मां दुर्गा की विदाई पर काशी में खेली गई सिंदूर की होली, क्यों करते हैं ऐसा? चौंक जाओगे
धार्मिक और सांस्कृतिक नगरी काशी में हर पर्व को मनाने का अपना एक अलौकिक और अनूठा अंदाज होता है। शारदीय नवरात्रि के पावन पर्व के समापन और विजयादशमी के शुभ अवसर पर जहां पूरा देश मां दुर्गा की प्रतिमाओं का विसर्जन कर उन्हें नम आंखों से विदाई दे रहा था, वहीं वाराणसी के प्रमुख पूजा पंडालों और बंगाली बाहुल्य इलाकों में एक बेहद मनमोहक और ऐतिहासिक परंपरा निभाई गई। मां दुर्गा की विदाई के इस खास मौके पर सुहागिन महिलाओं ने पारंपरिक वेशभूषा में एक-दूसरे के साथ जमकर 'सिंदूर की होली' यानी 'सिंदूर खेला' का उत्सव मनाया। लाल-सफेद साड़ियों में सजी महिलाओं ने पहले मां भगवती के चरणों में सिंदूर अर्पित किया और फिर एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर अखंड सौभाग्य की कामना की। उत्सव के उल्लास और विदाई के भावुक पलों का यह अद्भुत संगम देखने के लिए काशी के घाटों और पंडालों में श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ पड़ा। लेकिन क्या आप जानते हैं कि मां की विदाई पर सिंदूर की होली खेलने की यह परंपरा आखिर क्यों शुरू हुई और इसके पीछे क्या पौराणिक कथा छिपी है? आइए विस्तार से जानते हैं इस अनोखी परंपरा का पूरा रहस्य।
काशी के पंडालों में छाया 'सिंदूर खेला' का खुमार, लाल रंगों से सराबोर हुईं सुहागिनें
वाराणसी के लक्सा, सोनारपुरा, बंगाली टोला, दुर्गाकुंड और पांडे हवेली स्थित प्राचीन दुर्गा पूजा पंडालों में विजयादशमी के दिन सुबह से ही एक अलग ही ऊर्जा और भक्तिमय माहौल देखने को मिला। ढोल-ढाक की ताल और शंख ध्वनि के बीच सैकड़ों की संख्या में जुटी सुहागिन महिलाओं ने सबसे पहले जगत जननी मां दुर्गा की महाआरती की। इसके बाद मां को पान का पत्ता, मिठाइयां और सिंदूर चढ़ाकर उनका पारंपरिक रूप से श्रृंगार किया गया। इसके तुरंत बाद ही पंडालों में सिंदूर की होली की शुरुआत हो गई। महिलाओं ने एक-दूसरे के गालों, माथे और मांग में चुटकी भर सिंदूर लगाकर पर्व की बधाई दी। इस दौरान पूरा माहौल 'आशेशे आबार एशे छे मां' (मां अगले वर्ष फिर आना) के जयकारों से गूंज उठा। एक ओर जहां मां को विदा करने का दर्द हर आंख में साफ झलक रहा था, वहीं दूसरी ओर सिंदूर खेला के जरिए इस पल को एक उत्सव की तरह मनाने का उत्साह देखते ही बन रहा था।
क्यों खेली जाती है मां दुर्गा की विदाई पर सिंदूर की होली? जानिए इसके पीछे का धार्मिक महत्व
हिंदू धर्म की मान्यताओं और प्राचीन बंगाली परंपरा के अनुसार, नवरात्रि के नौ दिनों में मां दुर्गा अपने बच्चों—श्री गणेश, भगवान कार्तिकेय, माता लक्ष्मी और देवी सरस्वती के साथ अपने मायके यानी पृथ्वी लोक पर आती हैं। दसवें दिन यानी विजयादशमी को मां के अपने ससुराल यानी कैलाश पर्वत पर भगवान शिव के पास लौटने का समय होता है। सनातन संस्कृति में बेटी की मायके से विदाई के समय उसका विशेष श्रृंगार करने और उसे खुशी-खुशी विदा करने का रिवाज है। इसी परंपरा के तहत सुहागिन महिलाएं मां दुर्गा को एक बेटी और देवी दोनों रूपों में मानकर उन्हें सिंदूर अर्पित करती हैं। माना जाता है कि मां दुर्गा को सिंदूर लगाने से देवी अत्यंत प्रसन्न होती हैं और अपने भक्तों को अखंड सौभाग्य, पति की लंबी उम्र और परिवार में सुख-शांति का आशीर्वाद देती हैं। यही वजह है कि सदियों से चली आ रही इस परंपरा को आज भी पूरे सम्मान और भक्ति के साथ निभाया जाता है।
#450 साल पुरानी है परंपरा, महिला सशक्तिकरण और सामाजिक सौहार्द का भी है प्रतीक
'सिंदूर खेला' की इस प्राचीन परंपरा का इतिहास लगभग 450 वर्ष पुराना बताया जाता है, जिसकी शुरुआत बंगाल के राजघरानों और जमींदार परिवारों से हुई थी। समय के साथ-साथ यह परंपरा देश-विदेश में बसे भारतीय समुदाय का अभिन्न अंग बन गई। धार्मिक पहलू के अलावा, सिंदूर खेला का सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व भी बेहद गहरा है। यह उत्सव महिलाओं के बीच आपसी प्रेम, सौहार्द और एकजुटता का संदेश देता है। बिना किसी ऊंच-नीच, जाति या वर्ग भेद के सभी महिलाएं एक साथ मिलकर सिंदूर की होली खेलती हैं। इस अवसर पर युवा नवविवाहितों से लेकर वयोवृद्ध महिलाएं तक एक-दूसरे के सुहाग की मंगलकामना करती हैं। काशी जैसी आध्यात्मिक नगरी में यह आयोजन न केवल धार्मिक निष्ठा को दर्शाता है, बल्कि हमारी समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर और नारी शक्ति के गौरव का भी सजीव प्रमाण पेश करता है।
नम आंखों से गंगा घाटों पर हुआ मां का विसर्जन, अगले बरस फिर आने की लगाई गुहार
सिंदूर खेला का भव्य उत्सव संपन्न होने के बाद, गाजे-बाजे और भक्ति गीतों के साथ मां दुर्गा की भव्य शोभायात्राएं निकाली गईं। वाराणसी के विभिन्न इलाकों से होती हुई ये शोभायात्राएं गंगा के दशाश्वमेध घाट, शिवाला घाट, सामने घाट और कृत्रिम कुंडों तक पहुंचीं। तटों पर मौजूद हजारों श्रद्धालुओं ने हर-हर महादेव और जय माता दी के उद्घोष के साथ मां दुर्गा की प्रतिमाओं का जल विसर्जन किया। विसर्जन के समय हर श्रद्धालु की आंखें नम थीं और हर दिल से यही प्रार्थना निकल रही थी कि मां दुर्गा हर घर में सुख-समृद्धि बरसाएं और अगले वर्ष फिर से अपने भक्तों के बीच पधारें। इस प्रकार सिंदूर की होली का यह पावन पर्व न केवल आंखों में आंसू छोड़ गया, बल्कि दिलों में अगले साल के उत्सव की एक नई उम्मीद और उमंग भी भर गया।