हीरो पर भारी पड़ी हीरोइनें, स्त्री-मुंज्या के बाद 'नई नवेली' ने दिखाया कमाल, फिल्मों की जान बन रहे महिला किरदार

हीरो पर भारी पड़ी हीरोइनें, स्त्री-मुंज्या के बाद 'नई नवेली' ने दिखाया कमाल, फिल्मों की जान बन रहे महिला किरदार

भारतीय सिनेमा जगत के इतिहास में एक ऐसा दिलचस्प और क्रांतिकारी दौर चल रहा है, जिसने दशकों पुरानी उस सोच को पूरी तरह से पलट कर रख दिया है जिसके तहत यह माना जाता था कि किसी भी फिल्म को बॉक्स ऑफिस पर सफलता दिलाने के लिए केवल किसी बड़े पुरुष सुपरस्टार या ‘हीरो’ का होना ही सबसे अनिवार्य शर्त है। पिछले कुछ वर्षों में बॉलीवुड और क्षेत्रीय सिनेमा के बॉक्स ऑफिस आंकड़ों और दर्शकों के मिजाज ने यह साबित कर दिया है कि अब पर्दे पर महिलाओं की भूमिका सिर्फ ग्लैमर फैलाने या गाने में नाचने तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि वे खुद कहानियों की मुख्य धुरी और प्राण बन चुकी हैं। 'स्त्री' (Stree) और 'मुंज्या' (Munjya) जैसी ब्लॉकबस्टर और सुपरनैचुरल हॉरर-कॉमेडी फिल्मों की अपार सफलता के बाद, अब हालिया रिलीज हुई फिल्म 'नई नवेली' ने भी बॉक्स ऑफिस पर ऐसा तड़का लगाया है कि बड़े-बड़े दिग्गज हीरो भी इन दमदार अभिनेत्रियों के आगे फीके नजर आने लगे हैं। दर्शकों ने अब पारंपरिक मसाला फिल्मों से आगे बढ़कर उन कहानियों को अपनाना शुरू कर दिया है जहां महिलाओं को मजबूत, स्वतंत्र और केंद्र में रखकर गढ़ा जाता है। यह बदलाव न केवल भारतीय सिनेमा की पटकथा और दिशा को बदल रहा है, बल्कि यह भी दिखा रहा है कि दर्शक अब कंटेंट की ताकत को सबसे ऊपर रखते हैं, चाहे वह पर्दे पर महिला प्रधान फिल्म ही क्यों न हो।

पारंपरिक पुरुष प्रधान सिनेमा का दौर पीछे छूटा, कंटेंट ड्रिवेन फिल्मों में छाईं अभिनेत्रियां

बीते दशकों में बॉलीवुड का पूरा ताना-बाना इस बात पर बुना जाता था कि फिल्म के पोस्टर पर किस अभिनेता का नाम सबसे बड़ा लिखा है और एक्शन तथा हीरोइज्म के सारे सीन किसके हिस्से में आएंगे। निर्देशकों और निर्माताओं का यह मानना था कि दर्शक केवल मार-धाड़, एक्शन और पुरुष कलाकारों को देखने के लिए ही सिनेमाघरों का रुख करते हैं। हालांकि, ओटीटी प्लेटफॉर्म्स के आने और दर्शकों की समझ में आए परिपक्व बदलाव के बाद इस पुरानी और घिसी-पिसी सोच को करारा झटका लगा है। आज के समय में दर्शक ऐसी कहानियां देखना चाहते हैं जो उनके दिल के करीब हों, जिनमें सामाजिक संदेश हो या फिर जो पूरी तरह से महिला किरदारों के इर्द-गिर्द घूमती हों। 'स्त्री' फिल्म ने जिस तरह से हॉरर और कॉमेडी के साथ-साथ एक मजबूत नारीवादी संदेश को बॉक्स ऑफिस पर सफलता के साथ जोड़ा, उसने फिल्म निर्माताओं को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि वे लीक से हटकर नए प्रयोग करें। यही वजह है कि आज महिला केंद्रित या महिला प्रधान किरदारों वाली फिल्मों को न केवल क्रिटिक्स की तारीफ मिल रही है, बल्कि वे सौ करोड़ और दो सौ करोड़ रुपए से ज्यादा का शानदार कारोबार भी कर रही हैं।

'स्त्री' और 'मुंज्या' की ऐतिहासिक सफलता ने खोली इंडस्ट्री की आंखें

हॉरर-कॉमेडी जॉनर में जब अमर कौशिक के निर्देशन में 'स्त्री' रिलीज हुई थी, तब शायद ही किसी ने यह कल्पना की होगी कि एक ऐसी भूतिया कहानी जिसमें महिला किरदार सबसे रहस्यमयी और शक्तिशाली है, वह बॉक्स ऑफिस के सारे रिकॉर्ड तोड़ देगी। इस फिल्म में मुख्य खलनायक या रहस्य एक ऐसी महिला आत्मा का था जो पुरुषों को सबक सिखाती थी, और श्रद्धा कपूर तथा फिल्म के अन्य महिला कलाकारों ने जिस प्रकार अपने अभिनय का लोहा मनवाया, उसने इतिहास रच दिया। इसी फॉर्मूले को आगे बढ़ाते हुए दिनेश विजान के कॉरपोरेट हाउस ने 'मुंज्या' जैसी अनूठी फिल्मों का निर्माण किया, जहां लोककथाओं और डरावने तत्वों के केंद्र में एक महिला पात्र या लोक देवता का ऐसा साया था जिसने पूरी फिल्म की बागडोर अपने हाथ में ले रखी थी। इन फिल्मों की सफलता ने यह साबित कर दिया कि यदि कहानी में दम हो और महिला किरदारों को कमजोर दिखाने के बजाय उन्हें बुद्धिमान, निडर और कहानी का असली ड्राइवर बनाया जाए, तो दर्शक सिनेमाघरों तक जरूर खिंचे चले आएंगे। इन ब्लॉकबस्टर फिल्मों ने बॉलीवुड के बॉक्स ऑफिस गणित को पूरी तरह से बदलकर रख दिया है और अभिनेत्रियों को फिल्म का मुख्य चेहरा बनाने का मार्ग प्रशस्त किया है।

'नई नवेली' के ताजा कमाल ने बॉक्स ऑफिस पर मचाया धमाल, महिला किरदारों का जलवा

इस सुनहरी कड़ी में अब एक नया और चमकता हुआ नाम 'नई नवेली' फिल्म का जुड़ चुका है, जिसने अपनी अनोखी कहानी और शानदार अभिनय के दम पर बॉक्स ऑफिस पर उम्मीद से कहीं ज्यादा बेहतरीन प्रदर्शन किया है। इस फिल्म में महिला किरदारों को जिस संवेदनशीलता, गहराई और मजबूत आत्मसम्मान के साथ गढ़ा गया है, उसने दर्शकों के दिलों को गहराई से छू लिया है। पारंपरिक रूप से नई नवेली दुल्हनों या महिलाओं को पारिवारिक और सामाजिक बंधनों में दबा हुआ दिखाने वाली पुरानी कहानियों के विपरीत, इस फिल्म की नायिकाएं अपनी परिस्थितियों से लड़ती हैं, फैसले खुद लेती हैं और अपनी जिंदगी की पटकथा खुद लिखती हैं। फिल्म के रिलीज होने के बाद से ही जिस तरह से सिनेमाघरों में माउथ पब्लिसिटी के जरिए भीड़ बढ़ रही है, उसने यह साबित कर दिया है कि दर्शक अब उन कहानियों को देखना पसंद करते हैं जो उनके इर्द-गिर्द की हकीकत को बयां करती हैं। 'नई नवेली' की इस सफलता ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि महिला किरदारों पर दांव लगाना अब किसी भी लिहाज से जोखिम भरा सौदा नहीं रहा, बल्कि यह सफलता की सबसे बड़ी गारंटी बन चुका है।

अभिनेत्रियों के कंधों पर टिकी सफलता और भारतीय सिनेमा का उज्ज्वल भविष्य

आज का दौर यह स्पष्ट रूप से रेखांकित करता है कि भारतीय सिनेमा अब जेंडर स्टीरियोटाइप्स से बहुत आगे निकल चुका है, जहां हीरो और हीरोइन की परिभाषा पूरी तरह से बदल चुकी है। अब दर्शक यह नहीं देखते कि फिल्म में मुख्य भूमिका निभाने वाला कलाकार पुरुष है या महिला, बल्कि वे यह देखते हैं कि कहानी कितनी प्रामाणिक है और अभिनय में कितनी दम है। दीपिका पादुकोण, आलिया भट्ट, नयनतारा, श्रद्धा कपूर जैसी अभिनेत्रियों से लेकर नई पीढ़ी की कई प्रतिभाशाली कलाकाराएं आज अपने दम पर फिल्मों को सौ करोड़ के क्लब में शामिल कराने का माद्दा रखती हैं। जब-जब फिल्में 'स्त्री', 'मुंज्या' और 'नई नवेली' जैसी कहानियों के साथ दर्शकों के सामने आती हैं, तब-तब यह विश्वास और अधिक मजबूत हो जाता है कि भारतीय सिनेमा की बागडोर अब सुरक्षित हाथों में है। आने वाले समय में यह ट्रेंड और अधिक तेजी से आगे बढ़ेगा, जहां महिला किरदारों को और अधिक सशक्त, विविधतापूर्ण और मुख्य भूमिकाओं में देखने का मौका मिलेगा, जो निश्चित रूप से हमारी फिल्म इंडस्ट्री को वैश्विक मंच पर एक नई और ऊंची पहचान दिलाएगा।