'फिल्म इंडस्ट्री परिवार नहीं', बॉलीवुड की गुटबाजी पर मनोज बाजपेयी का छलका दर्द; खुद को बताया 'आउटसाइडर'
भारतीय सिनेमा में अपने दमदार और संजीदा अभिनय का लोहा मनवाने वाले अभिनेता मनोज बाजपेयी ने एक बार फिर हिंदी फिल्म जगत की अंदरूनी सच्चाई को बेपरवाह अंदाज में सामने रखा है। सिनेमाई पर्दे पर दशकों तक अविस्मरणीय किरदार निभाने के बावजूद मनोज आज भी खुद को बॉलीवुड की चकाचौंध और उसकी संस्कृति से पूरी तरह जुड़ा हुआ नहीं पाते। उन्होंने दो-टूक शब्दों में साफ किया कि वह तकनीकी रूप से इस फिल्म इंडस्ट्री में काम जरूर कर रहे हैं, लेकिन भावनात्मक धरातल पर कभी यह अहसास नहीं हुआ कि यह जगह वास्तव में उनकी अपनी है।
'बॉलीवुड एक परिवार है' वाले नैरेटिव को अभिनेता ने बताया जमीनी हकीकत से कोसों दूर
मनोज बाजपेयी के मुताबिक, मायानगरी को अक्सर एक बड़ा और खुशहाल परिवार बताकर पेश किया जाता है, जबकि हकीकत इसके बिल्कुल उलट और कड़वी है। यहां महज हुनर या कड़ा पसीना बहाना ही काफी नहीं होता, बल्कि पर्दे के पीछे चलने वाली जान-पहचान और आपसी पहुंच करियर की दिशा तय करने में बड़ा रोल अदा करती है। इंडस्ट्री के माहौल पर चोट करते हुए उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि साथी कलाकारों के बीच दूसरों की कामयाबी पर दिल से खुशी जताने या जश्न मनाने की रवायत बेहद सीमित है, जो इस तथाकथित 'पारिवारिक माहौल' के दावों की पोल खोलती है।
वाहवाही और नेटवर्किंग के बजाय केवल अपनी कला के प्रति वफादारी ही असली ताकत
गुटबाजी और चापलूसी की संस्कृति से हमेशा दूरी बनाए रखने वाले अभिनेता का मानना है कि किसी भी कलाकार की स्थायी पहचान सिर्फ उसके काम की गुणवत्ता से तय होती है। उनके लिए लोगों की कृत्रिम तारीफें बटोरने या मतलब के रिश्ते साधने से कहीं ज्यादा जरूरी अपने हुनर के प्रति ईमानदार रहना है। उनका साफ कहना है कि फिल्म जगत की अनिश्चितताओं के बीच अगर किसी को लंबे समय तक टिके रहना है, तो उसे बाहरी शोर से ध्यान हटाकर लगातार अपने क्राफ्ट को निखारने में पूरी ऊर्जा लगानी होगी, क्योंकि काम की मजबूती ही अंत में सबसे बड़ी ढाल बनती है।