क्या बिहार की राजनीति में तीसरी ताकत बनने की राह पर प्रशांत किशोर की जन सुराज?
बिहार की राजनीति पिछले तीन दशकों से मुख्य रूप से दो प्रमुख धड़ों—एक तरफ राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के नेतृत्व वाला महागठबंधन और दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी (BJP) व जनता दल यूनाइटेड (JDU) के नेतृत्व वाला राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA)—के इर्द-गिर्द घूमती रही है। हालांकि, चुनावी रणनीतिकार से राजनेता बने प्रशांत किशोर (Prashant Kishor) की अगुआई में 'जन सुराज' (Jan Suraaj) के आगमन ने राज्य के पारंपरिक राजनीतिक ढर्रे में एक बड़ा और अभूतपूर्व हलचल पैदा कर दिया है। गांधीवादी विचारों, शिक्षा, रोजगार और जमीनी व्यवस्था परिवर्तन के नारे के साथ उभरी जन सुराज यात्रा ने बिहार के हर छोटे-बड़े गांव और कस्बे तक अपनी मजबूत पहुंच बना ली है। अब देश और प्रदेश के बड़े-बड़े राजनीतिक विश्लेषक, पत्रकार और आम जनता यह सवाल पूछने पर मजबूर हैं कि क्या प्रशांत किशोर बिहार की सुलगती सियासत में लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार के मजबूत वर्चस्व को ध्वस्त कर एक विकल्पहीन जनता को तीसरी ताकत का सशक्त मंच प्रदान करने में पूरी तरह सफल हो पाएंगे या नहीं।
'पदयात्रा' से लेकर दल के गठन तक: प्रशांत किशोर की अनूठी रणनीति और जमीनी स्तर पर जनता से सीधा संवाद
प्रशांत किशोर की राजनीतिक कार्यशैली पारंपरिक नेताओं की रैलियों और भाषणबाज़ियों से बिल्कुल अलग और अनूठी मानी जा रही है। उन्होंने किसी बड़ी राजनीतिक पार्टी के साथ गठबंधन करने या केवल चुनावी मौसम में जनता के बीच जाने के बजाय बिहार की मिट्टी को करीब से समझने के लिए हजारों किलोमीटर की पदयात्रा (Padyatra) का कठिन रास्ता चुना। पश्चिमी चंपारण से शुरू हुई यह यात्रा राज्य के लगभग सभी जिलों, पंचायतों और दूर-दराज के गांवों से होकर गुजर चुकी है। इस दौरान प्रशांत किशोर ने न केवल स्थानीय लोगों की बुनियादी समस्याओं, जैसे कि रोजगार के लिए मजबूरन होने वाला पलायन, चरमराती शिक्षा व्यवस्था, स्वास्थ्य सुविधाओं की बदहाली और जमीनी स्तर पर फैले भ्रष्टाचार को बहुत गहराई से समझा, बल्कि लोगों को यह एहसास भी कराया कि वे अपने बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए जाति और धर्म से ऊपर उठकर मतदान करें। इस सीधे संवाद ने जन सुराज को एक साधारण अभियान से बढ़ाकर एक मजबूत जन-आंदोलन के रूप में तब्दील कर दिया है।
जातिगत समीकरणों से परे 'काम और शिक्षा' की राजनीति का नया मॉडल: क्या बिहार की जनता अपनाएगी यह बदलाव?
बिहार का चुनावी इतिहास हमेशा से जातिगत निष्ठाओं और सामाजिक समीकरणों के इर्द-गिर्द बुना जाता रहा है। चाहे मंडल आयोग के बाद की राजनीति हो या फिर सामाजिक न्याय के नाम पर बने वोट बैंक, सभी राजनीतिक दलों ने हमेशा जातीय गुणा-गणित के आधार पर ही अपनी सत्ता की गोटियां सेट की हैं। इसके ठीक विपरीत, प्रशांत किशोर और उनकी पार्टी जन सुराज ने खुले तौर पर यह दावा किया है कि वे बिहार के विकास, स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन, विश्वस्तरीय शिक्षा व्यवस्था की बहाली और पारदर्शी शासन को ही अपना मुख्य चुनावी मुद्दा बनाएंगे। वे अक्सर अपनी जनसभाओं में आंकड़े पेश करते हुए यह सवाल उठाते हैं कि आजादी के इतने दशकों बाद भी बिहार आर्थिक और सामाजिक मानकों पर देश का सबसे पिछड़ा राज्य क्यों बना हुआ है। हालांकि, बिहार के जटिल सामाजिक ताने-बाने को देखते हुए यह देखना बेहद दिलचस्प और चुनौतीपूर्ण होगा कि क्या मतदाता अपनी दशकों पुरानी जातीय सीमाओं को लांघकर इस नए और प्रगतिशील विकास मॉडल पर भरोसा जताते हैं या नहीं।
एनडीए और महागठबंधन की बढ़ी चिंता, दोनों प्रमुख गठबंधनों के वोट बैंक में सेंधमारी की भारी आशंका
जन सुराज के राजनीतिक दल के रूप में औपचारिक गठन और हर एक सीट पर मजबूती से चुनाव लड़ने के ऐलान ने एनडीए और महागठबंधन दोनों ही खेमों की नींद उड़ा दी है। जहां एक तरफ भाजपा और जेडीयू का मानना है कि प्रशांत किशोर का अभियान केवल एक मीडिया स्टंट है और धरातल पर उनका कोई संगठनात्मक ढांचा मौजूद नहीं है, वहीं दूसरी तरफ राजद और उसके सहयोगी दल जन सुराज को बीजेपी की 'बी-टीम' बताकर खारिज करने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन जमीनी हकीकत यह इशारा करती है कि जन सुराज समाज के उस विशाल न्यूट्रल वर्ग, शिक्षित युवाओं, महिलाओं और पुरानी पार्टियों से निराश हो चुके मतदाताओं को अपनी तरफ तेजी से आकर्षित कर रहा है। यदि जन सुराज आगामी चुनाव में दोनों प्रमुख धड़ों के पारंपरिक वोट बैंक में थोड़ी सी भी सेंधमारी करने में कामयाब होता है, तो यह कई दिग्गजों का चुनावी समीकरण पूरी तरह से बिगाड़ सकता है और बिहार में किसी भी दल के लिए बहुमत पाना एक बड़ी चुनौती बन सकता है।
बिहार के राजनीतिक भविष्य का नया क्षितिज: क्या इतिहास रचेगी जन सुराज या बनी रहेगी एक विकल्प मात्र?
अगर हम बिहार के राजनीतिक इतिहास के पन्नों को पलटकर देखें, तो यहां पूर्व में भी कई तीसरी ताकतों ने दस्तक दी है, लेकिन समय के साथ वे या तो मुख्यधारा की बड़ी पार्टियों में विलीन हो गईं या फिर अप्रासंगिक होकर इतिहास के पन्नों में गुम हो गईं। हालांकि, प्रशांत किशोर का अनुभव, उनकी विशाल वित्तीय व रणनीतिक संसाधन क्षमता, मजबूत आईटी सेल और सबसे बढ़कर उनकी सुव्यवस्थित जमीनी व्यूह रचना उन्हें अतीत के अन्य प्रयोगों से बिल्कुल अलग खड़ा करती है। क्या बिहार की जागरूक जनता एक विकल्पहीन व्यवस्था से बाहर निकलकर जन सुराज को एक पूर्णकालिक और मजबूत तीसरी शक्ति के रूप में स्वीकार करेगी? इसका अंतिम फैसला तो आने वाले विधानसभा चुनाव के परिणाम ही तय करेंगे, लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं है कि प्रशांत किशोर की जन सुराज ने बिहार की सुस्त और पारंपरिक सियासत को एक नया मोड़, नई दिशा और एक नई वैचारिक बहस में जरूर धकेल दिया है, जिसका असर आने वाले कई दशकों तक देखने को मिलेगा।