'मुस्लिम हूं, लेकिन नमाज नहीं पढ़ती', शबाना आजमी ने धर्म को बताया निजी मसला, बोलीं- जावेद अख्तर पक्के वाले नास्तिक

'मुस्लिम हूं, लेकिन नमाज नहीं पढ़ती', शबाना आजमी ने धर्म को बताया निजी मसला, बोलीं- जावेद अख्तर पक्के वाले नास्तिक

भारतीय सिनेमा जगत की दिग्गज और बहुमुखी प्रतिभा की धनी अभिनेत्री शबाना आजमी अपने बेबाक बयानों और विचारशील दृष्टिकोण के लिए हमेशा जानी जाती हैं। हाल ही में एक टॉक शो के दौरान धर्म, व्यक्तिगत आस्था और सामाजिक मान्यताओं पर बात करते हुए शबाना आजमी ने एक बेहद ही बेबाक और सनसनीखेज बयान दिया है जिसने सोशल मीडिया और वैचारिक गलियारों में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। शबाना आजमी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वह जन्म से मुस्लिम जरूर हैं, लेकिन वह नियमित रूप से नमाज नहीं पढ़ती हैं और न ही किसी धार्मिक कट्टरता में विश्वास रखती हैं। उन्होंने धर्म को इंसान का पूरी तरह से व्यक्तिगत और निजी मसला करार दिया। इतना ही नहीं, अपने पति और मशहूर गीतकार व पटकथा लेखक जावेद अख्तर का जिक्र करते हुए उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि जावेद तो पूरी तरह से पक्के नास्तिक (Atheist) हैं, और उनके घर में हर इंसान को अपनी आस्था व विचारधारा चुनने की पूरी आजादी है। शबाना आजमी के इस बयान के बाद से ही इंटरनेट पर मिला-जुला रिस्पॉन्स देखने को मिल रहा है, जहां कई लोग उनकी इस प्रगतिशील और आजाद सोच की सराहना कर रहे हैं, वहीं कुछ लोग इसे लेकर अपनी अलग राय व्यक्त कर रहे हैं।

धर्म इंसान का निजी मसला है, इसे किसी पर थोपा नहीं जाना चाहिए: शबाना आजमी

अपने दिए गए साक्षात्कार में शबाना आजमी ने विस्तार से बात करते हुए कहा कि किसी भी व्यक्ति का धर्म या उसकी आस्था ईश्वर के साथ उसका अपना व्यक्तिगत संबंध होता है। शबाना के अनुसार, किसी धर्म में पैदा होने का मतलब यह कतई नहीं है कि व्यक्ति उस धर्म के सभी कर्मकांडों और रीति-रिवाजों का आंख मूंदकर पालन करे। उन्होंने कहा, 'मैं एक मुस्लिम परिवार में पैदा हुई हूं और मुझे अपनी पहचान पर गर्व है, लेकिन मैं रोज नमाज अदा नहीं करती। मेरे लिए इंसानियत, नैतिक मूल्य और दूसरों की मदद करना किसी भी धार्मिक कर्मकांड से कहीं ज्यादा बड़ा धर्म है।' शबाना का मानना है कि आधुनिक समाज में लोगों को धर्म के नाम पर बांटने के बजाय इंसानियत के नाते एक-दूसरे से जुड़ना चाहिए। उनका यह दृष्टिकोण आज के उस दौर में बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है जब धर्म और पहचान को लेकर पूरी दुनिया में तमाम तरह की बहसें और तनाव देखने को मिलते हैं। शबाना ने यह भी कहा कि उनके माता-पिता (कैफी आजमी और शौकत आजमी) ने भी उन्हें हमेशा एक खुला और धर्मनिरपेक्ष माहौल दिया, जिसने उनके विचारों को गढ़ने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई।

जावेद अख्तर पक्के नास्तिक हैं, फिर भी हमारे घर में हर विचार का सम्मान होता है

जब शबाना आजमी से उनके पारिवारिक जीवन और उनके पति जावेद अख्तर के धार्मिक दृष्टिकोण के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने बहुत ही सहजता से उत्तर दिया। शबाना ने बताया कि जावेद अख्तर एक घोषित और पक्के नास्तिक हैं जो किसी भी तरह की अलौकिक शक्ति या संगठित धर्म पर विश्वास नहीं करते हैं। इसके बावजूद, उनके घर में विचारों की विविधता का पूरा सम्मान किया जाता है। शबाना ने कहा, 'जावेद पक्के नास्तिक हैं, लेकिन वह कभी किसी दूसरे की आस्था का अपमान नहीं करते। हमारे घर में दिवाली, ईद, होली और क्रिसमस सभी त्योहार उतने ही उत्साह और प्यार के साथ मनाए जाते हैं।' उन्होंने आगे बताया कि एक ही छत के नीचे अलग-अलग विचारधाराओं के लोग बिना किसी मतभेद या टकराव के कैसे खुशी-खुशी रह सकते हैं, उनका परिवार इसका एक जीता-जागता उदाहरण है। यह बात साबित करती है कि आपसी सम्मान, प्यार और समझदारी किसी भी रिश्ते की असली बुनियाद होती है, न कि एक जैसी धार्मिक मान्यताएं।

सोशल मीडिया पर छिड़ी तीखी बहस, यूजर्स ने दी तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं

शबाना आजमी के इस बेबाक और खुले विचारों वाले बयान के सामने आने के बाद से ही सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स जैसे एक्स (ट्विटर), इंस्टाग्राम और फेसबुक पर लोगों की प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गई है। कई प्रगतिशील और युवाओं का मानना है कि शबाना आजमी ने वही कहा है जो आज के दौर के कई लोग महसूस करते हैं—कि धर्म को आडंबर के बजाय एक आंतरिक शांति का जरिया होना चाहिए। कई लोगों ने उनकी इस बात की तारीफ की कि उन्होंने बिना किसी डर या झिझक के अपनी बात को सार्वजनिक रूप से रखा। वहीं दूसरी तरफ, परंपरावादियों और कुछ धार्मिक समूहों ने उनके इस बयान पर अपनी आपत्ति भी जताई है। उनका तर्क है कि सार्वजनिक हस्तियों को धार्मिक मान्यताओं पर बोलते समय अधिक सतर्कता बरतनी चाहिए। हालांकि, इस तरह के विवादों से शबाना आजमी का पुराना नाता रहा है, क्योंकि वे हमेशा से ही सामाजिक कुरीतियों, महिलाओं के अधिकारों और अभिव्यक्ति की आजादी के पक्ष में मुखर होकर बोलती रही हैं।

कला, संस्कृति और आजाद ख्याल सोच की मिसाल है कैफी-जावेद का परिवार

शबाना आजमी और जावेद अख्तर का परिवार भारतीय सिनेमा और साहित्य जगत में अपने बौद्धिक और प्रगतिशील विचारों के लिए जाना जाता है। महान शायर कैफी आजमी की विरासत को आगे बढ़ाते हुए शबाना ने हमेशा अपनी फिल्मों और सामाजिक कार्यों के जरिए समाज में एक सकारात्मक संदेश देने की कोशिश की है। 'अर्थ', 'पार', 'मंडी' और 'नीरजा' जैसी फिल्मों में अपने जीवंत अभिनय से लोहा मनवाने वाली शबाना आजमी समाज सुधार के कामों में भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती हैं। उनका यह हालिया बयान भी इसी बात की तस्दीक करता है कि वे किसी भी तरह के सामाजिक या धार्मिक ढांचे में बंधकर रहने वाली महिला नहीं हैं। उनका यह नजरिया आज की युवा पीढ़ी के लिए भी एक विचारणीय पहलू पेश करता है कि कैसे अपनी पहचान को कायम रखते हुए भी एक इंसान के रूप में खुले विचारों और धर्मनिरपेक्ष सोच के साथ जिया जा सकता है।