रावण दहन पर खास परंपरा, 40 फीट के रावण से लेकर ‘जय श्री राम’ के जयकारों तक…ऐसा था पूर्णिया का दशहरा
बिहार के सीमांचल क्षेत्र का दिल कहे जाने वाले पूर्णिया शहर में इस बार विजया दशमी का पर्व एक अनोखी और अलौकिक ऊर्जा के साथ मनाया गया, जिसने शहरवासियों के दिलों में एक गहरी अमिट छाप छोड़ दी है। रावण दहन की परंपरा वैसे तो पूरे देश में हर्षोल्लास के साथ संपन्न होती है, लेकिन पूर्णिया की इस भव्य और पारंपरिक पावन धरा पर होने वाले आयोजन की बात ही कुछ बेहद खास और निराली होती है। इस वर्ष भी बुराई पर अच्छाई की शाश्वत जीत का प्रतीक यह महापर्व बड़े ही उत्साह, भव्यता और अनुशासित तरीके से मनाया गया, जिसे देखने के लिए दूर-दराज के ग्रामीण इलाकों से लेकर शहरी कोनों तक से हजारों की संख्या में लोग उमड़ पड़े थे। इस विशेष उत्सव की रौनक देखते ही बनती थी और हर तरफ सिर्फ उत्सव का उल्लास तथा भक्तिमय माहौल ही स्पष्ट रूप से महसूस किया जा रहा था।
पूर्णिया के इस पारंपरिक और बहुप्रतीक्षित आयोजन का मुख्य आकर्षण लगभग 40 फीट ऊंचा विशालकाय और आकर्षक ढंग से तैयार किया गया रावण का पुतला था, जिसे कारीगरों ने कई दिनों की कड़ी मेहनत के बाद बेहद खूबसूरती से सजाया और संवारा था। जब गोधूली बेला के बाद धीरे-धीरे सांझ घिरने लगी और आकाश में अंधेरा छाने लगा, तब इस भव्य 40 फीट लंबे रावण के पुतले की बनावट और उसकी विशालता ने दर्शकों का मन मोह लिया। इस पुतले के निर्माण में रंगों और पारंपरिक साज-सज्जा का बहुत ही सुंदर और बारीकी से ध्यान रखा गया था, जो दूर से देखने पर ही अपनी भव्यता का अहसास करा रहा था। आयोजन स्थल पर बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी की निगाहें बस उसी विशालकाय पुतले पर टिकी हुई थीं और हर कोई उस ऐतिहासिक पल का गवाह बनने के लिए पूरी तरह से उत्सुक और बेताब दिखाई दे रहा था।
जैसे ही रावण वध और दहन का शुभ मुहूर्त नजदीक आया, पूरा मेला परिसर और आसमान को छूता हुआ मैदान 'जय श्री राम' के गगनभेदी और ऊर्जावान जयकारों से गूंज उठा। इन पावन जयकारों की गूंज ने पूरे वातावरण में एक अदभुत आध्यात्मिक और सकारात्मक ऊर्जा का संचार कर दिया, जिससे वहां मौजूद हर एक व्यक्ति का रोम-रोम श्रद्धा और उत्साह से भर गया। बच्चे, युवा और महिलाएं सभी एक स्वर में भगवान श्रीराम के जयकारे लगा रहे थे और पूरा माहौल पूरी तरह से राममय हो चुका था। इस सामूहिक जयघोष ने आपसी भाईचारे और सांस्कृतिक एकता की एक ऐसी मजबूत और सुंदर मिसाल पेश की, जो पूर्णिया की गौरवशाली परंपरा और सांस्कृतिक धरोहर का एक जीवंत और प्रेरणादायक प्रमाण साबित हुई।
इस भव्य आयोजन को देखने के लिए पूर्णिया के स्थानीय निवासियों के साथ-साथ आसपास के जिलों और सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों से भी भारी संख्या में दर्शकों ने शिरकत की, जिससे पूरे मेला क्षेत्र में अपार जनसैलाब उमड़ पड़ा। सुरक्षा और शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए स्थानीय प्रशासन और पूजा समिति के स्वयंसेवकों ने बेहद मुस्तैदी और सूझबूझ के साथ काम किया, ताकि किसी भी श्रद्धालु को असुविधा का सामना न करना पड़े। ट्रैफिक प्रबंधन से लेकर भीड़ नियंत्रण तक के सभी इंतजाम बेहद चाक-चौबंद रखे गए थे, जिससे पूरा उत्सव शांतिपूर्ण और अनुशासित तरीके से संपन्न हुआ। परिवारों के साथ आए लोगों ने मेले का भरपूर आनंद लिया और पारंपरिक खान-पान की स्टॉल्स तथा झूलों का भी जमकर लुत्फ उठाया, जिससे बच्चों के चेहरों पर एक अलग ही खुशी साफ झलक रही थी।
पूर्णिया में रावण दहन की यह खास परंपरा सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है, जो आधुनिकता के दौर में भी अपनी मौलिकता और पारंपरिक गरिमा को पूरी तरह से संजोए हुए है। यह पर्व केवल एक पुतले को आग के हवाले करने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह हमारे भीतर छिपी हुई बुराइयों, अहंकार, ईर्ष्या और नकारात्मकता का दहन करके एक नई सकारात्मक शुरुआत करने का संदेश देता है। शहर के बुद्धिजीवियों और गणमान्य नागरिकों का मानना है कि ऐसे आयोजन हमारी युवा पीढ़ी को हमारी समृद्ध संस्कृति, सनातन मूल्यों और आदर्शों से जोड़े रखने में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अंत में, जब वह 40 फीट ऊंचा रावण का पुतला धू-धू कर जलकर राख हुआ, तो उसने हर देखने वाले को यह संदेश दे दिया कि अंततः सत्य, धर्म और अच्छाई की ही हमेशा जीत होती है और असत्य का विनाश निश्चित है।