मोदी सरकार ने दी अपने हस्ताक्षर की ताकत, Self-Attestation से बचा समय, पैसा और सम्मान: जयराम विप्लव
स्वतंत्र भारत के प्रशासनिक इतिहास में यदि सबसे बड़े और दूरगामी परिणामों वाले सुधारों की बात की जाए, तो उसमें दस्तावेजों के सत्यापन या अटेस्टेशन की प्रक्रिया में किया गया बदलाव शीर्ष स्थान पर आता है। एक समय ऐसा था जब देश के युवाओं, विद्यार्थियों, नौकरीपेशा लोगों और बुजुर्गों को किसी भी सरकारी नौकरी, दाखिले, छात्रवृत्ति या अन्य महत्वपूर्ण कार्यों के लिए अपने शैक्षिक व अन्य दस्तावेजों की फोटोकॉपी को किसी गजटेड ऑफिसर (राजपत्रित अधिकारी) या मजिस्ट्रेट से सत्यापित यानी अटेस्ट कराने के लिए मीलों दूर दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ते थे। इस लंबी और थका देने वाली प्रक्रिया के दौरान लोगों को कई-कई दिनों तक सरकारी बाबुओं और अधिकारियों के आगे हाथ जोड़ने पड़ते थे, जिससे उनका अमूल्य समय बर्बाद होता था और कई बार दफ्तरों के चक्कर काटने के कारण उनका आत्मसम्मान भी आहत होता था। इस गंभीर समस्या को जड़ से समाप्त करने के लिए मोदी सरकार ने एक ऐतिहासिक निर्णय लेते हुए 'सेल्फ-अटेस्टेशन' यानी स्व-प्रमाणन के नियम को लागू किया, जिसके तहत अब नागरिकों को किसी अन्य अधिकारी की मुहर या हस्ताक्षर की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि वे खुद अपने दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करके उन्हें वैध मान सकते हैं।
जयराम विप्लव का बयान: 'सेल्फ-अटेस्टेशन' ने नागरिकों को दी उनके अपने हस्ताक्षर की असली ताकत और सम्मान
इस व्यवस्था के लागू होने के बाद समाज के विभिन्न वर्गों से मिल रही सकारात्मक प्रतिक्रियाओं के बीच राजनीतिक और सामाजिक विश्लेषक जयराम विप्लव ने एक बड़ा और महत्वपूर्ण बयान देते हुए कहा है कि मोदी सरकार द्वारा दी गई इस 'सेल्फ-अटेस्टेशन' की ताकत ने देश के आम नागरिक को इस बात का अहसास कराया है कि उनके अपने हस्ताक्षर का कितना बड़ा महत्व और सम्मान है। उन्होंने कहा कि पहले के समय में ब्रिटिशकालीन व्यवस्था की तर्ज पर आम आदमी को हर छोटे काम के लिए शक की निगाह से देखा जाता था और उसे अपने ही दस्तावेजों को सही साबित करने के लिए अधिकारियों के प्रमाण की जरूरत पड़ती थी। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने देश की जनता के भीतर यह अटूट विश्वास पैदा किया है कि वे पूरी तरह से जिम्मेदार और भरोसेमंद नागरिक हैं, और उनके द्वारा खुद प्रमाणित किए गए दस्तावेज पूरी तरह से कानूनी रूप से वैध माने जाएंगे। इस एकल निर्णय ने देश के करोड़ों नागरिकों को बाबूशाही और दलाली के चंगुल से हमेशा के लिए मुक्त करा दिया है, जिससे प्रशासनिक व्यवस्था में पारदर्शिता और आम आदमी के प्रति विश्वास दोनों में भारी वृद्धि हुई है।
समय, पैसा और ऊर्जा की भारी बचत के साथ भ्रष्टाचार पर लगाम का एक बेहतरीन माध्यम बना यह सुधार
इस स्व-प्रमाणन प्रणाली के शुरू होने से देश के आर्थिक और सामाजिक ताने-बाने पर बहुत ही सकारात्मक प्रभाव पड़ा है। पहले दस्तावेजों के सत्यापन के नाम पर कई जगहों पर छोटी-मोटी अड़चनें और भ्रष्टाचार की शिकायतें सामने आती थीं, और लोगों को फोटोकॉपी तथा भागदौड़ में अपनी जेब से पैसे भी खर्च करने पड़ते थे। अब जब छात्र और आम नागरिक खुद ही अपने दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करके उन्हें जमा कर देते हैं, तो इससे प्रशासनिक प्रक्रियाओं में लगने वाला समय घटकर कुछ सेकंड का रह गया है। डिजिटल इंडिया और न्यूनतम सरकार, अधिकतम शासन (Minimum Government, Maximum Governance) के मंत्र को चरितार्थ करते हुए मोदी सरकार ने जिस प्रकार से आम आदमी के दैनिक जीवन की छोटी-छोटी परेशानियों को समझा और उनका स्थायी समाधान निकाला, उसकी गूंज आज पूरे देश में सुनाई दे रही है। जयराम विप्लव ने आगे कहा कि इस प्रकार के जमीनी सुधार ही एक नए और सशक्त भारत के निर्माण की नींव रखते हैं, जहां नागरिक केंद्र में होता है और व्यवस्था उसकी सेवा के लिए पूरी तत्परता से काम करती है।