ट्रैक्टर पर झूला... रांची की सड़कों पर कचरा उठाते मां-बाप और साथ में दो महीने का बेटा

ट्रैक्टर पर झूला... रांची की सड़कों पर कचरा उठाते मां-बाप और साथ में दो महीने का बेटा

झारखंड की राजधानी और हाइटेक सुविधाओं का दम भरने वाले शहर रांची की सड़कों से एक ऐसी मार्मिक और दिल दहला देने वाली तस्वीर सामने आई है, जिसने इंसानियत, सरकारी योजनाओं और सामाजिक सुरक्षा के तमाम दावों पर गंभीर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं। राजधानी की व्यस्त सड़कों और कचरे के बड़े-बड़े ढेरों के बीच एक मजबूर माता-पिता अपने महज दो महीने के दूधमुंहे मासूम बेटे को साथ लेकर पेट पालने की जंग लड़ रहे हैं। ट्रैक्टर की ट्रॉली के पीछे बने लोहे के पाइप से एक फटा हुआ कपड़े का झूला लटका है, जिसमें वह दो महीने का बेबस बच्चा सोता रहता है, जबकि उसके माता-पिता कड़ाके की धूप और सड़कों की धूल-मिट्टी के बीच कचरा उठाने और बीनने का काम करते हैं। यह तस्वीर केवल एक गरीब परिवार की बदहाली की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस कड़वे सच को बयां करती है कि कैसे पेट की आग बुझाने के लिए इंसान को अपने जिगर के टुकड़े को भी मुश्किलों के हवाले करना पड़ता है।

रांची की व्यस्त सड़कों पर सुबह से शाम तक जारी रहता है जिंदगी का यह कठिन संघर्ष

झारखंड की राजधानी रांची के मेन रोड, हरमू बायपास, कटहल मोड़ और मोरहाबादी जैसे इलाकों में रोज़ सुबह एक ट्रैक्टर-ट्रॉली कचरा उठाने के काम में निकलती है। इस ट्रैक्टर को चला रहे पति और पीछे कचरा बीन रही पत्नी की गोद में कोई खिलौना नहीं, बल्कि उनकी आजीविका की मजबूरी है। दो महीने पहले ही जन्मा उनका बेटा, जिसके लिए न तो कोई सुरक्षित झूला है और न ही सिर छिपाने के लिए पक्की छत, वह रोजाना ट्रैक्टर के पिछले हिस्से में बंधे कपड़े के झूले में ही अपनी नींद पूरी करता है। सड़कों पर गाड़ियों से निकलने वाला जहरीला धुआं, उड़ती धूल और कचरे की दुर्गंध के बीच यह मासूम अपनी जिंदगी के शुरुआती दिन गुजारने को मजबूर है। उसके माता-पिता दिन-रात एक करके जो चंद रुपये कमाते हैं, उसी से उनका चूल्हा जलता है और बच्चे के लिए दूध का इंतजाम हो पाता है।

'घर में अकेले कैसे छोड़ें? पेट पालने के लिए काम पर लाना मजबूरी है': मां का छलका दर्द

जब इस बेबस परिवार से बात की गई तो मां की आंखों से आंसुओं की धार बह निकली। उसने सिसकते हुए बताया कि उनके पास रहने का कोई स्थायी ठिकाना नहीं है और न ही घर में कोई ऐसा बुजुर्ग या रिश्तेदार है जो काम पर जाते समय इस दो महीने के मासूम की देखभाल कर सके। यदि मां काम पर न जाए तो घर में दो वक्त की रोटी के लाले पड़ जाते हैं और अगर बच्चे को साथ न लाए तो उसकी सुरक्षा का खतरा बना रहता है। यही वजह है कि उन्होंने ट्रैक्टर के पीछे ही कपड़े और रस्सी के सहारे एक अस्थायी झूला बना दिया। ट्रैक्टर जब सड़कों के गड्ढों से गुजरता है तो झूला हिलता है और बच्चा रोने लगता है, लेकिन मां काम छोड़कर उसे तुरंत दूध पिलाती है और फिर कचरा उठाने के काम में जुट जाती है।

सरकारी योजनाओं और समाज कल्याण विभाग के बड़े-बड़े दावों की सड़कों पर खुली पोल

केंद्र और राज्य सरकार द्वारा गरीबों, गर्भवती महिलाओं और नवजात शिशुओं के पोषण व सुरक्षा के लिए 'प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना', 'आंगनबाड़ी सेवाएं' और 'शिशु संरक्षण योजना' जैसी दर्जनों महत्वाकांक्षी योजनाएं चलाई जा रही हैं। कागजों पर करोड़ों रुपये का बजट इन योजनाओं के नाम पर जारी होता है, लेकिन रांची की सड़कों पर कचरा उठाने वाले इस परिवार की यह हालत चीख-चीख कर कह रही है कि ये योजनाएं धरातल पर जरूरतमंदों तक पहुँचने में पूरी तरह से नाकाम साबित हो रही हैं। दो महीने के बच्चे को जिस उम्र में मां की गर्म गोद, साफ-सुथरा माहौल और उचित टीकाकरण की सख्त जरूरत है, उस उम्र में उसे कचरे के ढेरों और धूल-धक्कड़ के बीच अपनी सांसें गिननी पड़ रही हैं।

सोशल मीडिया पर तस्वीर वायरल होने के बाद उठा जन-आक्रोश: प्रशासन से त्वरित मदद की गुहार

ट्रैक्टर पर टंगे झूले और कचरा उठाते मां-बाप की यह मार्मिक तस्वीर जैसे ही सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर वायरल हुई, वैसे ही पूरे राज्य में चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया। आम नागरिकों, बाल अधिकार कार्यकर्ताओं और सामाजिक संगठनों ने इस तस्वीर को शेयर करते हुए झारखंड सरकार, रांची जिला प्रशासन और समाज कल्याण विभाग से इस परिवार को तुरंत सुरक्षित आश्रय, आर्थिक मदद और बच्चे के लिए स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने की अपील की है। लोगों का कहना है कि राजधानी रांची के बीचों-बीच इस तरह से एक मासूम के बचपन का पिसना पूरे समाज के लिए शर्मनाक है और प्रशासन को मामले का तुरंत संज्ञान लेकर इस परिवार के पुनर्वास की व्यवस्था करनी चाहिए।

क्या इस दो महीने के मासूम बच्चे को मिल पाएगा उसका हक और सुरक्षित भविष्य?

रांची की सड़कों पर कचरे के बीच पल रहा यह दो महीने का बच्चा आज पूरे देश के सामने एक यक्ष प्रश्न बनकर खड़ा है। यह कहानी केवल एक परिवार की नहीं है, बल्कि देश के विभिन्न शहरों में सड़कों किनारे, फुटपाथों और निर्माण स्थलों पर काम करने वाले उन हजारों मजदूरों की है जिनके बच्चे बचपन से ही बुनियादी अधिकारों से वंचित रह जाते हैं। अब देखने वाली बात यह होगी कि सोशल मीडिया पर इस तस्वीर के वायरल होने और जनता के बढ़ते दबाव के बाद क्या रांची जिला प्रशासन और बाल संरक्षण आयोग इस लाचार परिवार की सुध लेता है या फिर यह मासूम बच्चा इसी तरह ट्रैक्टर के झूले पर अपनी कड़वी सच्चाई के साथ पलता रहेगा।