करवा चौथ पूजा दिन में होगी या शाम को? पहली बार रखना है व्रत तो जानें उपवास के नियम, पतियों के लिए भी खास बात

करवा चौथ पूजा दिन में होगी या शाम को? पहली बार रखना है व्रत तो जानें उपवास के नियम, पतियों के लिए भी खास बात

सनातन संस्कृति में करवा चौथ के व्रत का सुहागिनों के जीवन में एक अत्यंत पवित्र और भावनात्मक स्थान माना जाता है, जिसे लेकर देश भर की महिलाओं में भारी उत्साह और उल्लास देखने को मिलता है। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि पर रखे जाने वाले इस कठिन और पावन निर्जला व्रत में सुहागिन महिलाएं अपने जीवनसाथी की लंबी उम्र, अच्छी सेहत और उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना करती हैं। जो महिलाएं इस वर्ष जीवन में पहली बार करवा चौथ का व्रत रखने जा रही हैं, उनके मन में पूजा के सही समय, दिन के विधान और उपवास से जुड़े तमाम नियमों को लेकर कई प्रकार की जिज्ञासाएं और असमंजस की स्थिति बनी रहती है। अक्सर युवतियों के मन में यह मुख्य सवाल रहता है कि क्या करवा चौथ की मुख्य पूजा दिन के समय की जाती है या फिर शाम को चांद निकलने के बाद इसका विधान पूरा होता है, इसलिए आज हम आपको इस व्रत से जुड़ी हर एक बारीक और महत्वपूर्ण जानकारी विस्तार से बताने जा रहे हैं।

करवा चौथ की पूजा दिन में करें या शाम को, जानिए सही विधान

करवा चौथ के व्रत को लेकर यह बात सबसे पहले और स्पष्ट रूप से समझ लेनी आवश्यक है कि इस पूरे उपवास की मूल पूजा हमेशा प्रदोष काल यानी शाम के समय ही संपन्न की जाती है। दिनभर महिलाएं बिना जल और अन्न के उपवास रखती हैं, जिसमें सुबह के समय सरगी खाने की प्राचीन परंपरा निभाई जाती है। सरगी सूर्योदय से ठीक पहले खाई जाती है, जिसके बाद पूरा दिन महिलाएं अपनी सास या परिवार की बुजुर्ग महिलाओं द्वारा दिए गए आशीर्वाद और श्रृंगार की वस्तुओं के साथ बिताती हैं। दिन का समय भगवान शिव, माता पार्वती, कार्तिकेय, गणेश जी और करवा माता का मनन करने, भजन-कीर्तन करने तथा कथा सुनने में व्यतीत होता है। हालांकि मुख्य पूजा और अर्घ्य देने का मुख्य अनुष्ठान सूर्यास्त के बाद आकाश में चंद्रमा के उदय होने पर ही किया जाता है, जिसके बिना यह व्रत अधूरा माना जाता है।

पहली बार व्रत रखने वाली महिलाओं के लिए जरूरी और सख्त नियम

यदि आप इस साल अपने जीवन का पहला करवा चौथ का व्रत रखने जा रही हैं, तो आपके लिए कुछ विशेष नियमों का पालन करना बेहद जरूरी हो जाता है। सबसे पहला और महत्वपूर्ण नियम यह है कि यह व्रत पूरी तरह से निर्जला यानी बिना पानी के रखा जाता है, इसलिए स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए सुबह सरगी के समय पौष्टिक और ऊर्जावान आहार का सेवन करें ताकि दिनभर चक्कर या कमजोरी की समस्या न हो। पहली बार व्रत रखने वाली सुहागिनों को अपने मायके या ससुराल से आई सरगी और सुहाग की सामग्री का ही उपयोग करना चाहिए, जिसे बहुत शुभ माना जाता है। पूजा के समय माँ करवा की कथा को पूरी श्रद्धा और ध्यान से सुनें तथा कथा समाप्त होने के बाद अपनी सास या किसी सुहागिन बुजुर्ग महिला के चरण स्पर्श करके आशीर्वाद अवश्य लें। इसके अलावा, दिनभर नकारात्मक विचारों से दूर रहकर पूरी तरह से सकारात्मक और शांतचित्त रहना इस व्रत की सफलता के लिए सबसे बड़ी शर्त है।

पूजा की संपूर्ण थाली और सोलह श्रृंगार का महत्व

करवा चौथ के पावन पर्व पर सोलह श्रृंगार करने का विशेष वैज्ञानिक और धार्मिक महत्व है, जिसे सुहाग की लंबी उम्र का प्रतीक माना जाता है। लाल या पीले रंग के नए वस्त्र धारण करके हाथों में मेहंदी रचाकर और सुहाग की सभी वस्तुएं पहनकर महिलाएं माँ पार्वती का आह्वान करती हैं। पूजा की थाली में छलनी, दीया, रोली, अक्षत, धूप, पुष्प, करवा में जल और मिट्टी या तांबे के करवे में रखे गए मीठे पकवान या मट्ठी को सजाया जाता है। शाम को जब चंद्रोदय होता है, तब छलनी के माध्यम से पहले चंद्रमा के दर्शन किए जाते हैं और फिर उसी छलनी से अपने पति का चेहरा देखकर उनके हाथों से जल ग्रहण करके अपना निर्जला उपवास खोला जाता है। यह पल हर वैवाहिक जोड़े के जीवन में प्रेम, अटूट विश्वास और समर्पण के भाव को और अधिक मजबूत करने का कार्य करता है।

पतियों के लिए भी खास है यह दिन, निभाने होते हैं महत्वपूर्ण दायित्व

करवा चौथ का यह पावन त्योहार केवल पत्नियों के लिए ही नहीं, बल्कि पतियों के लिए भी अपनी जिम्मेदारियों को निभाने और जीवनसंगिनी के प्रति प्रेम व्यक्त करने का एक सुनहरा अवसर होता है। आधुनिक दौर में कई समझदार पति अपनी पत्नियों के साथ इस कठिन व्रत में सहयोग करते हुए पूरे दिन अन्न-जल का त्याग कर उनका साथ निभाते हैं, जो आपसी सामंजस्य का एक बेहतरीन उदाहरण है। पतियों का यह कर्तव्य बनता है कि वे इस विशेष दिन पर अपनी पत्नी को कोई सुंदर सा उपहार दें, उनके घर के कामों में हाथ बंटाएं और व्रत खोलने के दौरान उनके प्रति आभार व्यक्त करें। जब पत्नी दिनभर भूखी-प्यासी रहकर आपकी लंबी उम्र की प्रार्थना करती है, तो आपका यह छोटा सा प्रयास और स्नेह उनके सारे कष्टों को पलभर में दूर कर देता है और रिश्ते में मधुरता हमेशा के लिए बनी रहती है।