी का विस्तार करना है। आगामी 2027 के महासमर को देखते हुए पार्टी पूरी शिद्दत से चुनावी मैदान में उतरने का खाका खींच रही है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ किसी भी तरह के मुकाबले की अटकलों को सिरे से खारिज करते हुए निशांत कुमार ने कहा कि योगी आदित्यनाथ प्रदेश में विकास की रफ्तार को तेजी से आगे बढ़ा रहे हैं, लिहाजा जेडीयू उनके नेतृत्व में मजबूती से साथ खड़ी होकर चुनाव लड़ेगी ताकि विकास की यह धारा हर तबके तक पहुंच सके।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, जेडीयू का यह दांव खासकर पूर्वांचल के चुनावी गणित को गहराई से प्रभावित कर सकता है। धर्मनगरी वाराणसी से मिशन का आगाज कर पार्टी पूर्वांचल की कुर्मी, अति-पिछड़ी (EBC) जातियों और महिला मतदाताओं के बीच नीतीश कुमार की 'शराबबंदी और महिला सशक्तिकरण' की छवि को भुनाने की जुगत में है। भले ही जेडीयू का मुख्य संगठनात्मक आधार बिहार में केंद्रित हो, लेकिन पूर्वांचल और अवध के चुनिंदा जातीय पॉकेट्स में पार्टी की थोड़ी सी भी सक्रियता विपक्षी समाजवादी पार्टी और कांग्रेस गठबंधन के लिए तगड़ी चुनौती खड़ी कर सकती है। सपा-कांग्रेस के लिए असल खतरा जेडीयू की अपनी जीत से ज्यादा उन निर्णायक वोटों के बंटने का है, जो कड़े मुकाबले वाली सीटों पर जीत-हार का अंतर तय करते हैं।
हालांकि, उत्तर प्रदेश में जेडीयू का चुनावी इतिहास काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा है। चुनावी आंकड़ों पर नजर डालें तो साल 2002 में जेडीयू ने भाजपा गठबंधन के तहत 16 सीटों पर किस्मत आजमाई थी और 2 सीटों पर विजय हासिल की थी। इसके बाद 2007 में पार्टी 16 सीटों पर लड़कर केवल 1 सीट ही जीत सकी। साल 2012 के विधानसभा चुनाव में जेडीयू ने अकेले दम पर 219 प्रत्याशी मैदान में उतारे थे, लेकिन खाता तक नहीं खुला और वोट शेयर महज 0.36 फीसदी पर सिमट गया। वर्ष 2017 में पार्टी ने चुनाव से दूरी बनाई, जबकि 2022 में 27 प्रत्याशी उतारने के बावजूद कोई सीट हासिल नहीं हो पाई। अब सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यह है कि एनडीए गठबंधन में बीजेपी के साथ सीट शेयरिंग की मेज पर जेडीयू को पूर्वांचल की कितनी और कौन-सी सीटें मिल पाती हैं।