UPI से दूर हो रहे लोग? चार्ज लगने से पहले ही कम होने लगा ट्रांजैक्शन, सितंबर में 1.8% गिरा यूपीआई पेमेंट से लेनेदेन
भारतीय डिजिटल पेमेंट इकोसिस्टम में यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस यानी यूपीआई ने पिछले कुछ वर्षों में जिस तेजी से अपनी जड़ें जमाई हैं, उसने पूरी दुनिया को हैरान कर दिया है। चाय के टप्पर से लेकर बड़े-बड़े मॉल और शोरूम तक, हर जगह पेमेंट के लिए केवल एक ही नाम जुबान पर होता है - यूपीआई। घर से बाहर निकलते समय जेब में बटुआ या कैश रखने की जरूरत को खत्म करने वाले इस क्रांतिकारी माध्यम ने देश के छोटे से छोटे व्यापारी और आम नागरिक के जीवन को बेहद आसान बना दिया है। यही वजह है कि भारत आज वैश्विक स्तर पर डिजिटल ट्रांजैक्शन के मामले में सिरमौर बन चुका है। लेकिन हाल ही में सामने आए ताजा आंकड़ों ने बैंकिंग सेक्टर और फिनटेक कंपनियों के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं। पहली बार यूपीआई के मासिक लेनदेन के ग्राफ में गिरावट दर्ज की गई है, जिसे लेकर देश भर में यह चर्चा शुरू हो गई है कि क्या भारतीय अब यूपीआई के इस्तेमाल से कतराने लगे हैं या इसके पीछे कोई और बड़ी वजह छिपी हुई है।
सितंबर महीने में 1.8 प्रतिशत गिरा यूपीआई पेमेंट, आंकड़ों ने चौंकाया
भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम यानी एनपीसीआई (NPCI) द्वारा जारी किए गए नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, सितंबर महीने में यूपीआई के जरिए होने वाले लेन-देन में पिछले महीनों की तुलना में लगभग 1.8 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। यह गिरावट भले ही प्रतिशत के लिहाज से छोटी लग रही हो, लेकिन अरबों-खरबों के ट्रांजैक्शन वॉल्यूम वाले इस बाजार में करोड़ों रुपयों और लेन-देन की संख्या में आई यह सुस्ती एक बहुत बड़ा बदलाव है। पिछले कई सालों से लगातार हर महीने यूपीआई ट्रांजैक्शन का ग्राफ ऊपर की ओर ही भाग रहा था, और हर नया महीना पिछले सारे रिकॉर्ड तोड़ रहा था। ऐसे में अचानक से इस वृद्धि दर में ब्रेक लगना और आंकड़ों का नीचे आना कई तरह के आर्थिक और व्यावहारिक सवाल खड़े करता है। वित्तीय विश्लेषकों और बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि यह कोई मामूली उतार-चढ़ाव नहीं है, बल्कि यह इस बात का संकेत है कि देश के उपभोक्ता अब डिजिटल लेन-देन को लेकर कुछ हद तक सतर्क या असहज होने लगे हैं।
क्या यूपीआई पर ट्रांजैक्शन चार्ज लगने की आशंका बन रही है मुख्य वजह?
आम जनता और उपभोक्ताओं के मन में पिछले कुछ समय से इस बात को लेकर गहरी आशंका बनी हुई है कि सरकार या फिनटेक कंपनियां जल्द ही यूपीआई पेमेंट पर कोई अतिरिक्त शुल्क यानी मर्चेंट डिस्काउंट रेट या ट्रांजैक्शन चार्ज लगा सकती हैं। हालांकि सरकार और एनपीसीआई की ओर से बार-बार यह स्पष्ट किया गया है कि यूपीआई सेवाएं वर्तमान में पूरी तरह से मुफ्त हैं और आगे भी रहेंगी, लेकिन बाजार में समय-समय पर उड़ने वाली अफवाहों और वॉलेट लोड करने तथा पीयर-टू-पीयर ट्रांसफर पर लगने वाले कुछ छुपे हुए शुल्कों ने आम आदमी के मन में डर पैदा कर दिया है। लोग अब छोटे-छोटे भुगतानों के लिए भी यह सोचने लगे हैं कि कहीं भविष्य में उन्हें इसके लिए जेब ढीली न करनी पड़े। इसके अलावा, कई थर्ड-पार्टी ऐप्स द्वारा कुछ खास श्रेणियों के लेन-देन पर सीमाएं तय करने या अतिरिक्त चार्ज जोड़ने की खबरों ने भी उपभोक्ताओं के उत्साह को थोड़ा कम किया है, जिसका सीधा असर सितंबर महीने के ट्रांजैक्शन डेटा पर साफ दिखाई दे रहा है।
सर्वर डाउन और तकनीकी गड़बड़ियों से भी बढ़ रही है उपभोक्ताओं की परेशानी
चार्ज लगने के डर के अलावा एक और बड़ी जमीनी वजह है जो लोगों को यूपीआई से थोड़ी दूरी बनाने पर मजबूर कर रही है, और वह है तकनीकी खामियां और सर्वर की सुस्ती। देश के कई हिस्सों में, खासकर ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में इंटरनेट कनेक्टिविटी की समस्या और बैंकों के सर्वर डाउन होने की स्थिति में यूपीआई पेमेंट अक्सर बीच में ही फेल हो जाते हैं। कई बार ग्राहक पैसे ट्रांसफर कर देता है, खाते से रकम कट जाती है लेकिन मर्चेंट के पास पैसा नहीं पहुंचता, जिससे दुकानदार और ग्राहक के बीच अनावश्यक विवाद की स्थिति पैदा हो जाती है। इस प्रकार की 'पेमेंट फेल्ड' और रिफंड मिलने में होने वाली देरी की समस्याओं से जूझते-जूझते अब आम उपभोक्ता कई बार सुरक्षित विकल्प के रूप में नकदी यानी कैश का इस्तेमाल करना ज्यादा बेहतर समझने लगे हैं। जब तक तकनीकी ढांचे को पूरी तरह से अचूक और निर्बाध नहीं बनाया जाता, तब तक इस तरह की छोटी-छोटी बाधाएं डिजिटल पेमेंट की रफ्तार को प्रभावित करती रहेंगी।
छोटे व्यापारियों और ग्राहकों के बीच कैश के प्रति फिर से बढ़ता रुझान
यह एक दिलचस्प विरोधाभास है कि जिस देश ने कैशलेस इकोनॉमी की तरफ सबसे तेज छलांग लगाई थी, वहां आज भी नकद पैसे का आकर्षण पूरी तरह से खत्म नहीं हुआ है। सितंबर महीने में आई इस 1.8 प्रतिशत की गिरावट के पीछे यह भी एक कारण माना जा रहा है कि लोग अब अपने दैनिक बजट को नियंत्रित करने के लिए फिर से कैश का इस्तेमाल करने लगे हैं। जब आप डिजिटल माध्यम से पैसे खर्च करते हैं, तो आपको यह अहसास नहीं होता कि आपके बैंक खाते से कितनी तेजी से पैसे निकल रहे हैं, जबकि हाथ में नकदी होने पर खर्च करने से पहले आदमी दो बार सोचता है। वित्तीय अनुशासन और अपने खर्चों पर लगाम लगाने के लिए कई मध्यमवर्गीय परिवार अब फिर से किराने की छोटी-मोटी खरीदारी के लिए कैश का उपयोग करने लगे हैं। इसके अलावा, हाल के महीनों में बढ़ते साइबर फ्रॉड और ऑनलाइन ठगी के मामलों ने भी लोगों के मन में एक प्रकार का मानसिक डर पैदा कर दिया है, जिसके चलते वे बहुत बड़े पैमाने पर ऑनलाइन ट्रांजैक्शन करने से हिचकिचाने लगे हैं।
फिनटेक कंपनियों और सरकार के लिए सबक, आगे क्या होगी रणनीति?
यूपीआई ट्रांजैक्शन में आई यह हल्की सी गिरावट भले ही अभी शुरुआती दौर की चेतावनी हो, लेकिन इसे हल्के में नहीं लिया जा सकता। सरकार, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और एनपीसीआई के लिए यह समय आत्ममंथन करने का है। उपभोक्ताओं के मन से चार्ज लगने के डर को पूरी तरह से मिटाने के लिए आधिकारिक स्तर पर कड़े और स्पष्ट आश्वासन बार-बार दिए जाने चाहिए। साथ ही, बैंकों के तकनीकी बुनियादी ढांचे को इतना मजबूत किया जाना चाहिए कि देश के सबसे दूरदराज के कोने में भी एक सेकंड के भीतर पेमेंट बिना किसी फेलियर के पूरा हो सके। साइबर सुरक्षा को और अधिक पुख्ता करना होगा ताकि डिजिटल ठगी के मामलों पर लगाम लग सके और आम नागरिक बिना किसी डर के बेझिझक यूपीआई का इस्तेमाल कर सकें। यदि समय रहते इन कमियों को दूर नहीं किया गया, तो यह छोटी सी गिरावट आने वाले समय में एक बड़े ट्रेंड में बदल सकती है, जो भारत के डिजिटल भविष्य के लिए ठीक नहीं होगा।