चलती ट्रेन में कैंसर मरीज की मौत, 12 घंटे तक नहीं पहुंचा कोई डॉक्टर; रेलवे के रवैये ने खड़े किए बड़े सवाल!
मुंबई से हावड़ा जा रही 12859 गीतांजलि एक्सप्रेस में रेलवे के आपातकालीन प्रबंधन और संवेदनहीनता का झकझोर देने वाला मामला सामने आया है। ट्रेन के एम-1 (M-1) कोच में सफर कर रहे पश्चिम बंगाल के भाटपारा निवासी 45 वर्षीय कैंसर पीड़ित यात्री बिनोद पासवान की शनिवार सुबह करीब 8 बजे अचानक मौत हो गई।
परिजनों और सहयात्रियों का गंभीर आरोप है कि घटना की तत्काल सूचना ऑन-ड्यूटी टीटीई और रेल कर्मचारियों को दे दी गई थी, लेकिन इसके बावजूद शव को बोगी से बाहर निकालने के लिए परिजनों और कोच में मौजूद दर्जनों यात्रियों को करीब 12 घंटे से अधिक समय तक शव के पास बैठकर ही सफर तय करने पर मजबूर होना पड़ा। आखिरकार शनिवार रात 8 बजकर 26 मिनट पर जब ट्रेन झारखंड के टाटानगर जंक्शन पहुंची, तब जाकर शव को कोच से उतारा जा सका।
इस पूरे घटनाक्रम के दौरान बोगी में यात्रा कर रहे यात्रियों को भारी मानसिक तनाव और असुविधा का सामना करना पड़ा। सहयात्रियों का कहना है कि जब सुबह टीटीई को यात्री की मृत्यु की जानकारी दी गई, तो रेलवे स्टाफ ने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि अधिकृत रेलवे डॉक्टर द्वारा मृत्यु की पुष्टि किए बिना शव को बीच रास्ते में नहीं उतारा जा सकता।
हालांकि, हैरानी की बात यह रही कि ट्रेन के कई प्रमुख स्टेशनों से गुजरने के बावजूद घंटों तक न तो किसी डॉक्टर को बुलाकर औपचारिकताएं पूरी कराई गईं और न ही शव को सम्मानजनक तरीके से उतारने का कोई ठोस समन्वय दिखा। किसी चलती ट्रेन में मेडिकल इमरजेंसी या यात्री की मौत की स्थिति में रेलवे के विभिन्न विभागों के बीच तालमेल के अभाव ने भारतीय रेल की आपातकालीन प्रतिक्रिया प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।